
कभी खरीदारी का मतलब था जेब में पैसे होना। फिर क्रेडिट कार्ड आया और उसने खरीदारी को आय की तारीख से अलग कर दिया। अब डिजिटल युग में यह अंतर और भी छोटा हो गया है। मोबाइल स्क्रीन पर कुछ क्लिक, एक छोटी-सी मंजूरी, और महंगा सामान किस्तों में घर पहुंच जाता है। जरूरत हो या सिर्फ इच्छा - दोनों के बीच की दूरी भी जैसे कम होती जा रही है।
इसी बदलती तस्वीर के बीच भारत में युवाओं, खासकर नई पीढ़ी के बीच क्रेडिट कार्ड, छोटे पर्सनल लोन और Buy Now, Pay Later (BNPL) जैसे विकल्पों का इस्तेमाल चर्चा में है। आसान कर्ज ने वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ consumption-led borrowing का सवाल भी खड़ा हुआ है।
RBI पिछले कुछ वर्षों से unsecured consumer credit के तेज विस्तार को लेकर सावधानी बरतता रहा है। नवंबर 2023 में केंद्रीय बैंक ने बैंकों और NBFCs के लिए unsecured consumer credit पर risk weights 100% से बढ़ाकर 125% कर दिए थे। RBI ने उस समय कहा था कि रिटेल सेगमेंट में असुरक्षित ऋण की तेज और लगातार वृद्धि से संभावित जोखिम बन सकता है।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि युवा कितना कर्ज ले रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि वे कर्ज किस चीज के लिए ले रहे हैं, और उस कर्ज की अदायगी उनकी भविष्य की आय पर कितना दबाव डाल सकती है?
BNPL ने खरीदारी के व्यवहार को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है। पहले किसी वस्तु को खरीदने के लिए पैसे जमा करने पड़ते थे। फिर क्रेडिट कार्ड और EMI ने इस प्रक्रिया को बदला। अब डिजिटल क्रेडिट ने इसे और ज्यादा सहज बना दिया है।
मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, फैशन, ऑनलाइन शॉपिंग, ट्रैवल और दूसरी lifestyle purchases के लिए छोटे-छोटे भुगतान विकल्प उपलब्ध हैं। उपभोक्ता को पूरी कीमत एक साथ चुकाने के बजाय उसे कई हिस्सों में बांटने का विकल्प मिलता है। यहीं से एक मनोवैज्ञानिक बदलाव शुरू होता है। अगर किसी उत्पाद की कीमत ₹5,000 है तो उपभोक्ता एक बार सोच सकता है कि उसे अभी खरीदना चाहिए या नहीं। लेकिन वही कीमत अगर '₹500 की 10 किस्तों' के रूप में सामने आए, तो खरीदारी आसान महसूस हो सकती है। यानी EMI सिर्फ भुगतान का तरीका नहीं है। वह खरीदारी के फैसले को प्रभावित करने वाला मनोवैज्ञानिक उपकरण भी बन सकती है।
कर्ज की सबसे बड़ी समस्या अक्सर उसकी एकल राशि नहीं, बल्कि कई छोटे कर्जों का एक साथ जमा होना होती है। मान लीजिए किसी युवा की मासिक आय ₹50,000 है। उसके पास स्मार्टफोन की EMI ₹3,000 है, लैपटॉप की ₹4,000, पर्सनल लोन की ₹5,000 और क्रेडिट कार्ड से किए गए खर्च की अदायगी ₹6,000 है। अलग-अलग देखें तो हर भुगतान मैनेजेबल लग सकता है। लेकिन महीने के अंत में ₹18,000 की राशि पहले ही तय हो चुकी है। इसके बाद किराया, खाना, यात्रा, परिवार, निवेश और आकस्मिक खर्च आते हैं। यही वह जगह है जहां 'मैं हर महीने सिर्फ इतनी EMI दे रहा हूं' वाली सोच खतरनाक हो सकती है। असल सवाल यह होना चाहिए कि कुल आय का कितना हिस्सा पहले ही कर्ज की अदायगी के लिए प्रतिबद्ध हो चुका है।
नई पीढ़ी के सामने उपभोग के अवसर पहले की तुलना में कहीं अधिक हैं। सोशल मीडिया ने दुनिया भर की लाइफस्टाल को एक ही स्क्रीन पर ला दिया है। किसी के लिए नया फोन सामान्य है, किसी के लिए वीकंड ट्रिप, किसी के लिए ब्रांडेड कपड़े और किसी के लिए महंगा गैजेट। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जिंदगी और वास्तविक आय के बीच का अंतर कभी-कभी कर्ज से भरने की कोशिश की जा सकती है।
यहां 'FOMO' यानी Fear of Missing Out भी महत्वपूर्ण है। अगर दोस्तों का समूह किसी नए रेस्टोरेंट में जा रहा है, कोई यात्रा कर रहा है या नया गैजेट खरीद रहा है, तो व्यक्ति खुद को उस लाइफस्टाल से अलग महसूस कर सकता है। डिजिटल क्रेडिट उस इच्छा और खरीदारी के बीच की आर्थिक बाधा को कम कर देता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब आय स्थिर रहती है और लाइफस्टाल की लागत लगातार बढ़ती जाती है।
बिना गारंटी वाला कर्ज यानी ऐसा कर्ज जिसके पीछे कोई संपत्ति या दूसरी चीज सुरक्षा के रूप में नहीं होती। इसमें कर्ज देने वाले के पास घर या जमीन जैसी कोई संपत्ति सुरक्षा के रूप में नहीं होती। इसलिए ऐसे कर्ज में कर्ज लेने वाले की कर्ज चुकाने की क्षमता और उसका पिछला कर्ज रिकॉर्ड बेहद महत्वपूर्ण होता है।
RBI ने नवंबर 2023 में बिना गारंटी वाले उपभोक्ता कर्ज के लिए बैंकों को ज्यादा पूंजी रखने के निर्देश दिए थे। इसका उद्देश्य ऐसे कर्ज से जुड़े संभावित जोखिम को सीमित करना था। इन कदमों के बाद कुछ उपभोक्ता कर्ज की वृद्धि दर में कमी देखी गई। उदाहरण के लिए, क्रेडिट कार्ड से बकाया कर्ज की वृद्धि दर नवंबर 2023 के 34.2 प्रतिशत से घटकर अप्रैल 2024 तक 23 प्रतिशत रह गई।
यह समझना जरूरी है कि RBI की चिंता का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्तिगत कर्ज खतरनाक है। व्यक्तिगत कर्ज या क्रेडिट कार्ड अपने आप में समस्या नहीं हैं। समस्या तब पैदा होती है जब कर्ज लेने की रफ्तार आमदनी बढ़ने की क्षमता से ज्यादा हो जाए और लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों तथा इच्छाओं को लगातार कर्ज के सहारे पूरा करने लगें।
इस कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत में औपचारिक कर्ज की पहुंच बढ़ना वित्तीय समावेशन की दृष्टि से सकारात्मक बदलाव है। ट्रांसयूनियन सिबिल की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2017 से मार्च 2026 के बीच भारत में औपचारिक खुदरा कर्ज की पहुंच 35 प्रतिशत से बढ़कर 74 प्रतिशत हो गई। सामान को मासिक किस्तों पर खरीदने की बढ़ती लोकप्रियता ने भी इस विस्तार में भूमिका निभाई है। इसका मतलब है कि आज बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जुड़ रहे हैं, जिनके पास पहले कर्ज लेने की आसान सुविधा या कर्ज का रिकॉर्ड नहीं था।
युवा वर्ग के लिए यह एक अवसर भी है। अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो कर्ज किसी व्यक्ति को शिक्षा, कौशल विकास, जरूरी उपकरण या आय बढ़ाने वाली दूसरी जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।
इसलिए सवाल 'कर्ज बनाम बिना कर्ज' का नहीं है। असली सवाल है- 'सही कर्ज बनाम गलत कर्ज।'
अगर कोई छात्र या नौकरीपेशा व्यक्ति ऐसा लैपटॉप खरीदता है, जिससे उसकी पढ़ाई या काम करने की क्षमता बढ़ती है, तो इसे सिर्फ उपभोक्ता खर्च नहीं माना जा सकता। इसी तरह शिक्षा या कौशल सीखने के लिए लिया गया कर्ज भविष्य में आमदनी बढ़ाने में मदद कर सकता है। लेकिन केवल इसलिए नया फोन खरीदना कि पुराना फोन अभी भी ठीक चल रहा है और फिर उसकी कीमत कई महीनों की किस्तों में बांट देना अलग तरह का फैसला है। यही अंतर वित्तीय योजना में महत्वपूर्ण हो जाता है।
खुद से एक सवाल पूछना चाहिए-
क्या यह कर्ज भविष्य की आमदनी बढ़ाएगा या सिर्फ आज की इच्छा पूरी करेगा?
अगर जवाब दूसरा है, तो कर्ज लेने से पहले ज्यादा सावधानी जरूरी है।
क्रेडिट कार्ड की ‘न्यूनतम भुगतान’ वाली उलझन
क्रेडिट कार्ड के मामले में एक और बड़ा जोखिम है- न्यूनतम भुगतान।
कई लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने हर महीने न्यूनतम तय राशि चुका दी, तो उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई। लेकिन बाकी बची राशि पर ब्याज और दूसरे शुल्क लगते रह सकते हैं। इससे कर्ज लंबे समय तक चलता रहता है और उसकी कुल लागत बढ़ सकती है। इसीलिए क्रेडिट कार्ड को अतिरिक्त आमदनी समझना बड़ी गलती है। यह असल में आपकी भविष्य की आमदनी के भरोसे लिया गया कर्ज है।
RBI के नियमों में क्रेडिट कार्ड के बकाया और समय पर भुगतान को लेकर अलग प्रावधान हैं। इसका मतलब साफ है कि समय पर कर्ज चुकाना अच्छे वित्तीय व्यवहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस पूरी कहानी को एक वाक्य में समझना हो तो वह होगा- आज की जरूरत या इच्छा को कल की कमाई से पूरा करना। अगर ऐसा कभी-कभार हो और कर्ज चुकाने की क्षमता मजबूत हो, तो यह सामान्य वित्तीय सुविधा हो सकती है। लेकिन अगर हर महीने का खर्च पिछले महीने के कर्ज से पूरा होने लगे, तो व्यक्ति धीरे-धीरे कर्ज के चक्र में फंस सकता है।
पहले क्रेडिट कार्ड का बिल आता है। फिर उसे चुकाने के लिए व्यक्तिगत कर्ज लिया जाता है। उसके बाद नई मासिक किस्त शुरू हो जाती है। फिर किसी दूसरे खर्च के लिए बाद में भुगतान करने वाली सुविधा का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह आमदनी का बड़ा हिस्सा आने वाले महीनों के भुगतान में पहले ही बंध जाता है।
यहां कर्ज देने वाले बैंक, वित्तीय संस्थानों और डिजिटल कर्ज कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। डिजिटल कर्ज ने पैसे उधार लेने की प्रक्रिया को आसान बनाया है, लेकिन आसान पहुंच के साथ जिम्मेदार कर्ज देना भी जरूरी है। ग्राहक को कर्ज लेने से पहले ब्याज दर, शुल्क, देर से भुगतान पर लगने वाला जुर्माना, कुल भुगतान और किस्तों की पूरी जानकारी समझनी चाहिए। सिर्फ यह बताना कि “आपकी किस्त ₹799 से शुरू होगी”, पर्याप्त जानकारी नहीं है। ग्राहक को यह भी पता होना चाहिए कि पूरे कर्ज की अवधि में उसकी जेब से कुल कितनी राशि जाएगी। इसी तरह कर्ज देने वालों के लिए भी यह जरूरी है कि वे केवल इसलिए ज्यादा कर्ज न दें क्योंकि ग्राहक उसके लिए योग्य दिखाई दे रहा है। यह देखना भी जरूरी है कि वह व्यक्ति वास्तव में कर्ज चुका पाएगा या नहीं।
इस पूरी बहस में युवाओं को गैर-जिम्मेदार या वित्तीय रूप से अपरिपक्व बताना आसान है, लेकिन यह अधूरा निष्कर्ष होगा। नई पीढ़ी के सामने वित्तीय सुविधाएं पहले से कहीं ज्यादा हैं। मोबाइल और डिजिटल माध्यमों ने बैंकिंग तथा कर्ज की सुविधाएं उनकी जेब तक पहुंचा दी हैं। इसलिए वित्तीय समझ भी उसी गति से बढ़नी चाहिए। युवा अगर यह समझ जाए कि कर्ज का ब्याज कैसे जुड़ता है, क्रेडिट रिकॉर्ड कैसे काम करता है, न्यूनतम भुगतान का क्या मतलब है और कुल मासिक किस्तें कितनी होनी चाहिए, तो कर्ज एक उपयोगी वित्तीय साधन बन सकता है। लेकिन अगर कर्ज को आमदनी का विकल्प समझ लिया जाए, तो यही सुविधा जोखिम बन सकती है।
कुछ आसान सवाल आपकी मदद कर सकते हैं-
पहला: क्या मैं यह खरीदारी बिना किस्त के भी कर सकता हूं?
दूसरा: क्या यह मेरी जरूरत है या सिर्फ इच्छा?
तीसरा: मेरी सभी मासिक किस्तें मिलाकर मेरी आमदनी का कितना हिस्सा जा रहा है?
चौथा: अगर अगले तीन महीने मेरी आमदनी कम हो जाए तो क्या मैं कर्ज की किस्तें चुका पाऊंगा?
पांचवां: क्या मैं एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज तो नहीं ले रहा?
छठा: क्या मैंने कर्ज की कुल लागत पढ़ी है या सिर्फ मासिक किस्त देखी है?
अगर इनमें से कई सवालों के जवाब आपको असहज करते हैं, तो शायद अगली खरीदारी से पहले रुककर सोचना चाहिए।
भारत में उपभोक्ता खर्च लंबे समय से आर्थिक विकास की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ज्यादा लोग औपचारिक कर्ज से जुड़ें, घर खरीदें, वाहन खरीदें, शिक्षा में निवेश करें और छोटे कारोबार शुरू करें—यह अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक हो सकता है। लेकिन सिर्फ कर्ज के सहारे उपभोक्ता खर्च को लगातार बढ़ाना लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता।
RBI की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट, जून 2026 के अनुसार सितंबर 2025 तक परिवारों पर कुल कर्ज सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP के 45.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इसमें उपभोक्ता कर्ज की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। दिसंबर 2025 तक यह अनुपात बढ़कर 47.8 प्रतिशत हो गया। हालांकि भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की कर्ज गुणवत्ता मजबूत बनी हुई है और मार्च 2026 में बैंकों का सकल खराब कर्ज अनुपात घटकर करीब 1.8 प्रतिशत के कई दशकों के निचले स्तर पर आ गया। यानी तस्वीर अभी संकट की नहीं, बल्कि सावधानी की है और यही अंतर समझना जरूरी है।
Gen Z की कर्ज की कहानी सिर्फ Gen Z की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां स्मार्टफोन, यूपीआई, डिजिटल वित्तीय कंपनियों और तुरंत मिलने वाले कर्ज ने पैसे खर्च करने का तरीका बदल दिया है।
आज किसी चीज को खरीदने के लिए उसकी पूरी कीमत जेब में होना जरूरी नहीं रह गया है। यही सुविधा आर्थिक अवसर भी पैदा करती है और जोखिम भी। अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें की सुविधा तभी तक अच्छी है, जब तक बाद में भुगतान करने के लिए आपकी भविष्य की आमदनी पर्याप्त है। वरना आज की छोटी-सी मासिक किस्त कल बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी बन सकती है।
कर्ज आपकी आमदनी नहीं है। किस्त आपकी आर्थिक क्षमता नहीं बढ़ाती, बल्कि आपकी भविष्य की आमदनी का एक हिस्सा आज खर्च करने की सुविधा देती है।
इसलिए अगली बार जब मोबाइल स्क्रीन पर लिखा आए- “अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें”, तो सिर्फ यह मत देखिए कि आज कितना खर्च करना है। यह भी देखिए कि आने वाले महीनों में उसकी असल कीमत कितनी चुकानी होगी।