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आज से पितृपक्ष शुरू: इन 8 पवित्र स्थलों पर पिंडदान से पितरों को मिलती है मोक्ष की राह, जानें गयाजी के विश्व प्रसिद्ध स्थान

आज से शुरू पितृपक्ष की शुरुआत हो गई है। पितृपक्ष के दौरान गयाजी (बिहार) दुनिया भर के सनातन श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। आइए जानते हैं, गयाजी की धार्मिक मान्यता और प्रसिद्ध स्थान।
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भारत

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Vinay Shakya

•

Sep 27, 2026

famous pilgrimage of gayaji

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

बिहार का गयाजी पितृपक्ष के दौरान दुनिया भर के सनातन श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। इस साल पितृपक्ष 26-27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा, यानी 16 दिनों का यह पवित्र पखवाड़ा अभी शुरू ही हुआ है। धार्मिक मान्यता है कि गयाजी में पिंडदान और तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यही वजह है कि हर साल देश-विदेश से लाखों लोग अपने पूर्वजों के निमित्त यहां पहुंचते हैं। शास्त्रों में गयाजी को पितृ कर्म के लिए सर्वोच्च तीर्थ बताया गया है और मान्यता है कि यहां विधि-विधान से पिंडदान करने पर सात पीढ़ियों तक के पितरों का उद्धार होता है।

गयाजी में 45 से अधिक पवित्र स्थल

गयाजी की महत्ता केवल विष्णुपद मंदिर या फल्गु नदी तक सीमित नहीं है। पूरे क्षेत्र में 45 से अधिक ऐसे पवित्र स्थल हैं, जहां पिंडदान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हर स्थान से अलग-अलग तरह के पितृ दोष तथा पारिवारिक बाधाओं से मुक्ति की मान्यता जुड़ी है। विष्णुपद मंदिर को पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है, जहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न स्थापित होने की मान्यता है।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार वर्तमान मंदिर का निर्माण 1787 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। करीब 100 फीट ऊंचा यह अष्टकोणीय मंदिर काले ग्रेनाइट पत्थरों (मुंगेर पत्थर) से बना है और 44 खंभों पर टिका है। फल्गु नदी के तट पर पिंडदान-तर्पण की परंपरा बेहद प्राचीन मानी जाती है। मान्यता है कि माता सीता ने इसी नदी किनारे अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान किया था, इसलिए यहां तर्पण करने से पितरों की आत्मा तृप्त होने की मान्यता है।

अक्षयवट से जुड़ी मान्यता

अक्षयवट को अमर वटवृक्ष माना जाता है, जहां पिंडदान से पितरों को स्थायी शांति मिलने और परिवार पर उनका आशीर्वाद बने रहने का विश्वास है। वहीं, प्रेतशिला पर्वत का संबंध उन आत्माओं से जोड़ा जाता है, जिनकी मृत्यु असामान्य या अकाल परिस्थितियों में हुई हो। यहां पिंडदान से प्रेत बाधा और पितृ दोष से मुक्ति की मान्यता है।

भगवान राम से जुड़ी है रामशिला पर्वत

रामशिला पर्वत को भगवान राम के अपने पिता के निमित्त श्राद्ध कर्म से जोड़ा जाता है, तो सीता कुंड को माता सीता के पितृ कर्म से। इनके अलावा ब्रह्मयोनि पर्वत, धर्मारण्य, मंगला गौरी, उत्तरमानस, सूर्यकुंड और वैतरणी जैसे स्थान भी पिंडदान स्थलों में शामिल हैं, जहां अलग-अलग पितृ दोष, ग्रह बाधा और पारिवारिक कष्टों से मुक्ति की मान्यता जुड़ी है।

देश-विदेश से आते हैं श्रद्धालु

पितृपक्ष मेले का महत्व सिर्फ बिहार या भारत तक सीमित नहीं है। मेले के दौरान नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस, अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों से लाखों श्रद्धालु गयाजी पहुंचते हैं। इसे देखते हुए इस बार बिहार सरकार ने विष्णुपद मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस (बीएसएपी) को सौंपी है, ताकि भीड़ नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बेहतर तरीके से संभाली जा सके। जिला प्रशासन ने मेला शुरू होने से पहले धर्मशालाओं में 65 कमरे तैयार करने का निर्देश दिया था। सड़क, नाली, बिजली, चापाकल, पेयजल, शौचालय और पिंडदान वेदियों जैसी बुनियादी सुविधाओं की समीक्षा विधानसभा अध्यक्ष स्तर पर भी हो चुकी है। शहर में श्रद्धालुओं के लिए तीन प्रमुख प्रवेश द्वार भी बनाए जा रहे हैं।

इसके साथ ही विष्णुपद मंदिर परिक्षेत्र के सौंदर्यीकरण पर 61 करोड़ रुपये, फल्गु नदी किनारे नई धर्मशाला और पार्किंग सुविधा पर 58 करोड़ रुपये, तथा नदी के पश्चिमी तट पर एप्रोच पथ के निर्माण पर 25 करोड़ रुपये की विकास योजनाएं भी चल रही हैं, जो गयाजी को एक आधुनिक तीर्थनगरी का रूप देने की दिशा में सरकार के प्रयासों को दिखाती हैं।

धर्मशास्त्रों के अनुसार गयाजी में विधिपूर्वक पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। वंशजों को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। इसी मान्यता के चलते पितृपक्ष के 16 दिनों में यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। कहा जाता है कि श्रद्धा व नियमपूर्वक किया गया पिंडदान का पुण्य कभी क्षीण नहीं होता।