11 अगस्त 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

नौकरी छोड़ी, जेल गए, कैदखाने की दीवारों के बीच लिख दी आजादी की कविता, पं. ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी की अनकही कहानी

Pandit Jwala Prasad Jyotishi: नरसिंहपुर के करेली में जन्मे पं. ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी छात्र जीवन से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए। 1930 में जेल गए और 1942 में नौकरी छोड़कर भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए। नागपुर सेंट्रल जेल में करीब डेढ़ साल में उन्होंने कविता और साहित्य लिखा, जबकि आजादी के बाद पत्रकारिता, शिक्षा और राजनीति के जरिए भी देशसेवा जारी रखी..
3 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 11, 2026

MP Freedom Fighter Jwala Prasad Jyotishi

MP Freedom Fighter Jwala Prasad Jyotishi (AI creative)

Pandit Jwala Prasad Jyotishi: कभी-कभी क्रांति बंदूक से नहीं, कलम से भी लड़ी जाती है। मध्य प्रदेश की धरती ने ऐसे कई स्वतंत्रता सेनानी पैदा किए, जिनके नाम इतिहास की बड़ी किताबों में बहुत ज्यादा नहीं मिलते। लेकिन उनकी जिंदगी का एक-एक पन्ना आज की पीढ़ी को यह बताता है कि आजादी सिर्फ एक राजनीतिक आंदोलन नहीं थी, यह एक ऐसा जुनून था, जिसके लिए लोगों ने नौकरी, पढ़ाई, सुख-सुविधा और अपना भविष्य तक दांव पर लगा दिया। ऐसे ही एक नाम थे पंडित ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी।

ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी का जन्म 14 मार्च 1908 को नरसिंहपुर जिले के करेली में हुआ था। उनके पिता झुमुक लाल किसान थे। बचपन में मां का निधन हो गया और उनका पालन-पोषण नाना ने किया। बाद में उनका परिवार सागर चला गया और सागर ही उनकी कर्मभूमि बन गया। लेकिन शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि यह युवक आगे चलकर स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, पत्रकार और कवि, चारों भूमिकाओं में अंग्रेजी शासन को चुनौती देगा।

कॉलेज की पढ़ाई के बीच आया आजादी का बुलावा

ज्वाला प्रसाद ने अपनी पढ़ाई सागर और जबलपुर में की। 1929 में उन्होंने जबलपुर के रॉबर्टसन कॉलेज से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की। यहीं छात्र जीवन में उनका संपर्क राष्ट्रीय आंदोलन से गहरा हुआ। महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने करीब 400 छात्रों के साथ ब्रिटिश शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार और स्वदेशी वस्त्र अपनाने का संकल्प लिया। जबलपुर क्षेत्र में विदेशी कपड़ों की होली और शराब की दुकानों के बहिष्कार जैसे आंदोलन तेज हुए। और ज्वाला प्रसाद सिर्फ दर्शक नहीं थे। वे खुद इस आंदोलन का हिस्सा बन चुके थे।

अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया

19 अगस्त 1930 का दिन था। ज्वाला प्रसाद गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें पांच महीने की जेल की सजा हुई। लेकिन जेल से बाहर आने के बाद भी उनका रास्ता नहीं बदला। उन्होंने पढ़ाई पूरी की, शिक्षक बने और पत्रकारिता से भी जुड़े। फिर 1942 आया और इस बार उन्होंने नौकरी को ही अलविदा कह दिया। नौकरी सामने थी, लेकिन देश पहले ज्वाला प्रसाद सागर के नगरपालिका स्कूल में शिक्षक थे। एक तरफ सुरक्षित नौकरी थी। दूसरी तरफ भारत छोड़ो आंदोलन। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और 1942 के आंदोलन में पूरी तरह उतर गए। 12 अगस्त 1942 को उन्हें सागर से गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ दिनों बाद, 19 अगस्त को उन्हें नागपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

अब ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी की कहानी अचानक एक बेहद खूबसूरत मोड़ लेती है। जिस जेल में अंग्रेज उन्हें बंद करके उनकी आवाज रोकना चाहते थे, उसी जेल में उन्होंने कविता लिखनी शुरू कर दी।

जेल की दीवारों के बीच रची कविता

ज्वाला प्रसाद के लिए जेल सिर्फ सजा की जगह नहीं बनी। वह उनकी रचनात्मक प्रयोगशाला बन गई। लगभग डेढ़ साल के कारावास के दौरान उन्होंने साहित्य लिखा। इसी दौरान उनकी रचनाओं में 'पांचजन्य' और 'कलरव' जैसे काव्य-संग्रह सामने आए। सरकारी रिकॉर्ड भी बताता है कि जेल की अवधि उनके अध्ययन और लेखन के लिए महत्वपूर्ण रही। उनकी एक प्रसिद्ध पंक्ति आज भी उनकी पूरी जिंदगी को जैसे एक ही सांस में बयान कर देती है,

'जनम-जनम के हैं हम बागी,
लिखी बगावत भाग्य हमारे,
रे जेलों में कटी जवानी…'

बता दें कि ये पंक्तियां भारत सरकार के डिजिटल जिला रिकॉर्ड में भी दर्ज हैं।

सोचिए… अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डालकर समझा होगा कि एक और आवाज बंद हो गई। लेकिन कैदी की आवाज कविता बनकर जेल की दीवारों से बाहर निकल गई।
जेल से बाहर निकले तो कलम और तेज हो गई। आजादी के संघर्ष में ज्वाला प्रसाद की भूमिका जेल तक सीमित नहीं रही। 1945 से 1947 के बीच उन्होंने मीडिया संस्थानों में संपादक के रूप में काम किया और पत्रकारिता को राष्ट्रीय चेतना जगाने का माध्यम बनाया। बाद में अपना ही प्रकाशन विंध्य केसरी शुरू किया।

यानी जिस व्यक्ति ने अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन किया था, उसी ने बाद में अखबार की स्याही को भी स्वतंत्रता की लड़ाई का हथियार बना दिया। आजादी के बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई ज्वाला प्रसाद उन स्वतंत्रता सेनानियों में नहीं थे, जिन्होंने आजादी के बाद सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली। स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में 1952 में वे सागर जिले की सुरखी सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद 1957 में दमोह और 1962 में सागर से लोकसभा के लिए चुने गए। वे शिक्षक और लेखक भी रहे और बाद में सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया।

लेकिन उनकी पहचान सिर्फ सांसद या विधायक की नहीं थी। उनकी असली पहचान शायद वही थी जो जेल की दीवारों के भीतर बनी थी… एक ऐसा आदमी जिसने आजादी के लिए नौकरी छोड़ी, जेल गया और वहां भी लिखना नहीं छोड़ा।

इस कहानी को आज की पीढ़ी क्यों पढ़े?

क्योंकि ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी की कहानी हमें आजादी का एक अलग चेहरा दिखाती है। यह कहानी कहती है, क्रांति सिर्फ तलवार उठाना नहीं है। कभी क्रांति स्कूल छोड़ने के फैसले में होती है। कभी नौकरी छोड़ने में। कभी जेल जाने में। और कभी उस जेल में बैठकर ऐसी कविता लिख देने में, जिसे आने वाली पीढ़ियां पढ़ें और पूछें, आखिर इन लोगों के भीतर इतना जुनून आया कहां से था? ज्वाला प्रसाद का जीवन इस सवाल का जवाब देता है। उनके लिए आजादी कोई एक दिन की मंजिल नहीं थी। वह जीवन भर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी थी।

'अंग्रेजों ने जिस आवाज को जेल में बंद किया, उसने वहीं कविता लिख दी और वह कविता जेल की दीवारों से कहीं ज्यादा दूर तक पहुंच गई।'