
Rahul Gandhi Protest : भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक से अधिक समय में यदि किसी नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की भाजपा सरकार को लगातार चुनौती दी है, तो वह कांग्रेस नेता राहुल गांधी हैं। 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद राहुल गांधी को अक्सर कमजोर विपक्षी नेता माना गया, लेकिन समय के साथ उन्होंने कई ऐसे मुद्दे उठाए, जिन्होंने राष्ट्रीय बहस को प्रभावित किया। इनमें से कुछ मामलों में केंद्र सरकार को अपना रुख बदलना पड़ा, कुछ में नीतिगत बदलाव करने पड़े और कुछ में राजनीतिक स्तर पर सफाई देनी पड़ी।
हालांकि यह भी सच है कि कई बड़े मुद्दों पर सरकार ने राहुल गांधी की मांगें नहीं मानीं। इसलिए यह कहना कि हर फैसले के पीछे राहुल गांधी का दबाव था, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन कई मामलों में विपक्ष द्वारा बनाए गए राजनीतिक दबाव ने सरकार को निर्णय लेने या अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर जरूर किया।
राहुल गांधी ने NEET, UGC-NET और अन्य भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों को लेकर सरकार पर लगातार हमला बोला। मौजूदा समय में पेपर लीक के मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर पूरे देश में आंदोलन चल रहा है। देश की राजधानी नई दिल्ली विरोध का केंद्र बनी हुई है। पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी 28 जून 2026 से लगातार इस मुद्दे को लेकर अनशन पर हैं। इस मुद्दे पर ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा भी जंतर मंतर पर अनशन पर बैठी हैं। सोनम वांगचुक को अनशन के 21वें दिन पुलिस जंतर मंतर से उठाकर ले गई और अस्पताल में दाखिला करा दिया। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई कांग्रेस के कई नेता और समर्थक 21 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। राहुल ने धर्मेंद्र प्रधान, अमित शाह और नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग की। दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी समेत कई कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर थाने ले गई और बाद में छोड़ दिया।
राहुल के ये हैं आरोप
सरकार ने क्या किया? लगातार राजनीतिक दबाव और व्यापक विरोध के बाद केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए नया कानून लाया तथा जांच एजेंसियों को सक्रिय किया।
केंद्र सरकार द्वारा 2020 में लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुआ किसान आंदोलन पिछले एक दशक के सबसे बड़े जनआंदोलनों में से एक था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुरुआत से ही इन कानूनों का विरोध किया और उन्हें किसानों के हितों के खिलाफ बताया। उन्होंने संसद के भीतर सरकार से कानून वापस लेने की मांग उठाई, वहीं संसद के बाहर प्रेस कॉन्फ्रेंस, ट्रैक्टर रैलियों और किसान महापंचायतों के जरिए आंदोलन का खुलकर समर्थन किया।
राहुल गांधी का आरोप था कि नए कृषि कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था कमजोर होगी और खेती पर बड़े कॉरपोरेट घरानों का प्रभाव बढ़ेगा। उन्होंने इसे किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए नुकसानदेह बताते हुए लगातार सरकार को घेरा।
करीब एक वर्ष तक चले किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर हजारों किसान डटे रहे। अंततः 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की और बाद में संसद ने इन्हें निरस्त कर दिया।
हालांकि कृषि कानूनों की वापसी का मुख्य कारण लंबे समय तक चला किसान आंदोलन और किसान संगठनों का व्यापक दबाव माना जाता है, लेकिन विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी और कांग्रेस, ने इस मुद्दे को लगातार राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बनाए रखा। इससे सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ा और किसान आंदोलन देश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों में शामिल हो गया।
आंदोलन के परिणाम
राहुल गांधी ने 2023 से लगातार जातीय जनगणना को अपना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया। उन्होंने जातीय जनगणना के पक्ष में नारा दिया था- 'जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।' उन्होंने संसद से लेकर चुनावी सभाओं तक सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाया और बिहार की जातीय सर्वे रिपोर्ट का हवाला दिया। लगातार राजनीतिक दबाव और कई राज्यों में बढ़ती मांग के बीच केंद्र सरकार ने सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के संग्रह और जाति आधारित डेटा पर विचार की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। बाद के वर्षों में सरकार ने जनगणना के साथ जातिगत आंकड़ों के संग्रह की दिशा में कदम बढ़ाने की घोषणा की।
यह कहना कठिन होगा कि यह फैसला केवल राहुल गांधी के दबाव में लिया गया, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।
2022 में शुरू हुई अग्निपथ योजना का राहुल गांधी ने लगातार विरोध किया।
राहुल गांधी का तर्क
हालांकि केंद्र सरकार ने योजना वापस नहीं ली, लेकिन उसके बाद कई संशोधन और राहत उपाय किए गए। सरकार ने योजना में निम्नलिखित बदलाव किए।
महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने की मांग लंबे समय से भारतीय राजनीति का अहम मुद्दा रही है। कांग्रेस ने अपने शासनकाल के दौरान भी महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन किया और इसे लागू कराने की कोशिश की। वर्ष 2010 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान यह विधेयक राज्यसभा से पारित हुआ था, लेकिन लोकसभा में इसे मंजूरी नहीं मिल सकी और बाद में वह विधेयक निष्प्रभावी हो गया।
अधिनियम के समर्थन में रही कांग्रेस
2023 में मोदी सरकार ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के रूप में महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पारित कराकर संविधान का 106वां संशोधन बनाया गया। कांग्रेस ने इस विधेयक का समर्थन किया, लेकिन साथ ही यह मांग भी उठाई कि इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए अलग उप-आरक्षण का प्रावधान किया जाए और इसे जल्द से जल्द लागू किया जाए।
राहुल गांधी का क्या है आरोप?
राहुल गांधी ने कई मौकों पर आरोप लगाया कि सरकार ने कानून तो बना दिया, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़कर लागू करने में अनावश्यक देरी की जा रही है। उनका कहना रहा है कि यदि सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% प्रतिनिधित्व जल्द मिल सकता है।
महिला आरक्षण पर सरकार का तर्क
हालांकि, सरकार का पक्ष है कि संविधान में तय प्रावधानों के अनुसार महिला आरक्षण अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू किया जा सकता है। इसलिए कानून बनने के बावजूद अभी तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण प्रभावी नहीं हुआ है।
2020 में गलवान संघर्ष के बाद राहुल गांधी ने लगातार केंद्र सरकार से सवाल पूछे-
सरकार ने कई बार संसद और प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थिति स्पष्ट की तथा सीमा पर सैन्य ढांचे को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त निवेश किया। हालांकि नीति नहीं बदली, लेकिन सरकार को लगातार जवाब देना पड़ा।
हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद राहुल गांधी ने संसद के भीतर और बाहर अडाणी समूह तथा सरकार के संबंधों पर सवाल उठाए। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की मांग की। सरकार ने JPC नहीं बनाई, लेकिन इस मुद्दे पर संसद में व्यापक बहस हुई। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में विशेषज्ञ समिति बनी और बाजार नियामक सेबी की जांच जारी रही। राजनीतिक रूप से यह मुद्दा सरकार के लिए लंबे समय तक चुनौती बना रहा।
राहुल गांधी लगातार पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों का मुद्दा उठाते रहे। उन्होंने कई बार सरकार पर आम लोगों की आय घटने और महंगाई बढ़ने का आरोप लगाया। केंद्र सरकार ने समय-समय पर पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाई। एलपीजी सिलेंडर पर सब्सिडी और विशेष छूट की घोषणा की। उज्ज्वला लाभार्थियों को अतिरिक्त राहत दी। इन फैसलों के पीछे वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें, चुनावी परिस्थितियां और आर्थिक कारक भी महत्वपूर्ण थे। इसलिए इन्हें केवल विपक्ष के दबाव का परिणाम नहीं माना जा सकता।
राहुल गांधी ने बेरोजगारी को लगातार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। उन्होंने कहा कि सरकारी दफ्तरों में जगहें खाली हैं। इसके बावजूद युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा और साथ ही युवाओं का कौशल विकास पर्याप्त नहीं है। उनके द्वारा बेरोजगारी का बार-बार मुद्दा उठाए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने विभिन्न भर्ती अभियान तेज किए। रोजगार मेलों की शुरुआत की और सरकारी रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया तेज करने की घोषणा की। हालांकि बेरोजगारी आज भी राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बनी हुई है।
2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने संविधान बचाने, आरक्षण और सामाजिक न्याय को प्रमुख मुद्दा बनाया। इस अभियान के बाद सरकार को कई बार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना पड़ा कि संविधान और आरक्षण व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। राजनीतिक रूप से यह मुद्दा चुनावी विमर्श का केंद्र बन गया।
राहुल गांधी ने कई अन्य विषयों पर भी सरकार का विरोध किया, लेकिन सरकार ने अपनी नीति नहीं बदली। इनमें प्रमुख हैं-
2014 से 2019 तक राहुल गांधी मुख्यतः भ्रष्टाचार, राफेल सौदे और आर्थिक मुद्दों पर सरकार को घेरते रहे। 2020 के बाद उनका फोकस बदल गया और उन्होंने निम्नलिखित समस्याओं को मुद्दा बनाया। भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा ने भी इन मुद्दों को जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।