
राजस्थानी के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार विजयदान देथा ‘बिज्जी’ का नाम लेते ही बहुत से लोगों को सुपर स्टार शाहरुख़ ख़ान और रानी मुखर्जी की फिल्म ‘पहेली’ याद आती है। दरअसल अमोल पालेकर निर्देशित 2005 की यह फिल्म देथा की चर्चित कहानी ‘दुविधा’ पर आधारित थी। लेकिन बिज्जी को केवल ‘पहेली’ के लेखक के रूप में याद करना उनके विराट साहित्यिक संसार को बहुत छोटा कर देना होगा। उनकी कहानियों का फैलाव राजस्थान की लोकस्मृति, सामाजिक जीवन, मानवीय संबंधों और सत्ता की संरचनाओं तक जाता है। उन्हेंजन्म शताब्दी के निमित्त अपने ही देश और प्रदेश में याद किया जाना खुशी और गर्व की बात है।
1 सितंबर 1926 को जोधपुर के पास बोरुंदा में जन्मे विजयदान देथा ने राजस्थानी भाषा को अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाया। उनका निधन 10 नवंबर 2013 को हुआ। 2026 में उनकी जन्म शताब्दी का अवसर इसलिए खास है क्योंकि यह केवल एक लेखक की जन्मतिथि का शताब्दी पड़ाव नहीं, बल्कि उस लोकभाषा और सांस्कृतिक परंपरा की ओर लौटने का अवसर भी है, जिसे उन्होंने अपनी कहानियों में नई ऊर्जा दी।
बिज्जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे लोककथाओं को महज पुराने किस्सों की तरह नहीं देखते थे। उन्होंने राजस्थान की मौखिक परंपरा से मिले कथानकों को अपने साहित्यिक विवेक और भाषा की ताकत से नया रूप दिया।
उनकी चर्चित कृति ‘बातां री फुलवारी’ इसी रचनात्मक प्रक्रिया का बड़ा उदाहरण है। यह बहु-खंडीय रचना राजस्थानी लोककथाओं, लोकभाषा और सामाजिक अनुभवों को साहित्यिक रूप में सामने लाती है। विभिन्न स्रोत इसे 13 या 14 खंडों में प्रकाशित रचना के रूप में दर्ज करते हैं, इसलिए इसके संस्करणों और गिनती में अंतर मिलता है।
बिज्जी की कहानियों में राजा और प्रजा हैं, प्रेम है, लालच है, छल है, सामाजिक असमानता है और स्त्री की अपनी इच्छा भी है। उनकी कथा-भूमि भले राजस्थान की हो, लेकिन सवाल सार्वभौमिक हैं।
यही कारण है कि उनकी कहानियां एक तरफ लोक की खुशबू देती हैं और दूसरी तरफ आधुनिक पाठक को बेचैन करने वाले सवाल खड़े करती हैं।
बिज्जी की लोकप्रियता का एक बड़ा रास्ता सिनेमा से होकर आया। मणि कौल ने उनकी कहानी पर 1973 में ‘दुविधा’ बनाई। बाद में अमोल पालेकर ने इसी कहानी से प्रेरित होकर ‘पहेली’ बनाई, जिसमें शाहरुख़ ख़ान और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में थे।
इसके अलावा उनकी रचनाओं से ‘चरनदास चोर’ और ‘परिणति’ जैसी फिल्में तथा कई रंगमंचीय प्रस्तुतियां भी जुड़ी हैं। इसका मतलब यह है कि बिज्जी की कथा सिर्फ किताब के पन्नों तक सीमित नहीं रही। उनके कथानक अलग-अलग माध्यमों में जाते रहे और हर माध्यम ने उन्हें अपनी तरह से पढ़ा।
यहां एक जरूरी बात है। सिनेमा ने बिज्जी को उन पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाया, जो शायद राजस्थानी साहित्य से सीधे परिचित नहीं थे। मगर बिज्जी की साहित्यिक शक्ति को समझने के लिए फिल्मों से आगे जाकर उनकी मूल रचनाओं और भाषा के संसार में जाना जरूरी है।
बिज्जी का जोधपुर के बोरुंदा गांव से रिश्ता उनके साहित्य को समझने की कुंजी है। यह वही जगह है जहां बैठकर उन्होंने राजस्थान के लोकजीवन से निकली असंख्य कथाओं को साहित्य में जगह दी।
उन्होंने यह साबित किया कि साहित्यिक केंद्र केवल महानगर नहीं होते। एक छोटे से गांव में बैठा लेखक भी ऐसी रचना कर सकता है जिसकी गूंज देश-दुनिया तक पहुंचे।
बोरुंदा उनके लिए सिर्फ भौगोलिक जगह नहीं था। वह स्मृति, भाषा, लोकविश्वास और किस्सागोई का जीवित संसार था।
आज जब डिजिटल माध्यमों में भाषा तेजी से बदल रही है और लोकभाषाओं के सामने नई चुनौतियां हैं, तब बिज्जी का साहित्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि स्थानीय भाषा में दर्ज अनुभवों को बचाना क्यों जरूरी है।
विजयदान देथा को समझने में राजस्थानी के विख्यात साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी की ‘बोरुंदा डायरी’ का अपना महत्व है। तिवाड़ी बिज्जी के जीवन के अंतिम वर्षों में उनके साथ लेखक और अनुवादक के रूप में जुड़े रहे। इसी निकटता में डायरी का जन्म हुआ।
यह पुस्तक किसी औपचारिक जीवनी की तरह बिज्जी के जीवन की तारीखें और उपलब्धियां नहीं गिनाती। इसकी खासियत यह है कि इसमें एक रचनाकार को उसके रोजमर्रा के जीवन में देखने की कोशिश है।
बुढ़ापे की कमजोर होती स्मृति, शरीर की सीमाएं, आसपास के लोगों के साथ रिश्ते, लेखन और अनुवाद की चिंता—इन सबके बीच एक बड़ा लेखक धीरे-धीरे जीवन के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ता दिखाई देता है।
तिवाड़ी की डायरी में बिज्जी के साथ बिताए समय की आत्मीयता दिखाई देती है। वह संबंध केवल लेखक और अनुवादक का नहीं रह जाता, बल्कि दो रचनात्मक व्यक्तियों के बीच गहरे संवाद में बदल जाता है।
यही वजह है कि ‘बोरुंदा डायरी’ को बिज्जी की रचनाओं के साथ पढ़ना उनके व्यक्तित्व को समझने का अलग रास्ता खोलता है।
बिज्जी ने राजस्थानी में लिखा, लेकिन उनके साहित्य की पहुंच राजस्थानी पाठकों से कहीं आगे रही। इसका बड़ा कारण उनके साहित्य के अनुवाद हैं।
मालचंद तिवाड़ी ने उनके साथ रहते हुए ‘बातां री फुलवारी’ के हिंदी अनुवाद पर काम किया। इससे सिर्फ एक पुस्तक का भाषा परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि राजस्थानी लोक-संवेदना और हिंदी पाठक के बीच एक महत्वपूर्ण पुल बना।
लोकभाषा की सबसे बड़ी ताकत उसकी जीवंतता होती है। उसके शब्द केवल अर्थ नहीं देते, वे अपने साथ जीवन-शैली, सामाजिक स्मृति और सांस्कृतिक अनुभव भी लेकर चलते हैं। बिज्जी की कहानियों का अनुवाद करते समय यही चुनौती सामने आती है।
इसलिए उनकी जन्म शताब्दी अनुवाद की भूमिका पर भी बातचीत का अवसर है। सिर्फ बिज्जी को हिंदी में पढ़ना पर्याप्त नहीं; उनकी मूल राजस्थानी भाषा की विशिष्टता को भी समझना जरूरी है।
बिज्जी का साहित्य पुराने समय की कहानियों से बना जरूर है, लेकिन उसमें उठने वाले प्रश्न आज भी पुराने नहीं हुए हैं।
सत्ता और व्यक्ति का रिश्ता, सामाजिक ऊंच-नीच, स्त्री की स्वतंत्रता, लालच, पितृसत्ता, रूढ़ियां और मनुष्य की इच्छाएं—ये सभी सवाल आज भी समाज के सामने मौजूद हैं।
यही उनकी कहानियों की ताकत है। वे लोककथा को इतिहास की बंद अलमारी में नहीं रखते। उनकी कथा उसे वर्तमान में ला खड़ा करती है।
बिज्जी की रचनाओं में हास्य और व्यंग्य भी महत्वपूर्ण हैं। वे गंभीर सामाजिक प्रश्नों को केवल भाषण की तरह नहीं रखते, बल्कि कथा, संवाद और लोकबोली के जरिए पाठक तक पहुंचाते हैं। इसी कारण उनका साहित्य पढ़ने में सहज लगता है, लेकिन पढ़ने के बाद सवाल छोड़ जाता है।
बिज्जी की जन्म शताब्दी में उनके नाम पर कार्यक्रम होना स्वाभाविक है। लेकिन उनकी सबसे सार्थक स्मृति तभी बनेगी जब उनकी रचनाएं नई पीढ़ी तक पहुंचें।
स्कूल और विश्वविद्यालयों में उनकी कहानियों पर बातचीत हो। राजस्थानी भाषा के विद्यार्थियों के लिए उनके साहित्य के नए संस्करण उपलब्ध हों। उनकी कहानियों का बेहतर अनुवाद हो। रंगमंच और डिजिटल माध्यम उनकी कथाओं को नए रूप में सामने लाएं।
सबसे जरूरी है कि बिज्जी को सिर्फ ‘पहेली’ के संदर्भ में न पढ़ाया जाए।
‘पहेली’ बिज्जी तक पहुंचने का एक दरवाजा है, पूरी इमारत नहीं।
उस इमारत के भीतर ‘बातां री फुलवारी’ है, राजस्थानी लोकजीवन है, बोरुंदा है, भाषा है और मनुष्य के भीतर चलने वाली वह बेचैनी है जिसे बिज्जी ने कहानी में बदल दिया।
‘बोरुंदा डायरी’ का महत्व इसी जगह सबसे ज्यादा समझ में आता है। यह हमें महान लेखक की मूर्ति के पीछे मौजूद मनुष्य को देखने देती है।
बिज्जी का अंतिम समय हमें यह भी याद दिलाता है कि लेखक का शरीर समाप्त हो सकता है, लेकिन उसकी भाषा और कथाएं उसके बाद भी अपना जीवन जीती हैं। तिवाड़ी ने उनके साथ बिताए समय को दर्ज करके उस अंतिम दौर को साहित्यिक स्मृति का हिस्सा बना दिया।
जन्म: 1 सितंबर 1926, बोरूंदा, जोधपुर, राजस्थान।
निधन: 10 नवंबर 2013।
उपनाम: बिज्जी।
प्रमुख कार्य: 14 खंडों में प्रसिद्ध लोक कथा संग्रह ‘बातां री फुलवारी’ की रचना।
संस्थापक:लोक कला मर्मज्ञ कोमल कोठारी के साथ मिलकर ‘रूपायन संस्थान’ की स्थापना की।
प्रमुख सम्मान: पद्म श्री (2007), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974), राजस्थान रत्न (2012) और नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित।
जन्म शताब्दी में बिज्जी को याद करने का सबसे सुंदर तरीका शायद यही है कि बोरुंदा की उस आवाज को फिर सुना जाए, जो लोक से निकली और साहित्य में बदल गई।
बिज्जी की कहानियों का संसार हमें बताता है कि लोक अतीत नहीं है। लोक आज भी हमारे बीच मौजूद है-हमारी भाषा में, हमारे रिश्तों में, हमारी स्मृतियों में और उन सवालों में भी जिन्हें हम आधुनिक होने के बावजूद हल नहीं कर पाए हैं।
यही विजयदान देथा ‘बिज्जी’ की सबसे बड़ी विरासत है। और शायद यही उनकी जन्म शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण साहित्य संदेश भी-किसी भाषा की असली ताकत उसके शब्दों में नहीं, उन शब्दों में बसी मनुष्य की स्मृति में होती है।