
आज मोबाइल फोन सिर्फ बात करने का साधन नहीं है। बैंकिंग, पढ़ाई, सरकारी योजनाएं, टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन भुगतान और खेती से जुड़ी जानकारी तक पहुंच अब मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर हो चुकी है। ऐसे में जब देश 5G और सैटेलाइट इंटरनेट की बात कर रहा है, तब एक सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है, क्या भारत के हर गांव तक मोबाइल नेटवर्क पहुंच चुका है?
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत ने पिछले एक दशक में ग्रामीण कनेक्टिविटी के क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है, लेकिन अभी भी हजारों गांव ऐसे हैं जहां 3G या 4G मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंच पाया है।
भारत के रजिस्ट्रार जनरल के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 6.44 लाख गांव हैं। इनमें से मई 2025 तक 6.29 लाख से अधिक गांव मोबाइल नेटवर्क से जुड़ चुके थे, यानी लगभग 97.65% गांवों तक मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंच चुकी थी। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर गांव में तेज इंटरनेट उपलब्ध है।
संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार फरवरी 2026 तक देश में 11,515 गांव ऐसे थे जहां 3G या 4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं थी। यानी देश के लगभग 98 प्रतिशत गांव मोबाइल नेटवर्क से जुड़े हैं, लेकिन करीब 2 प्रतिशत गांव अभी भी डिजिटल मानचित्र से पूरी तरह नहीं जुड़े हैं।
पहली नजर में यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन इनमें से अधिकांश गांव बेहद दुर्गम, पहाड़ी, सीमावर्ती या घने जंगलों वाले क्षेत्रों में स्थित हैं।
मोबाइल टावर लगाना केवल तकनीकी काम नहीं है। कई बार भौगोलिक परिस्थितियां बड़ी चुनौती बन जाती हैं।
पहाड़ी और सीमावर्ती इलाके : लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कई गांव ऊंचे पहाड़ों में स्थित हैं। वहां सड़क, बिजली और टावर निर्माण बेहद कठिन होता है।
घने जंगल : छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ वन क्षेत्रों में आबादी कम और दूरी ज्यादा होने के कारण निजी कंपनियों के लिए निवेश लाभकारी नहीं माना जाता।
कम व्यावसायिक लाभ : कई गांवों में आबादी इतनी कम है कि टावर लगाने का खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से सरकार को विशेष सब्सिडी योजनाएं चलानी पड़ती हैं।
2015 में शुरू हुए डिजिटल इंडिया अभियान का एक बड़ा लक्ष्य था कि देश के हर नागरिक तक डिजिटल सेवाएं पहुंचें।
पिछले कुछ वर्षों में:
मार्च 2025 तक देश में लगभग 40 करोड़ से अधिक ग्रामीण इंटरनेट उपयोगकर्ता थे। इसके बावजूद जिन गांवों में नेटवर्क नहीं है, वहां डिजिटल सेवाओं का लाभ सीमित रह जाता है।
शिक्षा : आज स्कूल और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन हो चुका है। नेटवर्क नहीं होने पर छात्रों को डिजिटल सामग्री तक पहुंच नहीं मिलती।
बैंकिंग : UPI, DBT, आधार आधारित भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। नेटवर्क की कमी सीधे वित्तीय समावेशन को प्रभावित करती है।
स्वास्थ्य : टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन परामर्श जैसी सेवाएं नेटवर्क पर निर्भर हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में इसका महत्व और बढ़ जाता है।
खेती : मौसम की जानकारी, बाजार भाव, सरकारी योजनाएं और कृषि सलाह मोबाइल के जरिए किसानों तक पहुंचती हैं। कमजोर नेटवर्क किसानों को इन सेवाओं से दूर कर सकता है।
सरकार ने 2022 में 4G Saturation Project शुरू किया था। इस परियोजना का उद्देश्य देश के 24,680 ऐसे गांवों तक 4G नेटवर्क पहुंचाना है जहां मोबाइल सेवा उपलब्ध नहीं थी। इसके साथ ही 6,279 गांवों में मौजूद 2G और 3G नेटवर्क को 4G में अपग्रेड करने की योजना बनाई गई। इस परियोजना पर 26,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च का प्रावधान किया गया है और इसका बड़ा हिस्सा BSNL के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट दो अलग चीजें हैं। जहां मोबाइल टावर आवाज और डेटा सेवा देते हैं, वहीं भारतनेट परियोजना गांवों तक हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड पहुंचाने के लिए शुरू की गई है।
दिसंबर 2025 तक 2.14 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों को सेवा-तैयार (Service Ready) बनाया जा चुका था। सरकार का लक्ष्य देश की सभी ग्राम पंचायतों और लाखों गांवों तक फाइबर नेटवर्क पहुंचाना है।
भारत दुनिया के सबसे तेजी से 5G नेटवर्क विस्तार करने वाले देशों में शामिल है। फरवरी 2026 तक:
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर गांव में 5G उपलब्ध है। अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी 4G ही प्रमुख तकनीक है।
यहीं पर सैटेलाइट इंटरनेट की चर्चा शुरू होती है। एलन मस्क की कंपनी Starlink पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में हजारों उपग्रहों के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है।
OneWeb (अब Eutelsat OneWeb) भी भारत में सैटेलाइट आधारित ब्रॉडबैंड सेवाओं की तैयारी कर रही है। इन तकनीकों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें मोबाइल टावर या फाइबर नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता। इसलिए पहाड़ी, जंगल और द्वीपीय क्षेत्रों में इंटरनेट पहुंचाने में इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है। हालांकि लागत, लाइसेंस और उपकरणों की कीमत जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
सरकार की वर्तमान योजनाओं को देखें तो लक्ष्य स्पष्ट है। हर गांव तक मोबाइल और इंटरनेट पहुंचाना। 4G Saturation Project, BharatNet, BSNL 4G विस्तार और भविष्य की सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं मिलकर उस डिजिटल अंतर को कम करने की कोशिश कर रही हैं जो आज भी हजारों गांवों को बाकी भारत से अलग करता है।