
mp freedom fighter badal bhoi story: मध्य प्रदेश की आजादी की कहानी सिर्फ बड़े शहरों, कांग्रेस अधिवेशनों और चर्चित क्रांतिकारियों तक सीमित नहीं थी। सतपुड़ा के जंगलों और आदिवासी इलाकों में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐसी लड़ाइयां लड़ी जा रही थीं, जिनका जिक्र मुख्यधारा के इतिहास में बहुत कम मिलता है। ऐसी ही एक कहानी है छिंदवाड़ा के बादल भोई की।
एक ऐसे आदिवासी नेता की, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ हथियार उठाने के बजाय अपने लोगों को संगठित किया, जंगल और जमीन पर अपने अधिकार के लिए आवाज उठाई, और हजारों आदिवासियों को लेकर अंग्रेज अफसरों के सामने खड़ा हो गया।
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक उनका जन्म 1845 में छिंदवाड़ा जिले की परासिया तहसील के डुंगरिया तीतरा गांव में हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि 'भोई' उनका सरनेम नहीं, बल्कि एक सम्मानजनक उपाधि थी, इसका मतलब जमींदार, मालगुजार या संपन्न व्यक्ति होता है। यह उपाधि उन्हें उनके समर्थकों ने दी थी।
बादल भोई की कहानी समझने के लिए उस दौर के जंगल कानूनों को समझना जरूरी है। ब्रिटिश शासन के दौरान जंगलों पर सरकारी नियंत्रण लगातार बढ़ाया जा रहा था। लकड़ी, जंगल की उपज और चराई जैसे आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों पर पाबंदियां बढ़ने लगीं।
बादल भोई ने इसी व्यवस्था के खिलाफ लोगों को संगठित किया। उनकी लड़ाई सिर्फ अंग्रेज सरकार के खिलाफ राजनीतिक विरोध नहीं थी, यह जंगल, जमीन और अपने पारंपरिक जीवन के अधिकार की लड़ाई भी थी। भारत सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय के रिकॉर्ड में भी उन्हें ऐसे आदिवासी नेताओं में गिना गया है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान प्राकृतिक संसाधनों के शोषण के खिलाफ संघर्ष किया।
बादल भोई की कहानी का सबसे बड़ा अध्याय 1923 में सामने आया, जब असहयोग आंदोलन का दौर चल रहा था। उनके नेतृत्व में हजारों आदिवासी कलेक्टर के बंगले पर प्रदर्शन करने पहुंचे। यह कोई छोटा-मोटा स्थानीय प्रदर्शन नहीं था। इतने बड़े जनसमूह के सामने अंग्रेज प्रशासन ने लाठीचार्ज किया। इसमें बादल भोई खुद घायल हुए और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
कल्पना कीजिए कि, एक तरफ अंग्रेजी सत्ता का पूरा प्रशासनिक तंत्र था, दूसरी तरफ जंगलों से निकलकर आए हजारों आदिवासी, जिनके हाथों में आधुनिक हथियार नहीं थे। उनकी असली ताकत थी सिर्फ एकजुटता और उस भीड़ के आगे खड़ा था एक ऐसा नेता, जिसने अपने लोगों को पीछे हटने के बजाय अधिकारों के लिए आवाज उठाना सिखाया।
1923 की गिरफ्तारी के बाद भी बादल भोई का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। कुछ साल बाद उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया। इस बार आरोप था जंगल के कानून को तोड़ना। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें रामाकोना में गिरफ्तार कर चांदा जेल भेज दिया गया।
यानी करीब 85 साल की उम्र में भी वह अंग्रेजी शासन की नीतियों के खिलाफ डटे हुए थे। यह बात उनकी कहानी को और असाधारण बनाती है।
बादल भोई का तरीका हिंसक विद्रोह से ज्यादा जनसंगठन और अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित था। इसी वजह से उन्हें 'छिंदवाड़ा का गांधी' कहा गया। भारत सरकार के जनजातीय मामलों से जुड़े दस्तावेजों में भी उनका उल्लेख इसी उपनाम से मिलता है।
उनका संघर्ष इस बात का उदाहरण था कि स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ शहरों में पढ़े-लिखे नेताओं तक सीमित नहीं था। दूर-दराज के जंगलों में रहने वाले आदिवासी भी अपने तरीके से ब्रिटिश शासन को चुनौती दे रहे थे।
बादल भोई की जिंदगी का सबसे दर्दनाक अध्याय उनकी जेल यात्रा है। छिंदवाड़ा जिला प्रशासन और अन्य सरकारी रिकॉर्ड्स के मुताबिक, उन्होंने 1940 में जेल में ही अंतिम सांस ली। रिकॉर्ड्स में यह भी उल्लेख मिलता है कि ऐसी मान्यता है कि और एक ऐतिहासिक मान्यता है कि उन्हें कथित रूप से जहर दिए जाने की बात कही जाती है।
जिस व्यक्ति की कहानी देश के बड़े इतिहास में बहुत कम सुनाई देती है, उसके नाम पर आज छिंदवाड़ा में एक जनजातीय संग्रहालय है। इसकी शुरुआत 20 अप्रैल 1954 को हुई थी। 1975 में इसे राज्य संग्रहालय का दर्जा मिला, और 8 सितंबर 1997 को इसका नाम बदलकर श्री बादल भोई राज्य जनजातीय संग्रहालय कर दिया गया। यह मध्य प्रदेश के सबसे पुराने और सबसे बड़े जनजातीय संग्रहालयों में गिना जाता है।
यह सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब जंगल में रहने वाला एक पूरा समुदाय अपने जीने के अधिकार के लिए औपनिवेशिक सत्ता से टकरा रहा था।
बादल भोई ने शायद बड़े मंचों पर भाषण नहीं दिए, उनके नाम पर देशभर में सड़कें नहीं बनीं, उनकी तस्वीर हर स्कूल की किताब में नहीं पहुंची। लेकिन जब अंग्रेजी शासन ने जंगल और उसके संसाधनों पर नियंत्रण बढ़ाया, तब उन्होंने अपने लोगों को संगठित किया। 1923 में हजारों लोगों के साथ कलेक्टर के बंगले तक पहुंचना और फिर वन कानून तोड़ने के आरोप में जेल जाना, यह बताता है कि आजादी की लड़ाई मध्य प्रदेश के जंगलों में भी उतनी ही असली थी।
यानी यह कहानी है एक ऐसी शख्सियत की, जिसे अंग्रेजों ने जंगल का कानून तोड़ने के आरोप में जेल में डाल दिया, और वही बादल भोई हजारों आदिवासियों को लेकर अंग्रेजी सत्ता के सामने खड़ा हुआ था।