
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ICU और गंभीर मरीजों के इलाज की क्षमता थी। कई शहरों में अस्पतालों के बाहर बेड के लिए इंतजार, ऑक्सीजन की कमी और गंभीर मरीजों को दूसरे शहरों में रेफर किए जाने की तस्वीरें सामने आई थीं।
महामारी खत्म होने के बाद सवाल था कि क्या देश ने इससे सबक लिया? क्या जिला अस्पतालों में ICU बढ़े? क्या छोटे शहरों में गंभीर मरीजों को इलाज मिल पा रहा है? और क्या सरकार की योजनाओं से जमीन पर बदलाव आया?
उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों और CAG की ऑडिट रिपोर्टों को देखें तो तस्वीर मिश्रित है। केंद्र ने ICU और क्रिटिकल केयर क्षमता बढ़ाने के लिए बड़ा निवेश शुरू किया है, लेकिन कई सरकारी जिला अस्पतालों में आज भी ICU, विशेषज्ञ डॉक्टर, नर्स और जरूरी उपकरणों की कमी बनी हुई है।
ICU यानी Intensive Care Unit उन मरीजों के लिए होता है जिनकी हालत गंभीर होती है और जिन्हें लगातार निगरानी, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सपोर्ट या दूसरी जीवनरक्षक सुविधाओं की जरूरत पड़ सकती है। दिल का दौरा, गंभीर संक्रमण, स्ट्रोक, दुर्घटना, सांस की गंभीर बीमारी और कई सर्जरी के बाद मरीजों को ICU की जरूरत पड़ सकती है।
समस्या यह है कि ICU सिर्फ कुछ बेड और मशीनें लगाने से तैयार नहीं होता। इसके लिए क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ, प्रशिक्षित नर्स, वेंटिलेटर, मॉनिटरिंग उपकरण, ऑक्सीजन सप्लाई, दवाएं और 24 घंटे की चिकित्सा व्यवस्था चाहिए। यही वजह है कि किसी जिले में ICU की मौजूदगी और ICU के वास्तव में चालू होने में अंतर हो सकता है।
भारत में ICU क्षमता का एक समान, लगातार अपडेट होने वाला राष्ट्रीय डेटाबेस लंबे समय से बड़ी चुनौती रहा है। इसलिए अलग-अलग स्रोतों में ICU बेड की संख्या अलग मिल सकती है।
आपके दिए गए 95,000 ICU बेड और करीब 0.22 ICU बेड प्रति 1,000 आबादी वाले आंकड़े को प्रकाशित करने से पहले स्रोत और वर्ष स्पष्ट करना जरूरी है। इसी तरह “वैश्विक मानक 1 ICU बेड प्रति 1,000 आबादी” को भी सार्वभौमिक WHO मानक की तरह पेश नहीं करना चाहिए। ICU की जरूरत देशों की बीमारी की स्थिति, अस्पताल व्यवस्था और स्वास्थ्य प्रणाली के हिसाब से बदलती है।
इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि भारत में ICU क्षमता की कमी लंबे समय से स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी कमजोरी रही है, खासकर सरकारी और जिला स्तर पर। सबसे बड़ी समस्या केवल बेड की संख्या नहीं, बल्कि उनका भौगोलिक वितरण और संचालन क्षमता है।
बड़े महानगरों में निजी अस्पतालों के पास बड़ी ICU क्षमता है, जबकि छोटे शहरों और ग्रामीण जिलों में गंभीर मरीजों को अक्सर मेडिकल कॉलेज या बड़े शहरों में रेफर करना पड़ता है।
राष्ट्रीय औसत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना है कि जिले के सरकारी अस्पताल में मरीज को गंभीर हालत में क्या सुविधा मिलेगी।CAG की अलग-अलग राज्यवार ऑडिट रिपोर्टों में यही समस्या बार-बार सामने आई है।
उत्तर प्रदेश की CAG ऑडिट में कई जांचे गए जिला अस्पतालों में ICU की उपलब्धता और उसके संचालन में कमी पाई गई।हालिया ऑडिट दस्तावेजों में जांचे गए अस्पतालों में कुछ जगह ICU उपलब्ध नहीं था, जबकि कुछ जगह उपकरण अधूरे या ICU गैर-कार्यात्मक था। उदाहरण के लिए Unnao, Kanpur Nagar, Lucknow, Saharanpur, Kannauj और Kushinagar के कुछ जांचे गए अस्पतालों में ICU उपलब्ध नहीं होने की स्थिति दर्ज हुई।
पुरानी CAG रिपोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश के सात नमूना जिलों में जिला अस्पतालों की कुल बेड क्षमता में बड़ी कमी दर्ज की थी। 2017-18 में इन 16 जांचे गए जिला स्तर के अस्पतालों में केवल 2,299 बेड कार्यशील थे, जबकि जरूरत 3,692 बेड की आंकी गई थी।यानी समस्या सिर्फ ICU की नहीं, पूरे जिला अस्पताल ढांचे की क्षमता से जुड़ी है।
बिहार की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। CAG की 2024 की स्वास्थ्य सेवाओं परफॉर्मेंस ऑडिट में जिला अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी दर्ज की गई। उदाहरण के लिए कई जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी 50 प्रतिशत से ज्यादा थी। कई अस्पतालों में नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी इससे भी अधिक थी।
CAG की बिहार संबंधी ऑडिट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया- जांच किए गए पांच जिला अस्पतालों में किसी में भी Cardiac Care Unit यानी CCU नहीं था। हाजीपुर में तो स्वीकृत CCU के उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद यूनिट लंबे समय तक काम नहीं कर रही थी।
इसका सीधा असर गंभीर मरीजों पर पड़ता है। अगर जिला अस्पताल में ICU या CCU की सुविधा उपलब्ध नहीं है तो मरीज को मेडिकल कॉलेज या बड़े शहर में रेफर करना पड़ सकता है।
मान लीजिए किसी अस्पताल में 10 ICU बेड हैं। लेकिन वहां-
तो कागज पर ICU मौजूद होने के बावजूद मरीज को वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा। यही वजह है कि ICU capacity को केवल बेड की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए। असली सवाल है कितने ICU बेड चालू हैं और उनमें 24 घंटे गुणवत्तापूर्ण क्रिटिकल केयर मिल रही है?
कोविड के अनुभव के बाद केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन यानी PM-ABHIM शुरू किया। इस योजना का कुल प्रावधान ₹64,180 करोड़ है और इसका उद्देश्य सिर्फ ICU बढ़ाना नहीं बल्कि देश के पूरे स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना है।
इस तरह सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्ट करने का लक्ष्य रखा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि 602 Critical Care Hospital Blocks उन जिलों में प्रस्तावित हैं जिनकी आबादी 5 लाख से अधिक है।इसका मतलब यह योजना देश के हर छोटे जिला अस्पताल में समान संख्या में ICU बेड लगाने की योजना नहीं है।
जुलाई 2025 तक केंद्र सरकार के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए PM-ABHIM के तहत ₹33,081.82 करोड़ की प्रशासनिक मंजूरी दी जा चुकी थी। इसमें 621 Critical Care Blocks भी मंजूर किए गए थे। दिसंबर 2025 तक भी सरकार ने 621 Critical Care Blocks के स्वीकृत होने की जानकारी दी थी।
मार्च 2026 की सरकारी जानकारी में भी 621 CCBs की मंजूरी और योजना के तहत बुनियादी ढांचे के विस्तार की जानकारी दी गई। साथ ही सरकार ने माना कि कई राज्यों में जमीन उपलब्ध होने में देरी, टेंडर और खरीद प्रक्रिया, परियोजना एजेंसियों के बीच समन्वय और अधूरी DPR जैसी वजहों से परियोजनाओं में देरी हुई। यानी पैसा मंजूर होना और ICU का मरीजों के लिए चालू हो जाना दो अलग चरण हैं।
PM-ABHIM में 5 लाख से ज्यादा आबादी वाले जिलों को प्राथमिकता देने का एक तर्क है। ऐसे जिलों में मरीजों की संख्या ज्यादा होगी और क्रिटिकल केयर की मांग भी अधिक हो सकती है। लेकिन इससे छोटे और दूरदराज जिलों की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती। कई पहाड़ी, आदिवासी और सीमावर्ती जिलों में आबादी कम हो सकती है, लेकिन भौगोलिक दूरी बहुत ज्यादा होती है।
ऐसे इलाके में मरीज को 100 या 150 किलोमीटर दूर मेडिकल कॉलेज तक ले जाना खुद एक जोखिम हो सकता है। इसीलिए ICU विस्तार के साथ रेफरल सिस्टम और एंबुलेंस नेटवर्क भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए अगर सरकार सैकड़ों नए ICU या Critical Care Blocks बनाती भी है, तो उनकी मानव संसाधन क्षमता सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
हां, लेकिन बदलाव अभी अधूरा है। एक तरफ केंद्र सरकार ने PM-ABHIM के जरिए बड़े पैमाने पर Critical Care Blocks को मंजूरी दी है और कई राज्यों में निर्माण एवं उन्नयन का काम चल रहा है। दूसरी तरफ CAG की ऑडिट रिपोर्टें बताती हैं कि सरकारी अस्पतालों में बेड, उपकरण, डॉक्टर, नर्स और संचालन से जुड़ी कमियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए 2026 की तस्वीर को “ICU नहीं हैं” या “समस्या पूरी तरह खत्म हो गई” जैसे दो चरम निष्कर्षों में नहीं बांटा जा सकता।
सही तस्वीर यह है कि सरकार ने क्षमता बढ़ाने की दिशा में बड़ा निवेश शुरू किया है, लेकिन उस निवेश का अंतिम परिणाम मरीज के बेड तक पहुंचने में समय लग रहा है।