
इंडोनेशिया का नाम सुनते ही आंखों के सामने बाली के सुनहरे समुद्र तट, लग्जरी रिसॉर्ट्स और खूबसूरत नजारों की तस्वीर उभर आती है। इंडोनेशिया में कई खूबसूरत स्थान हैं, जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इंडोनेशिया की चमचमाती दुनिया के अलावा यहां एक ऐसा स्थान भी है, जो इसकी खूबसूरती पर किसी कलंक से कम नहीं है।
इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता से करीब 2000 किलोमीटर दूर 'सुंबा द्वीप' पर 21वीं सदी में भी दास प्रथा चल रही है। इस द्वीप पर पैदा होने वाले बच्चे अपने मालिकों के 'गुलाम' होते हैं। इंडोनेशिया की राजधानी से 2000 किलोमीटर दूर स्थित 'सुंबा द्वीप' पर गुलामी का जीवन गुजार रहे बेबस लोगों को स्थानीय भाषा में 'अता' कहा जाता है।
इस द्वीप पर मराम्बा समाज के अमीर और रसूखदार लोग मालिक होते हैं। इसी द्वीप पर दूसरे समुदाय के लोगों को कबीहू कहा जाता है। ये आम नागरिक होते हैं। यहां जन्म लेने वाला हर 'अता' बच्चा जन्मजात गुलाम होता है, जिसका जीवन उसके मालिक 'मराम्बा' के अधीन होता है।
सुंबा द्वीप की कुल आबादी लगभग 6.85 लाख है, जिसमें 80 प्रतिशत से अधिक लोग ईसाई हैं। यहां की सामाजिक व्यवस्था प्राचीन 'मारापू' परंपरा से संचालित होती है। यह परंपरा जीववाद और पूर्वज पूजा को मिलाती है और समाज को 3 वर्गों में बांटती है-
1- मराम्बा: कुलीन वर्ग, बड़े जमींदार और मालिक
2- कबीहू: आम नागरिक
3- अता: जन्मजात दास/गुलाम
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, खासकर पूर्वी 'सुंबा द्वीप' में 1,700 से लेकर कई हजार 'अता' आज भी गुलामी के चंगुल में फंसे हुए हैं। मार्था हेबी जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस व्यवस्था पर गहन अध्ययन किया है। मारापू पुजारी उम्बु रेमी डेटा कहते हैं कि यह धर्म सामाजिक स्तरीकरण का सार है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, सुंबा पहुंचने पर मराम्बा जनजाति को 'अता' पर अधिकार प्राप्त हुए।
हिंसा, शोषण और बंधुआ मजदूरी का दंश झेल रहे 'अता' समुदाय के लोगों के पास अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं है। बचपन से ही उन्हें खेतों में काम करने, मवेशी चराने और मालिकों के घरों में खाना बनाने के लिए बाध्य किया जाता है। काम में लापरवाही बरतने पर बेरहमी से पीटा जाता है। बाल पकड़कर घसीटा जाता है। कभी-कभी तो सजा के रूप में खौलता पानी भी फेंका जाता है।
सुंबा द्वीप पर सबसे दर्दनाक स्थिति गुलाम महिलाओं और लड़कियों की है। स्थानीय धारणा के अनुसार, गुलाम लड़की मालिक की संपत्ति है। इसलिए 'अता' समुदाय की लड़कियों-महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाना 'रेप' नहीं माना जाता है, बल्कि इसे अपनी संपत्ति पर अधिकार माना जाता है। इंडोनेशिया की राष्ट्रीय महिला हिंसा आयोग की पूर्व प्रमुख एंडी येंट्रियानी इस सामाजिक धारणा की निंदा करती हैं।
साल 2024 में एक 18 वर्षीय गुलाम लड़की ने साहस दिखाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पीड़िता ने आरोप लगाया कि 13 साल की उम्र से उसके मालिक और मालिक के बेटे ने कई सालों तक उसका रेप किया। इसके बाद पीड़िता ने एक बच्चे को जन्म दिया। पुलिस केस दर्ज होने के बावजूद इस मामले की जांच अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। गुलामी का दंश झेल रहे अधिकांश पीड़ित पुलिस या अदालत के पास जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते हैं।
इंडोनेशिया में डच औपनिवेशिक शासन के बाद 1945 के संविधान में गुलामी पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। करीब 160 साल पहले कानूनी रूप से यह प्रथा समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद राजधानी जकार्ता से 2000 किलोमीटर दूर स्थित सुंबा द्वीप की भौगोलिक दूरी, खराब सड़कें, मोबाइल सिग्नल की अनुपस्थिति और मारापू परंपरा की गहरी जड़ें इस प्रथा को जिंदा रखे हुए हैं।
इंडोनेशिया के सुंबा द्वीप पर आज भी पारंपरिक चूल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना पकाया जाता है। यहां बाहरी लोगों के लिए यह पहचानना मुश्किल होता है कि कौन मालिक है और कौन गुलाम? हालांकि, यहां थके हुए चेहरों, कमजोर शरीर और काम करते हुए बुजुर्गों को देखकर यह अनुमान लगा सकते हैं कि वे 'अता' समुदाय से हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन लगातार इंडोनेशिया सरकार से मांग कर रहे हैं कि 'अता' लोगों को तुरंत आजाद घोषित किया जाए। हालांकि, इंडोनेशिया सरकार इस मामले पर सुस्त दिख रही है। मानवाधिकार मंत्री युसरिल इहजा महेंद्र कहते हैं कि इंडोनेशिया एक विविधतापूर्ण देश है। इसलिए सरकार पर अचानक नियम थोपने के बजाय धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव लाने पर विश्वास करना चाहिए।
इतिहासकार बोंडन कनुमोयोसो के अनुसार, इंडोनेशिया के अन्य हिस्सों में भी जबरन श्रम मौजूद है, जैसे कालीमंतन में दयाक समुदाय में ऋण चुकाने के लिए बंधुआ मजदूरी कराई जाती थी। उनका कहना है कि 'सुंबा' की गुलामी अनोखी है, क्योंकि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है और मालिक-गुलाम एक ही छत के नीचे रहते हैं। सुंबा द्वीप की शुष्क पहाड़ियां, समुद्र और पथरीली सड़कें इसे बाहरी दुनिया से अलग रखती हैं।
विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया की विविधता यहां स्पष्ट दिखती है, लेकिन विविधता के नाम पर मानवाधिकारों का हनन भी जारी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता चेतावनी देते हैं कि यदि सरकार गंभीर कदम नहीं उठाती, तो हजारों 'अता' परिवारों की पीढ़ियां इसी गुलामी में जीती-मरती रहेंगी। गुलामी को दूर करने के लिए 160 साल पहले कानून बन चुका है, लेकिन सुंबा में बदलाव की हवा अभी भी बहुत धीमी है।