-भाई को खोने के बाद लोगों का जीवन बचाने बनीं डॉक्टर-सोच यह: विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत नहीं हारकर ही आप दूसरों के लिए मिसाल बन सकती हैं।
ग्वालियर। ‘बचपन में जब किसी की पीड़ा देखती तो सोचती कि कुछ मदद करूं। आगे चलकर इस जज्बे ने मुझे डॉक्टर बना दिया। हालांकि पापा चाहते थे कि मैं प्रशासनिक सेवा में जाऊं। लेकिन अपने भाई वैभव को खोने के बाद डॉक्टर बनने का दृढ़ निश्चय और बढ़ गया।’यह कहना है गाइनिकोलॉजिस्ट डॉ. वारुणी शुक्ला का। वारुणी मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर मौलाना मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर रहीं। वर्तमान में भाई की स्मृति में बने पारिवारिक अस्पताल को संभाल रही हैं।
लोगों की मदद करना है लक्ष्य
वारुणी कहती हैं कि उनके जीवन में रिश्ते बहुत अहम हैं। वह अपने भाई और पापा के बहुत करीब थी। भाई के जाने के बाद कोरोना में पिता का साथ भी छूट गया। पिता का सपना था कि वह उन लोगों के काम आएं, जिनका कोई सहारा नहीं है। अब वह अपने पिता की दिखाई उसी राह पर आगे बढ़ रही हैं।
परिवार का सपोर्ट जरूरी
वारुणी कहती हैं कि मेडिकल लाइन इमरजेंसी लाइन है। महिलाओं को दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है। ऐसे में पति नवीन शुक्ला और मां का पूरा सहयोग मिलता है। अब जीवन का लक्ष्य बेसहारा लोगों की मदद करना है। वह कोरानाकाल में मदद के लिए आगे रहीं।
इमरजेंसी के लिए हर समय रहना पड़ता है तैयार
डॉ. वारुणी ने बताया कि गाइनी बहुत ही चैलेंजिंग फील्ड है। इसमें हर समय इमरजेंसी के लिए तैयार रहना पड़ता है। उनके दो बच्चे अन्वी और अयन हैं, जो अभी छोटे हैं। समय मिलने पर वह बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताती हैं। कई बार बच्चे साथ रहने की जिद करते हैं, लेकिन इमरजेंसी में घर से निकलना होता है। मरीज को समय पर इलाज देना ही उनकी पहली प्राथमिकता है।