
MP Freedom Fighter Premchand Kapadia: दमोह के इतिहास में प्रेमचंद कपाड़िया का नाम शायद उन बड़े नामों के बीच दब गया, जिन्हें स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा में बार-बार याद किया जाता है। लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड उनकी कहानी को एक दिलचस्प राष्ट्रीय कड़ी से जोड़ता है। त्रिपुरी कांग्रेस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भारत छोड़ो आंदोलन और आजाद हिंद सेना।
प्रेमचंद कपाड़िया का जन्म फरवरी 1923 में दमोह में हुआ था। उनका परिवार कपड़े के कारोबार के लिए जाना जाता था और उनका पैतृक घर वर्तमान पुराना थाना क्षेत्र के पास बताया गया है। बचपन में उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों और उस दौर के स्वतंत्रता आंदोलन का असर देखा। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें आंदोलन की ओर ले गया।
साल 1939 में कपाड़िया ने त्रिपुरी कांग्रेस में स्वयंसेवक के तौर पर 21 दिन का प्रशिक्षण लिया। त्रिपुरी अधिवेशन जबलपुर के पास हुआ था और इसी दौरान उनकी मुलाकात सुभाष चंद्र बोस से हुई। बताया जाता है कि नेताजी के विचारों का कपाड़िया पर गहरा प्रभाव पड़ा। यही मुलाकात उनकी आगे की राजनीतिक सक्रियता को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है।
भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के बाद 8 अगस्त 1942 को प्रेमचंद कपाड़िया मुंबई पहुंचे। उनका उद्देश्य आंदोलन में शामिल होना था। वहां से वे महत्वपूर्ण जानकारी और सामग्री लेकर इटारसी के रास्ते जबलपुर लौटे। जबलपुर पहुंचने पर उन्होंने उस सामग्री का एक हिस्सा अपने ससुराल के घर, बड़ा फुहारा क्षेत्र में छिपा दिया। लेकिन खुद पुलिस की गिरफ्त से बच नहीं सके और उन्हें गिरफ्तार करके जबलपुर जेल भेज दिया गया। यानी एक तरफ आंदोलन के लिए सामग्री को सुरक्षित रखना और दूसरी तरफ खुद गिरफ्तारी झेलना।
15 फरवरी 1943 को जेल से रिहा होने के बाद भी उनका स्वतंत्रता आंदोलन से संबंध खत्म नहीं हुआ। सरकारी रिकॉर्ड्स के मुताबिक इसके बाद वे आजाद हिंद सेना से जुड़े और सैन्य प्रशिक्षण में भाग लिया। उन्होंने आंदोलन को संगठित करने के लिए एक पीस आर्मी भी बनाई। यानी उनकी यात्रा केवल स्थानीय सत्याग्रह तक सीमित नहीं थी, वे कांग्रेस के स्वयंसेवक प्रशिक्षण से लेकर 1942 के भूमिगत गतिविधियों और फिर आजाद हिंद सेना से जुड़ने तक अलग-अलग चरणों से गुजरे।
प्रेमचंद कपाड़िया की कहानी की खासियत यही है कि इसमें स्वतंत्रता आंदोलन के कई अलग-अलग पड़ाव एक व्यक्ति के जीवन में दिखाई देते हैं-
वे 25 मार्च 2006 को दमोह स्थित अपने आवास पर ही उन्होंने अंतिम सांस ली। सरकारी रिकॉर्ड में उनके स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े जीवन का विवरण दर्ज है।
इतिहास में अक्सर नेताजी से जुड़ी बड़ी घटनाओं और आजाद हिंद सेना के प्रमुख चेहरों की चर्चा होती है। लेकिन उन स्थानीय युवाओं की भूमिका कितनी कम सामने आती है, जो पहले कांग्रेस के आंदोलनों में सक्रिय हुए और बाद में नेताजी के विचारों से प्रभावित होकर दूसरे क्रांतिकारी रास्तों से जुड़े? प्रेमचंद कपाड़िया की कहानी इसी सवाल को सामने रखती है।