
असम का काजीरंगा नेशनल पार्क सिर्फ एक जंगल नहीं, बल्कि दुनिया में एक सींग वाले गैंडे की सबसे महत्वपूर्ण आबादी वाले इलाकों में से एक है। लेकिन अब इसके आसपास का इको-सेंसिटिव जोन यानी ESZ फिर चर्चा में है। असम सरकार ने काजीरंगा की सीमा से लगे क्षेत्र के लिए करीब 1 से 3 किलोमीटर का क्षेत्र प्रस्तावित किया है, जबकि अभी 10 किलोमीटर का डिफॉल्ट सुरक्षा प्रावधान लागू है। प्रस्ताव ने विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि 10 किलोमीटर का मतलब यह नहीं कि पार्क की सीमा से 10 किमी तक हर निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है। ESZ का उद्देश्य संरक्षित क्षेत्र के आसपास एक तरह का संक्रमण क्षेत्र बनाना है, जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर रोक या नियंत्रण लगाया जाता है और कुछ गतिविधियों को शर्तों के साथ अनुमति दी जाती है।
इको-सेंसिटिव जोन किसी नेशनल पार्क या वन्यजीव अभयारण्य के बाहर बनाया जाने वाला ऐसा क्षेत्र है, जिसका मकसद पार्क पर पड़ने वाले बाहरी दबाव को कम करना है। इसे आसान भाषा में जंगल के लिए सुरक्षा कवच कहा जा सकता है।
केंद्र की 2011 की गाइडलाइन में ESZ के लिए कोई एक निश्चित दूरी तय नहीं की गई थी। लेकिन 3 जून 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि प्रत्येक राष्ट्रीय पार्क और वन्यजीव अभयारण्य के आसपास कम से कम 1 किलोमीटर का ESZ होना चाहिए। जहां पहले से इससे बड़ा ESZ तय या प्रस्तावित था, वहां वह बड़ा क्षेत्र लागू रहना था।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था में बदलाव किया, लेकिन जहां किसी संरक्षित क्षेत्र के लिए राज्य की ओर से अंतिम प्रस्ताव नहीं आया था, वहां 10 किलोमीटर का अंतरिम/डिफॉल्ट सुरक्षा क्षेत्र लागू रहने की व्यवस्था बनी रही।
काजीरंगा के मामले में मार्च 2026 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने भी राज्य सरकार ने कहा था कि केंद्र को कोई अंतिम या ड्राफ्ट ESZ प्रस्ताव जमा नहीं किया गया है, इसलिए 10 किलोमीटर का ESZ लागू था।
यही इस विवाद की असली वजह है। काजीरंगा के आसपास सिर्फ जंगल नहीं है। यहां गांव, खेती, चाय बागान, पर्यटन कारोबार, सड़कें और दूसरी आर्थिक गतिविधियां भी हैं। 2025 में असम सरकार ने एक बड़े ESZ प्रस्ताव को वापस लेते हुए कहा था कि उससे करीब 5 लाख लोग सीधे प्रभावित हो सकते थे। सरकार ने यह भी बताया था कि इलाके में चाय बागान, स्कूल, अस्पताल, बाजार, उद्योग और राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियां मौजूद हैं।
यानी राज्य सरकार की दलील है कि अगर बहुत बड़ा ESZ लगाया जाता है तो स्थानीय लोगों के रोजमर्रा के काम, निर्माण और आर्थिक गतिविधियों पर अतिरिक्त पाबंदियां आ सकती हैं।
इसी वजह से अब एक ऐसा स्थल-विशिष्ट ESZ बनाने की कोशिश हो रही है, जिसमें हर दिशा में एक समान 10 किलोमीटर की जगह स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से लगभग 1 से 3 किलोमीटर का क्षेत्र रखा जाए। हालांकि प्रस्ताव को अभी अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। फिलहाल 10 किलोमीटर वाला सुरक्षा प्रावधान लागू है।
काजीरंगा के आसपास इंसानी बस्तियां कोई नई चीज नहीं हैं। पार्क के दक्षिणी हिस्से में लंबे समय से गांव और चाय बागान मौजूद हैं। सरकारी अध्ययन में काजीरंगा से जुड़े छह ग्राम पंचायत क्षेत्रों में कुल 50 से ज्यादा गांवों का विवरण दिया गया है।
एक पुराने सरकारी संरक्षण अध्ययन के अनुसार, काजीरंगा की सीमा से लगे 23 गांवों और आसपास के 30 गांवों में 70 हजार से ज्यादा लोग कृषि आधारित गतिविधियों पर निर्भर थे।
इसलिए ESZ की सीमा बढ़ने पर सबसे ज्यादा चिंता उन्हीं लोगों की होती है जिनकी जमीन, घर, दुकान या आजीविका पार्क के आसपास है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। ये गांव सिर्फ इंसानों के रहने की जगह नहीं हैं। कई इलाकों से हाथी और दूसरे वन्यजीवों की आवाजाही भी होती है। बाढ़ के समय काजीरंगा के जानवर ऊंचे इलाकों की तरफ जाते हैं और कई बार पार्क से बाहर निकलते हैं।
यानी इंसानी बस्ती और वन्यजीवों का क्षेत्र यहां एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं है।
काजीरंगा की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ पार्क के अंदर की सुरक्षा नहीं है। असली चुनौती है पार्क के बाहर का पूरा परिदृश्य। काजीरंगा ब्रह्मपुत्र की बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र है। जब पानी बढ़ता है तो गैंडे, हाथी और दूसरे जानवर ऊंची जमीन की तलाश में पार्क से बाहर निकलते हैं। दक्षिण में उनका महत्वपूर्ण संपर्क कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों से है।
समस्या यह है कि इन रास्तों के बीच सड़क, होटल, दुकानें, चाय बागान और बस्तियां मौजूद हैं। पुराने संरक्षण अध्ययनों में भी काजीरंगा और कार्बी आंगलोंग के बीच वन्यजीव कॉरिडोर पर मानवीय गतिविधियों के दबाव का उल्लेख किया गया है।
अगर पार्क की सीमा के बाहर निर्माण तेजी से बढ़ता है तो जानवरों के लिए सुरक्षित रास्ते कम हो सकते हैं। इसका परिणाम मानव-वन्यजीव संघर्ष के रूप में सामने आ सकता है।
नहीं। यह भी एक जरूरी बात है। ESZ का छोटा होना यह नहीं बताता कि उस क्षेत्र में हर तरह का उद्योग, होटल या निर्माण स्वतः कानूनी हो जाएगा। अलग-अलग परियोजनाओं पर पर्यावरण, वन, भूमि उपयोग और अन्य कानून लागू हो सकते हैं।
ESZ में कुछ गतिविधियां प्रतिबंधित होती हैं, कुछ नियंत्रित और कुछ सामान्य रूप से अनुमति योग्य हो सकती हैं। इसलिए 10 किमी से 1-3 किमी होने का अर्थ '10 किमी के अंदर अब सब कुछ बनाया जा सकता है' नहीं है।
लेकिन सीमा छोटी होने का मतलब यह जरूर है कि ESZ के तहत आने वाले क्षेत्र में प्रतिबंध और नियमन का दायरा कम हो जाएगा। यही वजह है कि पर्यावरणविदों को चिंता है कि इससे पार्क के आसपास व्यावसायिक और निर्माण गतिविधियों का दबाव बढ़ सकता है।
काजीरंगा के आसपास पर्यटन तेजी से बढ़ा है। होटल, रिसॉर्ट, रेस्तरां और सड़क आधारित कारोबार पार्क के आसपास की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजमार्ग भी पार्क के दक्षिणी हिस्से से होकर गुजरता है। वाहनों की आवाजाही वन्यजीवों के लिए जोखिम पैदा करती है, खासकर बाढ़ के दौरान जब जानवर सड़क पार करते हैं।
यानी काजीरंगा की समस्या यह नहीं है कि “जंगल बनाम विकास” में से एक को चुनना है। असली चुनौती यह है कि विकास इस तरह हो कि वन्यजीवों के रास्ते और आवास न टूटें।
एक रास्ता यह है कि पूरे क्षेत्र को एक समान 10 किलोमीटर के नियम से देखने के बजाय जोन के हिसाब से अलग-अलग नियम बनाए जाएं। जहां गांव और पुरानी बस्तियां हैं, वहां अलग नियम हो सकते हैं। जहां महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर हैं, वहां ज्यादा कड़ा संरक्षण हो सकता है। पर्यटन क्षेत्रों के लिए अलग निर्माण मानक बनाए जा सकते हैं और संवेदनशील इलाकों में खनन या बड़े उद्योगों पर सख्त रोक रखी जा सकती है।
काजीरंगा के लिए यह मॉडल ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है क्योंकि यहां एक तरफ इंसानी आबादी है और दूसरी तरफ ऐसा वन्यजीव तंत्र है जिसे सिर्फ पार्क की चारदीवारी के भीतर सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।
काजीरंगा के ESZ को लेकर बहस को सिर्फ '10 किलोमीटर अच्छा और 1 किलोमीटर खराब' के रूप में देखना सही नहीं होगा। 10 किलोमीटर का क्षेत्र स्थानीय आबादी और विकास पर ज्यादा प्रतिबंध ला सकता है। लेकिन बहुत छोटा सुरक्षा क्षेत्र वन्यजीवों के लिए जरूरी बाहरी आवास और कॉरिडोर को पर्याप्त सुरक्षा न दे पाए, तो समस्या दूसरी तरफ पैदा होगी।
अगर किसी इलाके में गांव हैं तो वहां लोगों की आजीविका को ध्यान में रखना होगा। लेकिन अगर वही जमीन हाथियों और गैंडों के आवाजाही मार्ग में आती है तो वहां विकास की सीमा भी तय करनी होगी।
असम सरकार का 1 से 3 किलोमीटर वाला प्रस्ताव अभी अंतिम फैसला नहीं है। फिलहाल 10 किलोमीटर का डिफॉल्ट सुरक्षा प्रावधान लागू है। लेकिन यह बहस एक बड़े सवाल को सामने लाती है, क्या किसी नेशनल पार्क की सुरक्षा सिर्फ उसकी सीमा के अंदर की जा सकती है? काजीरंगा का जवाब शायद नहीं है।
ब्रह्मपुत्र की बाढ़ के दौरान जानवर पार्क से बाहर निकलते हैं, हाथी पहाड़ियों की तरफ जाते हैं और गैंडे कई बार इंसानी बस्तियों के करीब पहुंच जाते हैं। इसलिए काजीरंगा को बचाने के लिए सिर्फ पार्क की जमीन नहीं, बल्कि उसके आसपास के कॉरिडोर, जंगल, जलस्रोत और संवेदनशील इलाके भी सुरक्षित रखने होंगे।