
Online Exam: ऑनलाइन परीक्षा शुरू होने से पहले ज्यादातर अभ्यर्थियों का ध्यान एक ही चीज पर होता है, सवाल कैसे आएंगे और कितने नंबर मिलेंगे? लेकिन डिजिटल परीक्षा में एक दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है और वह है परीक्षा के दौरान सिस्टम आपको कितना देख और रिकॉर्ड कर रहा है? क्या webcam पूरे समय चालू रहेगा? क्या microphone की आवाज रिकॉर्ड होगी? क्या आपकी पूरी screen देखी जाएगी? क्या AI आपकी आंखों और चेहरे की हर मूवमेंट को एनलाइज करेगा? अगर इंटरनेट चला गया तो क्या होगा? और सबसे महत्वपूर्ण कि अगर, आपका यह डेटा परीक्षा खत्म होने के बाद जाएगा कहां?
ऑनलाइन प्रॉक्टोरिंग पर हुई साइंटिफिक रिसर्च में प्राइवेसी, सिक्योरिटी, टेक्निकल प्रोबल्म्स, स्ट्रेस और गलत तरीरके से सेंसिटिव एक्टिविटी फ्लैग होने जैसी चिंताएं सामने आई हैं। 2025 की एक सिस्टमेटिक स्टेकहॉल्डर स्टडी ने भी ऑनलाइन प्रॉक्टोरिंग में प्राइवेसी, ट्रांसपेरेंसी और रिस्पोन्सिबिलिटी को महत्वपूर्ण मुद्दे बताया है। इसलिए किसी भी ऑनलाइन या रिमोट प्रॉक्टोर्ड एग्जामिनेशन में बैठने से पहले अभ्यर्थी को कम से कम ये 10 सवाल जरूर पूछने चाहिए।
यही आपका सबसे पहला सवाल होना चाहिए। सिर्फ रजिस्ट्रेशन के समय नाम, मोबाइल और ई-मेल देना एक बात है। लेकिन ऑनलाइन प्रॉक्टोर्ड एग्जाम में इससे कहीं ज्यादा data कलेक्ट किया जा सकता है।
एग्जाम फ्लेटफॉर्म के हिसाब से इसमें शामिल होने वाले डेटा में-
NIC के एक ऑफिशियल प्रोक्टोरिंग सिस्टम के उदाहरण में फेस रिकगनेशन, एबसेंस डिटेक्शन, पर्सन स्वैपिंग डिटेक्शन, मल्टीपल पर्सन डिटेक्शन और आइ ट्रेकिंग जैसी सुविधाओं का उल्लेख है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर online exam में ये सभी चीजें इस्तेमाल होंगी। यही वजह है कि अभ्यर्थी को अपने स्पेसिफिक एग्जाम की प्राइवेसी पॉलिसी और इंस्ट्रक्शन्स पहले पढ़ने चाहिएं।
यह सवाल बहुत सामान्य लगता है, लेकिन इसका जवाब जानना हर अभ्यर्थी के लिए जरूरी है। दरअसल कुछ सिस्टम आइडेंटिटी वेरिफिकेशन के लिए परीक्षा शुरू होने से पहले कैमरा इस्तेमाल करते हैं। कुछ सिस्टम पूरे एग्जाम के दौरान वीडियो मॉनिटरिंग करते हैं।
कुछ AI बेस्ड सिस्टम केंडिडेट के चेहरे, उसकी मूवमेंट या आसपास के माहौल से जुड़ी एक्टिविटी एनालाइज कर सकते हैं। इसलिए सिर्फ यह मान लेना कि कैमरा तो केवल चेहरा पहचानने के लिए होगा, सही नहीं है। एग्जाम इंसट्रक्शन्स में साफ होना चाहिए कि कैमरा कब चालू होगा, क्या रिकॉर्ड होगा और रिकॉर्डिंग कितने समय तक रखी जाएगी।
यह ऑनलाइन प्रोक्टोरिंग का एक महत्वपूर्ण प्राइवेसी क्वेश्चन है। अगर माइक्रोफोन पर्मिशन मांगी जा रही है, तो अभ्यर्थी को यह पता होना चाहिए कि,
ऑनलाइन प्रोक्टोरिंग पर किए गए रिसर्च में स्टूडेंट्स ने webcam के साथ ही माइक्रोफोन, स्क्रीन शेयरिंग और दूसरे मॉनिटरिंग मेकेनिज्म्स कोल लेकर प्राइवेसी कंसर्न व्यक्त किए हैं। इसलिए माइक्रोफोन परमिशन को सिर्फ टेक्निकल आवश्यकता मानकर बिना पढ़े एक्सेप्ट करना ठीक नहीं है।
कई प्रोक्टोरिंग सिस्टम चीटिंग रोकने के लिए स्क्रीन एक्टिविटी मॉनिटरिंग कर सकते हैं। इसमें यह देखा जा सकता है कि केंडिडेट एग्जाम के दौरान दूसरी एप्लीकेशन, वेबसाइट या ब्राउजर विंडों तो नहीं खोल रहा है। कुछ सिस्टम लॉकडाइन ब्राउजर का इस्तेमाल करते हैं। कुछ स्क्रीन शेयरिंग या स्क्रीन मॉनिटरिंग तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं।
2021 के एक शोध में शोधकर्ताओं ने ऑनलाइन प्रॉक्टोरिंग सर्विसेज में रिस्ट्रक्टेड ब्राउजर्स, वीडियो/स्क्रीन मॉनीटरिंग, लॉकल नेटवर्क ट्रेफिक एनालिसिस और आई ट्रेकिंग मेकेनिज्म्स की पहचान की थी। इसलिए परीक्षा शुरू करने से पहले पूछें, क्या सिर्फ एग्जामिनेशन मॉनिटर होगी या पूरी स्क्रीन? यह दोनों एक जैसी चीजें नहीं हैं।
आज ऑनलाइन प्रॉक्टोरिंग में AI का इस्तेमाल सिर्फ आइडेंटिफाई वेरिफिकेशन तक सीमित नहीं है। कुछ सिस्टम कैंडिडेट की हेड मूवमेंट आई मूवमेंट, दूसरे व्यक्ति की मौजूदगी या एबसेंस जैसी घटनाओं को डिटेक्ट करने के लिए कम्प्यूटर विजन और AI का इस्तेमाल कर सकते हैं।
NIC के PBOX सिस्टम में भी फेस रिकगनेशन, पर्सन स्वैपिंग, मल्टीपल पर्सन डिटेक्शन और आईबॉल ट्रैकिंग्स जैसी सुविधाओं का उल्लेख है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल है कि, AI का 'flag' क्या अंतिम फैसला है? रिसर्च में स्टूडेंट्स ने गलत या अनुचित एग्जाम इनवेलिडेशन को लेकर चिंता जताई है।
मेडिकल स्टूडेंट्स पर हुए एक शोध में अनस्टेबल इंटरनेट, बैकग्राउंड नॉइज और वेबकैम प्रॉबलम्स के कारण एग्जाम इनवेलिडेशन की चिंता प्रमुख थी। इसलिए कैंडिडेट को पहले से पता होना चाहिए कि, AI अलर्ट आने के बाद ह्यूमन रिव्यू होगा या नहीं।
यह शायद ऑनलाइन एग्जाम का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। मान लीजिए, अचानक आपके कमरे में कोई आवाज आती है, आपको खांसी आती है, आप कुछ सेकंड के लिए दूसरी तरफ देखते हैं, इंटरनेट कमजोर हो जाता है, वेबकेम इमेज फ्रीज हो जाती है। बैकग्राउंड में कोई व्यक्ति दिखाई देता है, सॉफ्टवेयर किसी टेक्नीकल प्रॉब्लम को सस्पीशियस एक्टिविटी समझ लेता है
तो क्या आपका एग्जाम सीधे कैंसिल हो जाएगा? नहीं ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन कैंडिडेट को एग्जाम अथॉरिटी की पॉलिसी जरूर जाननी चाहिए। क्या ऑटोमेटेड फ्लैग के बाद ह्यूमन एग्जामिनर रिव्यू करेगा? क्या कैंडिडेट को एक्सप्लेशन देने का मौका मिलेगा? क्या अपील मेकेनिज्म है? क्या टेक्निकल लॉग देखा जाएगा? ऑनलाइन प्रोक्टोरिंग रिसर्च में प्राइवेसी के साथ ही फेयरनेस और अनजस्टीफाइड इनवेलिडेशन दोनों महत्वपूर्ण कंसर्न रहे हैं। इसलिए एग्जाम से पहले अपील और रिव्यू प्रोसेस जानना उतना ही जरूरी है, जितना सिलेबस जानना।
यह सवाल बहुत कम कैंडिडेट्स पूछते हैं। लेकिन वेबकेम वीडियो, ऑडियो, स्क्रीन शॉर्ट्स, आईडेंटिटि इन्फॉर्मेशन और लॉग्स सामान्य आंसर शीट से अलग तरह का डिजिटल डेटा हो सकते हैं।
कैंडिडेट को पता होना चाहिए कि,
2025 की प्राइवेसी रिसर्च में ऑनलाइन प्रॉक्ट्रोरिंग के संदर्भ में ट्रांसपेरेंसी, इंफॉर्मेशन मिनिमाइजेशन, एकाउंटेबिलिटी, सिक्योरिटी और कॉन्सेंट जैसे प्रिंसिपल्स को महत्वपूर्ण बताया गया।
कई ऑनलाइन एग्जाम्स खुद एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन के सर्वर्स पर नहीं चलते। एग्जाम अथॉरिटी किसी एक्सटर्नल टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर या प्रॉक्टोरिंग सर्विस का इस्तेमाल कर सकती है। इसलिए कैंडिडेट को यह पता होना चाहिए कि, मेरे data का एक्चुअल प्रोसेसर कौन है?
क्या कोई थर्ड पार्टी आइडेंटिफिकेशन वेरिफिकेशन करती है? वीडियो प्रोसेस करती है? AI analysis करती है? स्क्रीन मॉनिटरिंग करती है? डेटा स्टोर करती है?
2021 के रिसर्च सर्वे में स्टूडेंट्स ने प्रॉक्टोरिंग कंपनीज के साथ पर्सनल इंफॉर्मेशन शेयर करने के लिए स्पष्ट प्राइवेसी कंसर्न व्यक्त किए थे। इसलिए प्राइवेसी पॉलिसी में सिर्फ 'data is secure' पढ़ना पर्याप्त नहीं है। किसके पास data है और किस पर्पस से है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।
हर कैंडिडेट एक जैसी परिस्थितियों में एग्जाम नहीं देता। किसी को एक्सेसिबिलिटी सपोर्ट की जरूरत हो सकती है। किसी के लिए आई ट्रैकिंग या लगातार कैमरी मॉनिटरिंग कठिन हो सकती है। किसी को मेडिकल कारणों से मूवमेंट या ब्रेक्स की आवश्यकता हो सकती है।
2025 के शोध में डिसएबिलिटी एकॉमन्डेशन्स वाले स्टूडेंट्स ने बताया कि सर्विलेंस बेस्ड ऑनलाइन एग्जाम्स उनके लिए एनजाइटी, कगनिटिव लोड और गलत इंटरप्रटेशन की चिंता पैदा कर सकते हैं।
इसलिए परीक्षा अथॉरिटी से पहले ही पूछना चाहिए, क्या एप्रूव्ड एकमन्डेशन उपलब्ध है? और अगर है तो, उसे एग्जाम से पहले कैसे एक्टिवेट किया जाएगा? यह सवाल एग्जाम शुरू होने के बाद पूछना अक्सर देर से पूछा गया सवाल साबित हो सकता है।
यह सबसे प्रैक्टिल सवाल है। ऑनलाइन एग्जाम में टेक्निकल फेल्योर हमेशा कैंडिडेट की गलती नहीं होता। हो सकता है कि,
ऐसी स्थिति में कैंडिडेट को पहले से पता होना चाहिए कि,
मेडिकल स्टूडेंट्स पर हुए रिसर्च में अनस्टेबल इंटरनेट, वेबकैम प्रॉब्लम्स और टेक्निकल इश्यूज को एग्जाम इनवेलिडेशन की चिंता से जोड़ा गया था। इसलिए एग्जाम से पहले टेक्निकल सपोर्ट नंबर या ऑफिशियल कम्प्लेन मैकनिज्म सेव करके रखना व्यावहारिक रूप से जरूरी है। क्या भारत में ऑनलाइन एग्जाम में बायोमेट्रिक या प्रॉक्टोरिंग की अनुमति है?
दरअसल भारत में ऑनलाइन एग्जामिनेशन के लिए एक ही ऐसा यूनिवर्सल रूल नही है, जो हर कॉम्पिटेटिव एग्जाम, यूनिवर्सिटी एग्जाम, प्राइवेट सर्टिफिकेशन एग्जाम पर बिल्कुल समान तरीके से लागू हो। अलग-अलग एग्जाम बॉडी और रेगुलेटर्स के अपने रूल्स हो सकते हैं।
लेकिन UGC के ऑनलाइन लर्निंग रेगुलेशन्स में टेक्नोलॉजी इनेबल्ड ऑनलाइन टेस्ट्स और प्रोक्टर्ड एग्जामिनेशन्स का प्रावधान है। रेगुलेशन्स में प्रॉक्टर्ड एग्जामिनेशन को एप्रूव्ड पर्सन या टेक्नोलॉजी इनेबल्ड प्रॉक्टोरिंग के जरिए टेस्ट टेकर की पहचान और एग्जाम एन्वायरमेंट की इंटीग्रिटी सुनिश्चित करने वाली प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है।
कुछ UGC रेगुलेटेड ऑनलाइन लर्निंग कंटेक्स्ट में बायोमेट्रिक अथेन्टिकेशन का भी उल्लेख मिलता है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि 'online exam' में बायमेट्रिक डेटा हमेशा अवैधानिक है। उसी तरह यह कहना भी सही नहीं होगा कि एग्जाम अथॉरिटी कैंडिडेट का कोई भी data बिना सीमा के ले सकती है। असल सवाल है कि कौन-सा डेटा, किस उद्देश्य से, किस अथॉरिटी के तहत, कितने समय के लिए और किस प्रोसेस के तहत लिया जा रहा है?
भारत ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 बनाया है और मैतवाई ने 2025 में इसके इम्प्लीमेंटेशन फ्रेमवर्क के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 जारी किए हैं। मैतवाई की ऑफिशियल इंफॉर्मेशन के मुताबिक रूल्स में अलग-अलग प्रोविजंस के लिए फेज्ड कमेंसमेंट का फ्रेमवर्क दिया गया है। इसलिए एग्जाम कैंडिडेट्स के लिए डेटा प्राइवेसी का सवाल आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है।
लेकिन किसी पर्टिकुलर एग्जाम में कैंडिडेट के स्पेसिफिक राइट्स तय करते समय यह देखना जरूरी होगा कि उस समय कौन-से प्रोविजंस लागू हैं और संबंधित एग्जाम अथॉरिटी किस लीगल फ्रेमवर्क के अंतर्गत डेटा प्रोसेस कर रही है।
हां। लेकिन पूरी पॉलिसी पढ़ना कठिन हो सकता है। इसलिए एग्जाम से पहले कम से कम इन शब्दों को जरूर खोजें
अगर इनमें से किसी महत्वपूर्ण बात का जवाब नहीं मिल रहा है, तो एग्जाम अथॉरिटी की ऑफिशियल हेल्पडेस्क या नोटिफिकेशन से क्लैरिफिकेशन लेना बेहतर है।
इस विषय पर रिसर्च सिर्फ प्राइवेसी की चिंता नहीं दिखाती। 2024 की एक स्कोपिंग रिव्यू ने हायर एजुकेशन में रिमोट प्रॉक्टरिंग पर 21 स्टडीज की समीक्षा की। इसमें स्टूडेंट एक्सपीरियंस को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों में प्राइवेसी, टेक्नोलॉजिकल चैलेंजेज, फेयरनेस और स्ट्रेस सामने आए। रिसर्चर्स ने स्टूडेंट वॉइस को डिसीजन-मेकिंग में शामिल करने और जहां संभव हो रिमोट प्रॉक्टरिंग को सीमित करने की रिकमेंडेशंस दीं। 2025 की स्टेकहोल्डर रिसर्च ने भी प्राइवेसी को लेकर अवेयरनेस, रिस्पॉन्सिबिलिटी और ट्रांसपेरेंसी की जरूरत पर जोर दिया।
इसका मतलब यह नहीं कि प्रॉक्टरिंग बेकार है। इसका उद्देश्य चीटिंग कम करना और एग्जाम इंटीग्रिटी बनाए रखना हो सकता है। असल चुनौती है, एग्जाम सिक्योरिटी और कैंडिडेट प्राइवेसी के बीच सही संतुलन।
नहीं, ऑनलाइन एग्जाम्स में चीटिंग रोकना वास्तविक समस्या है। 2026 की सिस्टमैटिक रिव्यू में ऑटोमेटेड ऑनलाइन एग्जाम प्रॉक्टरिंग पर पिछले एक दशक की रिसर्च की समीक्षा की गई और एकेडमिक इंटीग्रिटी के लिए टेक्नोलॉजी-बेस्ड मॉनिटरिंग की भूमिका पर चर्चा की गई लेकिन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अपने आप में पर्याप्त नहीं है। एक अच्छे ऑनलाइन एग्जामिनेशन सिस्टम में आइडियली यह स्पष्ट होना चाहिए कि-
अब सबसे जरूरी बात, 'एक्सेप्ट' दबाने से पहले सवाल पूछना आपका हित है, ऑनलाइन एग्जाम में कैंडिडेट का काम सिर्फ सही आंसर देना नहीं है। उसे यह भी पता होना चाहिए कि जिस डिजिटल सिस्टम पर वह परीक्षा दे रहा है, वह उसके साथ क्या कर रहा है। अगर वेबकैम इस्तेमाल हो रहा है तो क्यों? अगर माइक्रोफोन परमिशन मांगी गई है तो क्यों? अगर स्क्रीन मॉनिटर हो रही है तो किस सीमा तक? अगर एआई सस्पिशियस एक्टिविटी डिटेक्ट करता है तो फाइनल डिसीजन कौन लेता है? अगर डेटा रिकॉर्ड हो रहा है तो कब तक रखा जाएगा? और अगर टेक्नोलॉजी की गलती से कैंडिडेट पर गलत आरोप लगता है तो उसके पास क्या रेमेडी है? इन सवालों के जवाब जानना चीटिंग से बचने का तरीका नहीं, बल्कि फेयर एग्जामिनेशन सुनिश्चित करने का हिस्सा है।