समाचार

ज़रा याद करो कुर्बानी: एक कविता ने अंग्रेजों के सामने मेवाड़ का सिर नहीं झुकने दिया, जानिए केसरी सिंह बारहठ की कहानी

Kesari Singh Barhath: सन 1903 में केसरी सिंह बारहठ के 13 सोरठों ने महाराणा फतेह सिंह को मेवाड़ के स्वाभिमान की याद दिलाई। जानिए ‘चेतावणी रा चूंगट्या’ की वह कहानी, जिसने दिल्ली दरबार में मेवाड़ की खाली कुर्सी को प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया।
5 min read
Aug 10, 2026
Freedom Fighter Kesri Singh Barhath News
भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी केसरीसिं​ह बारहठ। ( फोटो : AI)

राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल तलवारों और युद्धों की गाथा नहीं है। इस इतिहास में ऐसे शब्द भी हैं, जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी और राजपूताना के स्वाभिमान को जगाया। इन्हीं में एक नाम है चारण कवि और क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहठ का। उनकी रचना ‘चेतावणी रा चूंगट्या’ राजस्थान के राष्ट्रवादी साहित्य की ऐसी कृति मानी जाती है, जिसने 1903 के दिल्ली दरबार के दौरान मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह के सामने उनके वंश की गौरवशाली परंपरा और स्वाभिमान का प्रश्न खड़ा कर दिया।

महाराणा फतेह सिंह को भी इस दरबार में शामिल होने के लिए बुलाया गया

सन 1903 में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने दिल्ली में भव्य दरबार आयोजित किया था। इसमें देशी रियासतों के शासकों को आमंत्रित किया गया था। महाराणा फतेह सिंह को भी इस दरबार में शामिल होने के लिए बुलाया गया। उस समय मेवाड़ के शासक का ब्रिटिश सत्ता के इस औपचारिक दरबार में शामिल होना केवल एक राजकीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था।

यहीं केसरी सिंह बारहठ की भूमिका सामने आती है।

13 सोरठों में छिपी थी स्वाभिमान की चेतावनी

केसरी सिंह बारहठ ने डिंगल भाषा में 13 सोरठे रचे, जिन्हें ‘चेतावणी रा चूंगट्या’ के नाम से जाना गया। इन पंक्तियों का उद्देश्य महाराणा फतेह सिंह को मेवाड़ के इतिहास, सिसोदिया परंपरा और राजपूत स्वाभिमान की याद दिलाना था।

‘चूंगट्या’ का अर्थ : जो व्यक्ति को झकझोर दे

‘चूंगट्या’ का अर्थ यहां ऐसे संकेत या चुभती हुई चेतावनियों से लिया जाता है, जो व्यक्ति को झकझोर दे। कविता में यह भाव उभरता है कि जिस मेवाड़ की परंपरा ने विदेशी शक्तियों के सामने स्वतंत्रता और सम्मान को सर्वोच्च माना, उसके महाराणा को ब्रिटिश साम्राज्य के दरबार में जाकर औपचारिक अधीनता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

जोरावर सिंह बारहठ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, ये सोरठे महाराणा तक पहुंचाने में केसरी सिंह के छोटे भाई जोरावर सिंह बारहठ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। महाराणा दिल्ली की ओर रवाना हो चुके थे, इसलिए संदेश यात्रा के दौरान उन्हें पहुंचाया गया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम ने हमें ऐसे दिलाई आजादी। (विजुअल: AI)

महाराणा दिल्ली पहुंचे, लेकिन दरबार में नहीं बैठे

इस प्रसंग को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। अक्सर यह कहा जाता है कि केसरी सिंह की कविता के बाद महाराणा फतेह सिंह ने दिल्ली जाने का फैसला ही रद्द कर दिया था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण इस दावे को पूरी तरह सही नहीं ठहराते।

एक कविता के कारण महाराणा फतेह सिंह ने 1903 के दिल्ली दरबार में हिस्सा नहीं लिया

महाराणा फतेह सिंह दिल्ली पहुंचे, लेकिन उन्होंने 1903 के दिल्ली दरबार में हिस्सा नहीं लिया। यही इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। दरबार में उनकी अनुपस्थिति ब्रिटिश सरकार के लिए प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण थी और उनकी निर्धारित जगह खाली रही। इसलिए ‘चेतावणी रा चूंगट्या’ को केवल एक कविता कहना इसके प्रभाव को छोटा करना होगा। यह उस समय राजकीय सत्ता और औपनिवेशिक प्रभुत्व के बीच स्वाभिमान की भाषा में दिया गया एक राजनीतिक संदेश था।

कौन थे केसरी सिंह बारहठ?

केसरी सिंह बारहठ का जन्म 21 नवंबर 1872 को शाहपुरा रियासत के निकट देवपुरा में हुआ था। उनके पिता ठाकुर कृष्ण सिंह बारहठ मेवाड़ के महाराणा के सलाहकारों में रहे थे। राजस्थान पर्यटन विभाग भी शाहपुरा को केसरी सिंह, जोरावर सिंह और प्रताप सिंह बारहठ जैसे स्वतंत्रता सेनानियों से जोड़ता है।

केसरी सिंह का व्यक्तित्व साहित्य, इतिहास और क्रांतिकारी राजनीति का अनोखा मेल था

केसरी सिंह केवल कवि नहीं थे। उन्हें डिंगल और संस्कृत सहित कई भाषाओं तथा इतिहास, दर्शन और भारतीय परंपराओं का गहरा ज्ञान था। प्रारंभिक जीवन में उन्होंने राजकीय सेवा से भी जुड़कर काम किया, लेकिन धीरे-धीरे उनका झुकाव ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर बढ़ता गया। उनका व्यक्तित्व साहित्य, इतिहास और क्रांतिकारी राजनीति का अनोखा मेल था।

कविता से क्रांति तक का सफर

‘चेतावणी रा चूंगट्या’ के बाद केसरी सिंह बारहठ का राजनीतिक और क्रांतिकारी जीवन और अधिक सक्रिय हुआ। 1910 में वीर भारत सभा की स्थापना उनके नाम से जुड़ी है। कुछ ऐतिहासिक विवरणों में राव गोपाल सिंह खरवा की सहयोगी भूमिका का भी उल्लेख मिलता है। इसका उद्देश्य राजस्थान में ब्रिटिश विरोधी चेतना और क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित करना था।

वे वर्धा गए और वहां राष्ट्रवादी गतिविधियों से जुड़े रहे

ब्रिटिश खुफिया तंत्र की नजर भी उन पर बनी हुई थी। आगे चलकर उन्हें गिरफ्तार किया गया और हजारीबाग केंद्रीय जेल भेजा गया। 1920 में रिहाई के बाद वे वर्धा गए और वहां राष्ट्रवादी गतिविधियों से जुड़े रहे।

बारहठ परिवार भी बना क्रांति की पहचान

केसरी सिंह की क्रांतिकारी विरासत केवल उनके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रही। उनके छोटे भाई जोरावर सिंह बारहठ और पुत्र कुंवर प्रताप सिंह बारहठ भी ब्रिटिश विरोधी क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े।

लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले के प्रसंग में जोरावर सिंह और प्रताप सिंह के नाम सामने आते हैं

सन 1912 के दिल्ली षड्यंत्र और लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले के प्रसंग में जोरावर सिंह और प्रताप सिंह के नाम सामने आते हैं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली में लॉर्ड हार्डिंग के जुलूस के दौरान बम फेंका गया था। हार्डिंग हमले में घायल हुए, जबकि उनका एक अंगरक्षक मारा गया। प्रताप सिंह बाद में गिरफ्तार हुए और उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं। उन्होंने क्रांतिकारी साथियों की जानकारी देने से इनकार किया। बारहठ परिवार का यह अध्याय राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन में त्याग और बलिदान की एक अलग मिसाल बन गया।

‘राजस्थान केसरी’ से राष्ट्रवादी पत्रकारिता तक

1920 के दशक में केसरी सिंह बारहठ वर्धा पहुंचे। उनके नाम पर ‘राजस्थान केसरी’ साप्ताहिक निकाला गया, जिसका संपादन विजय सिंह पथिक ने किया। यह समाचार पत्र राजस्थान में राजनीतिक चेतना और किसान आंदोलनों से जुड़े मुद्दों को सामने लाने का माध्यम बना। केसरी सिंह बारहठ का संबंध राजस्थान सेवा संघ की गतिविधियों से भी रहा। उपलब्ध विवरणों के अनुसार वर्धा में राजस्थान सेवा संघ के गठन में केसरी सिंह बारहठ, अर्जुनलाल सेठी और विजय सिंह पथिक की भूमिका रही।

चेतावणी रा चूंगट्या: शब्द बने हथियार

केसरी सिंह बारहठ की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने साहित्य को केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं रहने दिया। उनके लिए कविता सामाजिक और राजनीतिक चेतना का माध्यम थी।

‘चेतावणी रा चूंगट्या’ इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। 1903 में लिखे गए इन 13 सोरठों ने मेवाड़ की ऐतिहासिक स्मृति, राजपूत स्वाभिमान और ब्रिटिश सत्ता के बीच एक सीधा संवाद स्थापित किया।

उनकी कहानी यह बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन में प्रतिरोध के कई रूप थे। कहीं तलवार उठी, कहीं सत्याग्रह हुआ और कहीं कविता ने सत्ता के सामने सवाल खड़ा कर दिया।

आज भी क्यों याद किए जाते हैं केसरी सिंह?

आज केसरी सिंह बारहठ को याद करना केवल अतीत को दोहराना नहीं है। उनकी कहानी यह बताती है कि इतिहास में शब्दों की शक्ति कितनी गहरी हो सकती है।

एक कवि ने 13 सोरठे लिखे। वे सोरठे एक महाराणा तक पहुंचे। महाराणा दिल्ली गए, लेकिन ब्रिटिश दरबार में नहीं बैठे। उनकी खाली कुर्सी एक राजनीतिक प्रतीक बन गई।

इसीलिए ‘चेतावणी रा चूंगट्या’ राजस्थान के इतिहास में केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि स्वाभिमान, प्रतिरोध और राष्ट्रीय चेतना का दस्तावेज बनकर सामने आती है।

केसरी सिंह बारहठ की विरासत यही संदेश देती है-सत्ता बड़ी हो सकती है, लेकिन इतिहास में उसकी चुनौती का जवाब हमेशा हथियारों से ही नहीं दिया जाता। कभी-कभी कुछ सधे हुए शब्द भी पूरे दौर की चेतना को झकझोर सकते हैं।

Updated on:
10 Aug 2026 12:14 pm
Published on:
10 Aug 2026 12:14 pm