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Protest: क्यों देश में हो रहे हैं सबसे ज्यादा धरना और प्रदर्शन? किन मुद्दों पर सड़कों पर उतरे लोग?

Protest: देश इस समय पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर उबल रहा है। इस बीच यह आंकड़ा आया है कि दक्षिण एशिया में सबसे अधिक धरना, प्रदर्शन भारत में ही होते हैं। किन मुद्दों पर सबसे ज्यादा प्रदर्शन हो रहे हैं? इसकी क्या वजहें हैं? आइए विस्तार से जानते हैं।
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protest in India Protest at jantar mantar

नई दिल्ली के जंतर मंतर पर छात्र प्रदर्शन करते हुए

Protest : दक्षिण एशिया को लंबे समय से राजनीतिक आंदोलनों और जन आंदोलनों का क्षेत्र माना जाता है। श्रीलंका में आर्थिक संकट के खिलाफ आंदोलन, बांग्लादेश में छात्र आंदोलन, नेपाल में संवैधानिक विवादों पर प्रदर्शन और पाकिस्तान में राजनीतिक टकराव के बीच एक तथ्य सबसे अलग दिखाई देता है- दक्षिण एशिया में सबसे अधिक विरोध प्रदर्शन भारत में दर्ज किए जा रहे हैं। हालिया डेटा बताता है कि पूरे दक्षिण एशिया के आधे से अधिक प्रदर्शन अकेले भारत में हो रहे हैं।

पहली नजर में यह विरोधाभास लग सकता है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद भारत में इतने अधिक प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? क्या यह शासन व्यवस्था की विफलता का संकेत है, या फिर यह लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है? इसका उत्तर दोनों के बीच कहीं मौजूद है।

भारत में विरोध प्रदर्शन सबसे ज्यादा क्यों?

हाल में प्रकाशित डाटा विश्लेषण के अनुसार 2025 में भारत में लगभग 20,600 विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए, यानी औसतन एक हजार से अधिक प्रदर्शन हर महीने। 2020 से 2025 के बीच दक्षिण एशिया में होने वाले कुल प्रदर्शनों में भारत की हिस्सेदारी 54% से बढ़कर 2024 में 65% तक पहुंची और 2025 में भी आधे से अधिक बनी रही।

विरोध की कई वजहें

दुनिया में भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहां की आबादी 140 करोड़ से अधिक है। देश में हजारों तरह के सामाजिक संगठन हैं जो लोगों के मुद्दों के लेकर आंदोलनरत रहते हैं। छात्र राजनीति, किसान संगठन, ट्रेड यूनियन और सक्रिय विपक्ष विरोध प्रदर्शनों को लगातार ऊर्जा देते हैं।

दूसरा कारण है- मुद्दों की विविधता। भारत में आंदोलन केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहते बल्कि शिक्षा, रोजगार, कृषि, पर्यावरण, आरक्षण, धार्मिक पहचान, क्षेत्रीय अधिकार, भूमि अधिग्रहण और महंगाई जैसे विषयों पर भी होते हैं।

तीसरा कारण है- युवा आबादी। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। बड़ी संख्या में प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने वाले छात्र, बढ़ती बेरोजगारी और सोशल मीडिया के कारण किसी भी मुद्दे पर तेज़ी से लामबंद हो जाते हैं।

शिक्षा और परीक्षा प्रणाली को लेकर सबसे ज्यादा आंदोलन

वर्ष 2026 में सबसे बड़ा आंदोलन शिक्षा व्यवस्था को लेकर देखने को मिला। कथित NEET पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियों के आरोपों ने हजारों छात्रों को सड़कों पर ला दिया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे कई राज्यों तक फैल गया। इस आंदोलन के समर्थन में कई सेलेब्रिटी प्रकाश राज, शबाना आजमी, नसीरूद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, सोनाक्षी सिन्हा से लेकर हनी सिंह तक जुड़ गए या किसी न किसी प्रकार की सहमति जताई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक परीक्षा का विरोध नहीं बल्कि रोजगार और अवसरों को लेकर युवाओं की व्यापक निराशा का प्रतीक बन गया।

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें हैं-

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
परीक्षा प्रणाली में सुधार
जवाबदेही तय करना
युवाओं के लिए पारदर्शी भर्ती व्यवस्था

बेरोजगारी भी धरना, प्रदर्शन की वजह

भारत में सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या और करोड़ों अभ्यर्थियों की प्रतिस्पर्धा लंबे समय से आंदोलन का कारण रही है। पेपर लीक, भर्ती में देरी, परीक्षा रद्द होना तथा परिणामों में विवाद लगभग हर वर्ष किसी न किसी राज्य में प्रदर्शन की वजह बनते हैं। युवाओं का असंतोष अब केवल भर्ती तक सीमित नहीं बल्कि रोजगार की गुणवत्ता और अवसरों की कमी तक फैल चुका है।

किसान संगठन भी अपनी मांग को लेकर सक्रिय

भारत में किसान आंदोलन कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2020-21 का कृषि कानून विरोध प्रदर्शन स्वतंत्रता प्राप्ति का सबसे बड़े आंदोलनों में शामिल रहा है। केंद्र सरकार ने अंततः तीनों कृषि कानून वापस ले लिए। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी मांगें अभी भी बनी हुई हैं। इसके बाद भी समय-समय पर किसान संगठन कृषि नीति, फसल मूल्य, बिजली, सिंचाई और ऋण राहत जैसे मुद्दों पर आंदोलन करते रहे हैं।

महंगाई और आर्थिक मुद्दे भी विरोध की बड़ी वजह

वर्ष 2026 में ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने के चलते हॉर्मुज स्ट्रेट के जरिए ईंधन की सप्लाई में रुकावटें पैदा हो गईं। इसके चलते अनिवार्य वस्तुओं की कीमतों की महंगाई में इजाफा होने से पूरे दक्षिण एशिया में विरोध, प्रदर्शन बढ़े। वैश्विक ऊर्जा संकट का असर भारत सहित कई देशों पर पड़ा, जिसके कारण विभिन्न राज्यों में महंगाई और बढ़ती जीवन-यापन लागत के खिलाफ प्रदर्शन हुए।

विकास के नाम पर उजाड़ भी विरोध की वजह बना

भारत में विकास परियोजनाओं के साथ-साथ पर्यावरणीय संघर्ष भी तेज हुए हैं। बांध, खनन, वन अधिकार, औद्योगिक परियोजनाएं और भूमि अधिग्रहण को लेकर आदिवासी समूह, स्थानीय समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ता लगातार विरोध दर्ज कराते रहे हैं। हाल के महीनों में केन-बेतवा परियोजना सहित कई स्थानीय आंदोलनों ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा।

राज्य और क्षेत्रीय पहचान को लेकर भी होते हैं आंदोलन

कुछ प्रदर्शन राज्य के दर्जे, स्थानीय स्वायत्तता और क्षेत्रीय अधिकारों से जुड़े रहे हैं। जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग, विभिन्न राज्यों में स्थानीय आरक्षण तथा भाषाई और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े आंदोलन समय-समय पर सामने आते रहे हैं। झारखंड, उत्तराखंड, तेलंगाना आदि राज्य लंबे समय तक हुए आंदोलन के बाद अस्तित्व में आए।

फैक्ट्रियों में मांग पूरी करवाने को लेकर आंदोलन

भारत में श्रमिक संगठन अभी भी बड़ी राजनीतिक ताकत रखते हैं। हाल के वर्षों में श्रम कानूनों, निजीकरण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर देशव्यापी हड़तालें हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार करोड़ों श्रमिक विभिन्न राष्ट्रीय बंद और हड़तालों में शामिल रहे हैं। देश के कई राज्यों में खासतौर नए विकसित हो रहे राज्यों में फैक्ट्रियों में टकराहटें ज्यादा देखी जा रही हैं।

क्या भारत में अधिकांश प्रदर्शन हिंसक होते हैं?

भारत में कुछ प्रदर्शनों को छोड़ दिया जाए तो यहां ज्यादातर विरोध शांतिपूर्ण ही होते हैं। सशस्त्र संघर्ष स्थान एवं घटना डेटा (ACLED) के अनुसार, भारत में होने वाले लगभग तीन-चौथाई प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहते हैं। हिंसक घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती हैं और उनमें भी सरकारी बलों की सीधी भागीदारी सीमित प्रतिशत में दर्ज होती है। हालांकि कई मामलों में पुलिस कार्रवाई, धारा 144 (अब नई कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत समकक्ष प्रावधान), इंटरनेट बंदी या गिरफ्तारियों को लेकर विवाद भी सामने आते हैं।

क्या भारत में प्रदर्शन बढ़ना लोकतंत्र के लिए खतरा है?

एक या दो घटनाओं से इस बात का अनुमान लगाना कि यहां भी श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह हालात बन जाएंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा हैं। भारत का संविधान शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ कानूनी सीमाएं भी लागू होती हैं।

कई राजनीतिक वैज्ञानिक मानते हैं कि बड़े लोकतंत्रों में विरोध प्रदर्शन शासन के खिलाफ विद्रोह नहीं बल्कि नीतिगत संवाद का माध्यम भी होते हैं। वहीं आलोचक कहते हैं कि यदि शिकायतों का समय पर समाधान न हो तो यही असंतोष लंबे सामाजिक तनाव में बदल सकता है।

दक्षिण एशिया में भारत क्यों अलग है?

यदि पड़ोसी देशों से तुलना करें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। श्रीलंका में प्रदर्शन मुख्यतः आर्थिक संकट के दौरान तेज हुए। बांग्लादेश में छात्र आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष प्रमुख कारण रहे।
पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन अक्सर राजनीतिक दलों और सत्ता संघर्ष के इर्द-गिर्द केंद्रित रहते हैं।
नेपाल में संवैधानिक और संघीय ढांचे से जुड़े आंदोलन प्रमुख रहे। इसके विपरीत भारत में प्रदर्शन लगातार और बहुस्तरीय हैं। यहां राष्ट्रीय, राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर अलग-अलग मुद्दों पर एक साथ आंदोलन चलते रहते हैं। यही कारण है कि कुल संख्या अन्य दक्षिण एशियाई देशों से कहीं अधिक दिखाई देती है।

भारत में विरोध प्रदर्शनों की बढ़ती संख्या को केवल सरकार के खिलाफ असंतोष या राजनीतिक अस्थिरता के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। इसकी एक बड़ी वजह देश का लोकतांत्रिक ढांचा, विशाल जनसंख्या, संगठित नागरिक समाज और विविध सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां भी हैं।

आज भारत में आंदोलित छात्र परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता चाहते हैं। किसान बेहतर कृषि नीति की मांग कर रहे हैं। श्रमिक रोजगार सुरक्षा चाहते हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की बात कर रहे हैं, जबकि आम नागरिक महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत पर सवाल उठा रहे हैं। यानी भारत में विरोध प्रदर्शन केवल सत्ता परिवर्तन की राजनीति नहीं, बल्कि नीतियों, अधिकारों और जवाबदेही की मांग का माध्यम भी हैं। यही कारण है कि दक्षिण एशिया में सबसे अधिक प्रदर्शन भारत में दर्ज होते हैं और संभवतः दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी विशेषता भी है कि असहमति अब भी सार्वजनिक रूप से व्यक्त की जाती है, भले ही उसके स्वर और स्वरूप पर लगातार बहस जारी रहे।