
RBI gold reserve england: साल 1991, एक ऐसा साल जब, भारत के सामने सबसे बड़ा आर्थिक संकट था। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम बचा था कि देश सिर्फ कुछ हफ्तों का आयात बिल चुका सकता था। उस वक्त सरकार के पास एक ही रास्ता बचा था, अपना सोना गिरवी रखना। भारत ने अपने कुछ टन सोने को विमान से लंदन भेजा और बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखकर 405 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया। यह घटना आज भी भारत की आर्थिक इतिहास की सबसे शर्मिंदा करने वाली यादों में गिनी जाती है। करीब साढ़े तीन दशक बाद, अब कहानी उलट रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पिछले कुछ सालों से चुपचाप, मगर लगातार, अपना सोना लंदन से वापस भारत ला रहा है।
RBI की मार्च 2026 की हालिया हाफ-ईयरली रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास कुल 880.52 टन सोना है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब इसमें से 680.05 टन सोना भारत की अपनी धरती पर, मुंबई और नागपुर के सुरक्षित भंडारों में रखा है। सिर्फ 197.67 टन सोना अब भी बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) की कस्टडी में बचा है।
यह तस्वीर कुछ साल पहले तक बिल्कुल उलटी थी। मार्च 2021 में RBI के पास कुल 695.31 टन सोना था, जिसमें से 403.01 टन विदेश में और सिर्फ 292.30 टन घर पर रखा था। यानी तब ज्यादातर सोना बाहर था, आज ज्यादातर सोना भारत में है।
सिर्फ आखिरी छह महीनों में, यानी सितंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच, RBI ने 104.23 टन सोना लंदन से वापस मंगवाया। इससे पहले भी अक्टूबर 2024 में धनतेरस के मौके पर 102 टन और मई 2024 में 100 टन सोना इसी तरह वापस लाया गया था। यानी सिर्फ चार साल में 350 टन से ज्यादा सोना ब्रिटेन से भारत लौट चुका है।
बैंक ऑफ इंग्लैंड साल 1697 से दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों का सोना अपने वॉल्ट में रखता आया है। लंदन दुनिया के सबसे बड़े बुलियन बाजारों में से एक है, इसलिए वहां सोना रखने से जरूरत पड़ने पर उसे तुरंत खरीदने-बेचने या गिरवी रखने में आसानी होती है। भारत जैसे कई देशों ने ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारणों से अपना सोना वहीं रखा। इसके अलावा घरेलू वॉल्ट बनाने और उनकी सुरक्षा पर आने वाला भारी खर्च भी एक वजह रही।
इसकी सबसे बड़ी वजह 2022 में हुई एक घटना मानी जाती है। जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तो अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के विदेशों में रखे अरबों डॉलर के रिजर्व फ्रीज कर दिए। इस घटना ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर कभी भू-राजनीतिक हालात बिगड़े, तो विदेश में रखी संपत्ति पर उनका नियंत्रण खत्म भी हो सकता है। इसके बाद से भारत समेत कई देशों ने अपना सोना धीरे-धीरे अपने घर वापस मंगाना शुरू कर दिया।
एक और वजह है सोने की बढ़ती अहमियत। भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी अब बढ़कर करीब 16.7 प्रतिशत हो चुकी है, जो कुछ साल पहले तक 6 प्रतिशत से भी कम थी। जितना बड़ा हिस्सा सोने का होगा, उतना ही जरूरी है कि उस पर पूरा नियंत्रण भी अपने पास हो।
सोने को लंदन से भारत लाना कोई साधारण शिपमेंट नहीं है। इसके लिए खास सुरक्षा प्रोटोकॉल और विशेष विमानों का इस्तेमाल किया जाता है। पूरा ऑपरेशन बेहद गोपनीय तरीके से, वित्त मंत्रालय, RBI और अन्य एजेंसियों की निगरानी में पूरा किया जाता है। ऐसे ट्रांसफर के लिए कुछ खास टैक्स छूट की भी जरूरत पड़ती है, जिसे सरकार अलग से मंजूर करती है। यही वजह है कि ज्यादातर बार यह खबर होने के बाद ही सार्वजनिक हो पाती है।
जिस तरह बड़े निवेशक अपनी दौलत को अलग-अलग देशों और वॉल्ट में बांटकर सुरक्षा और भरोसा दोनों तलाशते हैं, ठीक उसी तर्क पर देश भी अपने खजाने की जगह तय करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां दांव पर किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे देश की आर्थिक सुरक्षा है।
भारत का सोना वापस लाना सिर्फ एक लॉजिस्टिक्स की खबर नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि दुनिया अब भरोसे और नियंत्रण को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो चुकी है, और भारत भी अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता को उसी सतर्कता के साथ मजबूत कर रहा है। हालांकि अभी भी करीब 200 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास बना हुआ है, इसलिए यह कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आने वाले सालों में और कितना सोना वापस आता है, यह देखने वाली बात होगी।