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1947 से आज तक भारत के आंकड़ों का नया खजाना: एक क्लिक में छिपी है नीति बदलने की ताकत

Tathyakosh Data Platform: 1947 तक की ऐतिहासिक कवरेज वाले तथ्यकोष (Tathyakosh) में 458 स्रोतों के 15 लाख से ज्यादा डेटाबेस खोजे जा सकते हैं। जानिए भारत के खजाने का यह सार्वजनिक और नया मंच भारतीय रिसर्च और नीति निर्माण को कैसे बदल सकता है?
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Aug 14, 2026
Tathyakosh Data Platform
Tathyakosh Data Platform: भारत के 1947 के इतिहास से लेकर वर्तमान तक एक क्लिक में खुलेगा डेटा का खजाना। (AI Creative)

Tathyakosh Data Platform: क्या हो अगर भारत के किसी गांव की पुरानी कृषि रिपोर्ट, किसी जिले के स्वास्थ्य आंकड़े, शिक्षा की स्थिति और पर्यावरण से जुड़े वर्षों पुराने आंकड़ों को खोजने के लिए दर्जनों सरकारी वेबसाइटों के चक्कर न लगाने पड़ें?

भारत में आंकड़ों की कमी लंबे समय से समस्या नहीं रही है। असली समस्या रही है, सही आंकड़ा कहां है, किस संस्था ने जारी किया है, कितने साल पुराना है और उस पर भरोसा कितना किया जा सकता है।

12 अगस्त 2026 को कर्नाटक सरकार के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एसीएसईएल टेक्नोलॉजी फोरम ने Tathyakosh.in लॉन्च किया। यह कोई नया सरकारी आंकड़ा बनाने वाला पोर्टल नहीं, बल्कि भारत में अलग-अलग जगह बिखरे सार्वजनिक आंकड़ों को खोजने का एक साझा मंच है। इसके जरिए 458 स्रोतों से जुड़े 15 लाख से ज्यादा डेटासेट खोजे जा सकते हैं। यहीं से इस कहानी का असली महत्व शुरू होता है।

15 लाख आंकड़े, लेकिन कहानी सिर्फ संख्या की नहीं

Tathyakosh में शामिल डेटासेट स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, बुनियादी ढांचे, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और शासन समेत 16 क्षेत्रों में फैले हैं। इनमें 346 भारतीय स्रोतों के साथ भारत से संबंधित आंकड़े रखने वाले 37 अंतरराष्ट्रीय रिपॉजिटरी भी शामिल हैं। प्लेटफॉर्म के मुताबिक, सूचीबद्ध डेटासेट में 92 प्रतिशत से ज्यादा खुले तौर पर उपलब्ध हैं और करीब 95 प्रतिशत मशीन-पठनीय हैं। यानी इन्हें कंप्यूटर आधारित विश्लेषण और शोध में इस्तेमाल करना अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

Tathyakosh खुद इन आंकड़ों का मालिक नहीं है। यह मूल डेटासेट को अपने पास रखकर नया आंकड़ा नहीं बनाता। यह उपयोगकर्ता को उस मूल स्रोत तक पहुंचाता है जहां वास्तविक डेटा उपलब्ध है। इस तरह डेटा का मूल स्वामित्व और स्रोत बना रहता है।

1947 तक पीछे जाकर भारत को पढ़ने का रास्ता

इस प्लेटफॉर्म की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में एक इसकी ऐतिहासिक पहुंच है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसकी डेटा कवरेज 1947 तक पीछे जाती है। इसका मतलब यह नहीं कि आजाद भारत के बाद का हर आंकड़ा यहां मौजूद है, बल्कि इतना जरूर है कि सूचीबद्ध डेटासेट में ऐतिहासिक सामग्री तक पहुंच का दायरा सात दशक से अधिक पीछे तक जाता है। यही चीज इसे महज तकनीकी मंच से आगे ले जाती है।

मान लीजिए किसी शोधकर्ता को यह समझना है कि किसी क्षेत्र में कृषि, स्वास्थ्य या शिक्षा की स्थिति लंबे समय में कैसे बदली। अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों को एक साथ खोज पाना उस बदलाव की तस्वीर तैयार करने में मदद कर सकता है। यानी आज का आंकड़ा सिर्फ आज की खबर नहीं बताएगा, बल्कि कल से आज तक हुए बदलाव को समझने का आधार भी बन सकता है।

नीति बनाने में इसका असली इस्तेमाल कहां होगा?

नीति निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है, समस्या कितनी बड़ी है और कहां ज्यादा बड़ी है? अगर स्वास्थ्य से जुड़े अलग-अलग जिलों के आंकड़े आसानी से खोजे जा सकें तो नीति निर्माता बीमारी के क्षेत्रीय पैटर्न को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। कृषि में पुराने और नए आंकड़ों को साथ देखकर फसल, मौसम, उत्पादन या क्षेत्रीय बदलावों पर शोध करना आसान हो सकता है।

पर्यावरण में तापमान, प्रदूषण, जल संसाधन या भूमि उपयोग जैसे आंकड़ों की लंबी अवधि की तुलना शोध को मजबूत कर सकती है। शिक्षा में अलग-अलग समय के नामांकन, संस्थानों और क्षेत्रीय आंकड़ों को जोड़कर यह समझा जा सकता है कि सुधार कहां हुआ और कमी कहां बनी हुई है। यानी डेटा का असली मूल्य उसकी संख्या में नहीं, बल्कि अलग-अलग आंकड़ों को जोड़कर सवाल पूछने की क्षमता में है।

बता दें कि लॉन्च के मौके पर मंत्री खरगे ने कहा कि 'भारत की एआई महत्वाकांक्षाएं सिर्फ प्रतिभा और कंप्यूटिंग ताकत पर निर्भर नहीं करेंगी, बल्कि इस पर भी निर्भर करेंगी कि संस्थाओं में पहले से मौजूद विशाल आंकड़ों को हम कितनी आसानी से खोज और इस्तेमाल कर पाते हैं।

पहली बार नहीं, लेकिन बड़ा बदलाव जरूर

भारत में सरकारी डेटा पहले से कई पोर्टलों और संस्थानों के माध्यम से उपलब्ध रहा है। समस्या यह है कि उपयोगकर्ता को अक्सर यह पता ही नहीं होता कि जिस सवाल का जवाब वह तलाश रहा है, उसका डेटा किस पोर्टल या संस्था में छिपा है। Tathyakosh इसी डेटा-खोज की समस्या को निशाना बनाता है।

प्लेटफॉर्म डेटासेट को विषय, भौगोलिक क्षेत्र, समय अवधि, फाइल प्रारूप और पहुंच के प्रकार जैसे मानकों के आधार पर वर्गीकृत करता है। इससे किसी शोधकर्ता को सिर्फ डेटा का नाम नहीं, बल्कि उसके उपयोग की संभावित उपयुक्तता समझने में भी मदद मिल सकती है।

सिर्फ आंकड़ा नहीं, आंकड़े की गुणवत्ता भी

इस प्लेटफॉर्म का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा उसका डेटासेट गुणवत्ता स्कोर है। प्रत्येक डेटासेट को सात मानकों पर आंका जाता है, डेटा को खोज पाना, उसकी उपलब्धता, मशीन-पठनीयता, ताजगी, पूर्णता, बारीकी और कवरेज की पूर्णता।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि, दो डेटासेट एक ही विषय पर हो सकते हैं, लेकिन उनकी उपयोगिता एक जैसी नहीं होती। एक आंकड़ा बहुत पुराना हो सकता है। दूसरा हालिया लेकिन अधूरा। तीसरा विस्तृत हो सकता है लेकिन मशीन से पढ़ना मुश्किल हो। इसलिए 'डेटा उपलब्ध है' और 'डेटा उपयोगी है', इन दोनों में अंतर है। Tathyakosh इसी अंतर को सामने लाने की कोशिश करता है।

कर्नाटक सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और बीटी विभाग की सचिव डॉ. एन. मंजुला का कहना है, Tathyakosh उपयोगकर्ताओं को हर स्रोत को अलग-अलग खंगालने की बजाय एक ही जगह से जानकारी खोजने का रास्ता देता है।

आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि 15 लाख डेटासेट की संख्या सुनकर आम नागरिक को लग सकता है कि इसका उससे क्या लेना-देना? असल में सार्वजनिक डेटा का अंतिम उपयोगकर्ता सिर्फ वैज्ञानिक या सरकार नहीं है। एक पत्रकार इससे किसी सरकारी दावे की पड़ताल कर सकता है, एक छात्र शोध के लिए आंकड़े खोज सकता है।

एक स्टार्टअप किसी समस्या का समाधान बनाने के लिए डेटा तलाश सकता है। एक शोधकर्ता किसी जिले या क्षेत्र की वर्षों पुरानी स्थिति समझ सकता है और नीति निर्माता किसी योजना को लागू करने से पहले समस्या का क्षेत्रीय पैटर्न देख सकता है। इस लिहाज से डेटा की आसान खोज सूचना तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में एक कदम हो सकती है।

कर्नाटक के लिए भी बड़ा प्रयोग

Tathyakosh पर अभी 50 हजार से ज्यादा कर्नाटक-विशिष्ट डेटासेट भी सूचीबद्ध हैं। इनमें कर्नाटक ओपन गवर्नमेंट डेटा पोर्टल, महिती कनजा, केएसआरएसएसी/के-जीआईएस, भारतीय विज्ञान संस्थान और रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसे स्रोत शामिल हैं। यानी यह सिर्फ राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों की सूची नहीं है। इसमें स्थानीय और संस्थागत डेटा को भी खोजने योग्य बनाने की कोशिश की गई है।

लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी है

इतना बड़ा डेटा भंडार अपने आप में नीति नहीं बदलता। आंकड़ा तभी जनहित में बदलता है, जब उसकी गुणवत्ता, संदर्भ और सीमाओं को समझकर उसका इस्तेमाल किया जाए। किसी जिले में बीमारी का आंकड़ा ज्यादा है तो, इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि वहां बीमारी का वास्तविक प्रसार ही सबसे ज्यादा है। रिपोर्टिंग बेहतर होने से भी आंकड़ा बड़ा दिखाई दे सकता है। इसीलिए Tathyakosh का गुणवत्ता आकलन महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम विश्लेषण की जिम्मेदारी उपयोगकर्ता की ही रहेगी।

कहना होगा कि भारत की अगली डेटा क्रांति सिर्फ ज्यादा आंकड़े जमा करने से नहीं आएगी। वह तब आएगी, जब उपलब्ध आंकड़ों को सही सवालों के साथ पढ़ा जाएगा। 1947 तक पीछे जाती ऐतिहासिक कवरेज से लेकर आज के 15 लाख से अधिक सूचीबद्ध डेटासेट तक, Tathyakosh का महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि यह भारत के बिखरे हुए सार्वजनिक डेटा को एक खोजने योग्य नक्शे में बदलने की कोशिश कर रहा है।

और भविष्य में जब नीति, शोध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तीनों का आधार भारतीय डेटा होगा, तब असली सवाल यह नहीं होगा कि 'डेटा है या नहीं?' सवाल होगा, सही डेटा हमें कितनी जल्दी मिल सकता है और क्या हम उससे सही निष्कर्ष निकाल सकते हैं?' यही वह जगह है जहां यह नया डेटा मंच एक साधारण पोर्टल से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।

Updated on:
14 Aug 2026 04:11 pm
Published on:
14 Aug 2026 04:11 pm