
आंखें खोलते ही दुनिया हमें साफ, स्थिर और एक ही रूप में दिखती है। लेकिन न्यूरोसाइंस की एक नई रिसर्च इस भरोसे पर सवाल उठाती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले की न्यूरोसाइंटिस्ट डोरिस त्साओ की प्रयोगशाला के शोधकर्ताओं का दावा है कि दिमाग लगभग 15 बार प्रति सेकंड चेतन और अचेतन जानकारी के बीच आगे-पीछे होता रहता है।
यह अध्ययन जेनिस हेसे और डोरिस त्साओ के नेतृत्व में हुआ है और अभी बायोआर्काइव पर प्रीप्रिंट के रूप में सामने आया है। यानी इसकी स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा (पीयर रिव्यू) पूरी नहीं हुई है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार इसमें कैलटेक भी शामिल है। विश्लेषण में प्रिंसटन न्यूरोसाइंस इंस्टीट्यूट की एसोसिएट प्रोफेसर टाटियाना एंगेल ने सहयोग किया।
शोध में 'बाइनोकुलर फ्लैश सप्रेशन' तकनीक इस्तेमाल हुई, जिसे न्यूरोसाइंटिस्ट दशकों से चेतना के अध्ययन में अपनाते आए हैं। इसमें पहले एक आंख को एक चेहरा दिखाया जाता है। वह चेहरा सामने रहते हुए ही दूसरी आंख के सामने अचानक दूसरा चेहरा लाया जाता है। दिमाग आमतौर पर नई तस्वीर को ही चेतन रूप से पकड़ता है। पहली तस्वीर रेटिना तक पहुंचती रहती है, फिर भी जागरूकता से गायब हो जाती है।
मकाक बंदरों को लाल-नीले चश्मे जैसे उपकरण से ये तस्वीरें दिखाई गईं। उनके दिमाग के चेहरा पहचानने वाले हिस्सों में लगे इलेक्ट्रोड से न्यूरॉन्स की गतिविधि दर्ज की गई। बंदर बता नहीं सकते कि उन्होंने क्या देखा। इसलिए उनकी चेतन धारणा का अनुमान इंसानों पर हुए प्रयोगों से लगाया गया।
दूसरा चेहरा चेतना में हावी होना चाहिए था, पर न्यूरॉन्स लगातार सिर्फ उसी को नहीं दर्शा रहे थे। उनकी गतिविधि चेतन चेहरे और दबाए गए चेहरे के बीच तेजी से बदलती रही। यह बदलाव लगभग 15 बार प्रति सेकंड था, यानी हर करीब 67 मिलीसेकंड पर। यही पैटर्न प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में भी, कुछ ज्यादा शोर के साथ, दिखा। इससे लगता है कि यह किसी एक हिस्से की खासियत नहीं है।
एक स्वतंत्र रिसर्ट नोट के मुताबिक '15 बार प्रति सेकंड' का मतलब अवस्थाओं के बदलने की दर है, किसी दोलन (ऑसिलेशन) के पूरे चक्र की नहीं। एक पूरा 'दिखा-न दिखा-दिखा' चक्र करीब 120-130 मिलीसेकंड का होता है।
त्साओ ने इसे "चेतन जागरूकता का शुद्ध संकेतक" बताया। शोधकर्ताओं के अनुसार दिमाग के किसी हिस्से की औसत गतिविधि में चेतना ढूंढना सीमित तरीका है, चाहे वह आगे का हिस्सा हो या पीछे का। यानी चेतना शायद इस पर निर्भर करती है कि गतिविधि कब होती है, इस पर कम कि वह कहां होती है।
हालांकि, अध्ययन में सिर्फ दो मकाक बंदर थे और शोध केवल दृश्य-प्रसंस्करण से जुड़े चुनिंदा हिस्सों तक सीमित रहा, पूरे दिमाग तक नहीं। अध्ययन यह भी साबित नहीं करता कि यह तेज बदलाव आखिर क्यों होता है? इसलिए सेहत, रोजमर्रा की जिंदगी या भविष्य की तकनीक पर इसके असर के दावे अभी अटकल ही हैं।