
MP Freedom fighter Dr Radheshyam Dwivedi: देश के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी के पीछे ऐसे स्थानीय कार्यकर्ताओं की भी लंबी कतार थी, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई को गांवों, कस्बों और युवाओं तक पहुंचाया। शिवपुरी जिले के करैरा के डॉ. राधेश्याम द्विवेदी भी ऐसे ही गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी थे।
उनकी भूमिका इसलिए अलग थी क्योंकि उन्होंने एक तरफ कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए गांव-गांव काम किया, तो दूसरी तरफ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत रहकर पर्चों और बुलेटिनों के माध्यम से लोगों तक आंदोलन का संदेश पहुंचाया। सरकारी रिकॉर्ड उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के साथ सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता के रूप में भी दर्ज करता है।
डॉ. राधेश्याम द्विवेदी का जन्म 26 जनवरी 1921 को करैरा, जिला शिवपुरी में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवप्रसाद दुबे था। उनका विवाह शांति द्विवेदी से हुआ, जो स्कूल की प्राचार्य थीं। देश उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था और स्वतंत्रता की मांग लगातार तेज हो रही थी। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार डॉ. द्विवेदी 1940 से ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने लगे थे। उनका काम केवल किसी एक सभा या प्रदर्शन तक सीमित नहीं था। वे करैरा परगना के अलग-अलग क्षेत्रों में जाते और लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए कांग्रेस की समितियां स्थापित करने का प्रयास करते थे। यानी आंदोलन को मजबूत करने के लिए उनका पहला मोर्चा संगठन खड़ा करना था।
ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन तभी व्यापक हो सकता था, जब आम लोग उसके साथ जुड़ें। डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ने इसी स्तर पर काम किया। वे करैरा परगना के अलग-अलग इलाकों में जाकर कांग्रेस समितियां बनाने और लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन के लिए प्रेरित करने में जुटे रहे। यह काम उस दौर में आसान नहीं था, क्योंकि अंग्रेजी शासन की नजर राजनीतिक गतिविधियों पर रहती थी। ऐसे में स्थानीय स्तर पर संगठन खड़ा करना केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि जोखिम उठाने वाला काम भी था। उनकी इसी सक्रियता ने उन्हें कांग्रेस संगठन के महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं में जगह दिलाई।
फिर आया साल 1942, जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ निर्णायक माहौल बनाया। अगस्त 1942 में डॉ. राधेश्याम द्विवेदी जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव थे। यह जिम्मेदारी बताती है कि उस समय तक वे स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका हासिल कर चुके थे। भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अंग्रेजी सरकार ने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई तेज कर दी। सार्वजनिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा और आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गई।
जब खुलकर आंदोलन मुश्किल हुआ, तो भूमिगत हो गए अंग्रेजी शासन की कार्रवाई के बीच डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ने भूमिगत होकर काम करना शुरू किया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने तत्कालीन स्टेट कांग्रेस महासचिव यशवंत सिंह कुशवाहा के मार्गदर्शन में भूमिगत रहते हुए स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काम किया। यहीं से उनकी कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय शुरू होता है। वे किसी खुले मंच से भाषण देने के बजाय ऐसे माध्यम का इस्तेमाल करने लगे, जिसे आम लोगों तक पहुंचाया जा सके और जिसके जरिए आंदोलन का संदेश लगातार जीवित रखा जा सके।
जब ब्रिटिश शासन की निगरानी बढ़ गई थी, उस समय आंदोलन की जानकारी और विचारों को लोगों तक पहुंचाना अपने आप में चुनौती था। डॉ. द्विवेदी ने भूमिगत रहकर पर्चों और बुलेटिनों के माध्यम से जनजागरण का काम किया। सरकारी रिकॉर्ड में उनके इस काम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। आज के दौर में जब सूचना कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, उस समय एक पर्चा तैयार करना, उसे सुरक्षित तरीके से लोगों तक पहुंचाना और फिर उसका संदेश आगे फैलाना पूरी तरह अलग चुनौती थी।
इसलिए डॉ. द्विवेदी की भूमिका को केवल 'पर्चे बांटने' तक सीमित नहीं थी। वे उस समय भूमिगत सूचना और जनजागरण तंत्र का हिस्सा थे, जिसके जरिए आंदोलन की आवाज दबने नहीं दी गई।
उनकी गतिविधियां केवल शिवपुरी और करैरा तक सीमित नहीं रहीं। ऐतिहासिक पन्नों में में मिली जानकारी के मुताबिक झांसी में उन्होंने पंडित रमेश्वर प्रसाद शर्मा के साथ मिलकर युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित किया। युवाओं को आंदोलन से जोड़ना उस समय बेहद महत्वपूर्ण था। युवा ही आंदोलन के संदेश को तेजी से अलग-अलग इलाकों तक ले जा सकते थे और संगठन को नई ऊर्जा दे सकते थे। इस तरह डॉ. द्विवेदी का काम दो स्तरों पर दिखाई देता है, एक तरफ भूमिगत प्रचार और दूसरी तरफ युवाओं को आंदोलन के लिए तैयार करना।
डॉ. राधेश्याम द्विवेदी की कहानी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष उनका सामाजिक कार्य है। उन्होंने हरिजनों और सामाजिक उत्पीड़न झेल रहे आदिवासी समुदायों के कल्याण और अधिकारों के लिए भी काम किया। उनका उद्देश्य इन समुदायों को सम्मानजनक जीवन दिलाने की दिशा में काम करना था। यही वजह थी कि इन समुदायों में उनके प्रति सम्मान पैदा हुआ। इससे उनकी स्वतंत्रता की अवधारणा का एक व्यापक रूप सामने आता है। उनके लिए देश की आजादी केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं थी, बल्कि समाज के उन लोगों को सम्मान और अधिकार दिलाना भी था जो, सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न का सामना कर रहे थे।
स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने डॉ. राधेश्याम द्विवेदी को प्रशस्ति-पत्र दिया और विभिन्न अवसरों पर उनका सम्मान भी किया गया। स्वतंत्रता के बाद भी वे जिला स्वतंत्रता सेनानी संगठन से जुड़े रहे और राष्ट्रीय हित से जुड़े कार्यों में सक्रिय रहे।
डॉ. राधेश्याम द्विवेदी की कहानी किसी एक बड़ी घटना की कहानी नहीं है। यह उन हजारों स्थानीय कार्यकर्ताओं की तरह एक लंबा संघर्ष है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की जमीन तैयार की। उन्होंने 1940 से आंदोलन में सक्रियता शुरू की, करैरा परगना में कांग्रेस समितियां बनाने के लिए काम किया, 1942 में जिला कांग्रेस के महासचिव बने, दमन बढ़ने पर भूमिगत हुए, पर्चों और बुलेटिनों से आंदोलन का संदेश फैलाया, झांसी में युवाओं को जोड़ा और साथ ही वंचित समुदायों के सामाजिक अधिकारों के लिए काम किया।
यही वजह है कि शिवपुरी के इस गुमनाम क्रांतिवीर की कहानी स्वतंत्रता आंदोलन के उस हिस्से को सामने लाती है, जो बड़े नामों के पीछे अक्सर दिखाई नहीं देता, वह संघर्ष जो पर्चों, छोटे संगठनों, युवाओं और गांव-कस्बों के बीच चुपचाप चलता रहा।