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टीबी ठीक होने के बाद भी खतरा खत्म नहीं, भारतीय रिसर्च ने बढ़ाई चिंता

TB Recurrence after treatment: भारतीय रिसर्च के नये खुलासे ने बढ़ाई स्वास्थ्य मंत्रालय की चिंता, इलाज के बाद भी दोबारा संक्रमित कर रही टीबी, जानिए क्या कहती है रिपोर्ट?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 18, 2026

TB Recurrence after treatment

TB Recurrence after treatment: इलाज के बाद भी टीबी का जोखिम बरकरार (AI Creative)

TB Recurrence after treatment: दवा का कोर्स पूरा होने के बाद मरीज को अक्सर ठीक मान लिया जाता है, लेकिन 2026 की नई भारतीय रिसर्च बताती है कि टीबी से उबर चुके लोगों में बीमारी दोबारा लौटने का जोखिम बना रहता है। ऐसे मरीजों और उनके परिवारों की इलाज के बाद निगरानी अब टीबी नियंत्रण की अगली बड़ी चुनौती बन सकती है। कल्पना कीजिए, किसी मरीज ने महीनों तक टीबी की दवाएं लीं, जांच में बीमारी नियंत्रित हुई और डॉक्टर ने उपचार पूरा होने की पुष्टि कर दी। परिवार ने राहत की सांस ली और जिंदगी फिर सामान्य हो गई।

लेकिन क्या टीबी की कहानी यहीं खत्म हो जाती है?

2026 की एक नई भारतीय रिसर्च का जवाब है, ऐसा होना जरूरी नहीं। जुलाई 2026 में The Lancet Global Health में प्रकाशित TB Aftermath अध्ययन ने भारत में टीबी से ठीक हो चुके मरीजों और उनके परिवारों को इलाज पूरा होने के बाद भी निगरानी में रखने की जरूरत पर नई रोशनी डाली है। महाराष्ट्र के छह सरकारी टीबी क्लीनिकों से जुड़े इस अध्ययन में 1,076 टीबी सर्वाइवर्स और उनके 3,309 घरेलू संपर्कों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों को उपचार पूरा होने के बाद फॉलो किया गया।

दवा खत्म हुई, लेकिन जोखिम नहीं

अध्ययन में उपचार पूरा करने के बाद 12 महीनों के दौरान 75 यानी करीब 7 प्रतिशत टीबी सर्वाइवर्स में दोबारा टीबी का पता चला। वहीं 3,309 घरेलू संपर्कों में 30 यानी करीब 0.9 प्रतिशत लोगों में टीबी मिली। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मरीजों की निगरानी केवल अस्पताल तक सीमित नहीं थी। शोधकर्ताओं ने फोन आधारित स्क्रीनिंग और घर जाकर की जाने वाली स्क्रीनिंग की तुलना की। दोनों तरीकों से मामलों की पहचान हुई, लेकिन टीबी सर्वाइवर्स में घर जाकर की गई स्क्रीनिंग से दोबारा बीमारी पकड़ने की दर अधिक रही।

इसका मतलब यह नहीं कि टीबी का इलाज बेअसर है। बल्कि संदेश यह है कि इलाज पूरा होने के बाद भी कुछ मरीजों में बीमारी लौट सकती है और ऐसे मरीजों की पहचान जितनी जल्दी होगी, उतना बेहतर।

क्या भारत में टीबी मरीज वास्तव में बढ़ रहे हैं?

यहां आंकड़ों को समझना जरूरी है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में टीबी का अनुमानित इंसिडेंस यानी नए बीमारी मामलों का बोझ कुल मिलाकर नीचे आया है, हालांकि कोविड के दौरान इसमें उतार-चढ़ाव देखा गया।

सरकार के 2024 के भारत टीबी रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए राष्ट्रीय मॉडल के अनुसार अनुमानित नए मामलों की संख्या 2020 में लगभग 27.47 लाख, 2021 में 28.15 लाख, 2022 में 28.20 लाख और 2023 में करीब 27.80 लाख थी। यानी कोविड के दौरान गिरावट के बाद 2021-22 में अनुमानित बोझ फिर बढ़ा और उसके बाद नीचे आया।

WHO की 2025 रिपोर्ट के अनुसार 2024 में भारत में टीबी की अनुमानित इंसीडेंस दर 2015 की तुलना में करीब 21 प्रतिशत कम हुई। इसके बावजूद भारत में 2024 में दुनिया के कुल नए टीबी मामलों का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा था—यानी वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा हिस्सा। इसलिए तस्वीर दो हिस्सों वाली है। भारत ने टीबी के बोझ को कम करने में प्रगति की है, लेकिन मरीजों की संख्या अभी भी इतनी बड़ी है कि इलाज के बाद की निगरानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

एक और भारतीय रिसर्च ने भी दिया संकेत

2024 में प्रकाशित भारतीय कोहोर्ट अध्ययन में 1,164 ऐसे लोगों को देखा गया, जिन्होंने पल्मोनरी टीबी का उपचार पूरा किया था। इनमें 95 यानी करीब 8 प्रतिशत लोगों में टीबी दोबारा हुई। दोबारा बीमारी सामने आने का मेडियन समय लगभग छह महीने था। कम BMI, उपचार के दूसरे महीने में पॉजिटिव कल्चर और पुरुष लिंग जैसे कुछ कारक रिक्योरेंस के ज्यादा जोखिम से जुड़े पाए गए।

2026 में प्रकाशित बच्चों पर एक अलग भारतीय अध्ययन में भी उपचार के बाद 7.9 प्रतिशत रिक्योरेंस की दर दर्ज की गई। अध्ययन में यह भी पाया गया कि कुछ बच्चों में उपचार के बाद फेफड़ों की कार्यक्षमता से जुड़ी असामान्यताएं बनी रहीं।

घर के बाकी सदस्यों को भी क्यों देखना जरूरी?

टीबी केवल मरीज की बीमारी नहीं है। घर में रहने वाले लोगों को भी संक्रमण का जोखिम हो सकता है। WHO के मुताबिक टीबी मरीजों के घरेलू संपर्कों में संक्रमण और बीमारी का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में अधिक हो सकता है और संपर्कों की स्क्रीनिंग तथा जरूरत पड़ने पर प्रीवेंटिव ट्रीटमेंट टीबी नियंत्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

TB Aftermath अध्ययन में भी घरेलू संपर्कों में करीब 1 प्रतिशत लोगों में टीबी का पता चलना इस बात का संकेत करता है कि मरीज के इलाज के बाद परिवार की कहानी को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।