
"कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है
कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते"
इरतिज़ा निशात की पंक्तियां अक्सर दोहराई जाती है जब कोई नेता या अफसर गैर-जिम्मेदार बन जाता है। पर सच तो ये भी है कि भारतीय राजनीति में मंत्रियों को इस्तीफा देना कोई आसान फैसला नहीं होता।
ज्यादातर नेता कुर्सी बचाने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन आजादी के बाद से अब तक कुछ ऐसे मौके आए जब मंत्रियों ने किसी बड़े हादसे, हमले या घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए खुद पद छोड़ दिया। यह परंपरा सबसे पहले शुरू हुई रेल मंत्रालय से, और फिर सुरक्षा चूक व भ्रष्टाचार के मामलों तक फैलती चली गई।
| मंत्री/मुख्यमंत्री | इस्तीफे का कारण (वर्ष) |
|---|---|
| लाल बहादुर शास्त्री (रेल मंत्री) | अरियालुर रेल हादसा (1956) |
| नीतीश कुमार (रेल मंत्री) | गैसल रेल दुर्घटना (1999) |
| सुरेश प्रभु (रेल मंत्री) | खतौली व कैफियत एक्सप्रेस रेल हादसे (2017) |
| शिवराज पाटिल (गृह मंत्री) | 26/11 मुंबई आतंकी हमला (2008) |
| जॉर्ज फर्नांडिस (रक्षा मंत्री) | तहलका स्टिंग ऑपरेशन (2001) |
| ए. राजा (दूरसंचार मंत्री) | 2जी स्पेक्ट्रम मामला (2010) |
| विलासराव देशमुख (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री) | 26/11 मुंबई हमले के बाद प्रशासनिक जवाबदेही (2008) |
| अशोक चव्हाण (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री) | आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला (2010) |
नोट:ममता बनर्जी (रेल मंत्री) ने वर्ष 2000 में रेल हादसों के बाद इस्तीफा पेश किया था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उसे स्वीकार नहीं किया। इसलिए उन्हें इस सूची में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि यह सूची उन नेताओं की है जिनके इस्तीफे प्रभावी रूप से स्वीकार हुए।
इस परंपरा के जनक थे लाल बहादुर शास्त्री। जवाहरलाल नेहरू सरकार में रेल मंत्री रहते हुए शास्त्री का सामना दो बड़े हादसों से हुआ। नवंबर 1956 में तमिलनाडु के अरियालुर में एक ट्रेन कावेरी नदी पर बने पुल से गुजरते वक्त हादसे का शिकार हो गई, जिसमें करीब 140 से ज्यादा यात्रियों की जान चली गई।
इससे कुछ महीने पहले ही महबूबनगर में भी एक भीषण रेल दुर्घटना हो चुकी थी।
शास्त्री ने इस हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा पेश किया। पहली बार नेहरू ने इसे स्वीकार नहीं किया, लेकिन दूसरी दुर्घटना के बाद शास्त्री के अनुरोध पर आखिरकार उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया गया। यह घटना आज भी भारतीय राजनीति में नैतिक जवाबदेही की मिसाल के तौर पर याद की जाती है।
इसके करीब 43 साल बाद, अगस्त 1999 में तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने भी इसी परंपरा को दोहराया। पश्चिम बंगाल के गैसल स्टेशन के पास दो ट्रेनें आपस में टकरा गईं, जिसमें करीब 285 यात्रियों की मौत हुई। हादसे के तुरंत बाद नीतीश कुमार ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
दिलचस्प बात यह है कि उनके कार्यकाल के दौरान रेलवे के आंकड़े बताते हैं कि सैकड़ों दुर्घटनाएं दर्ज हुई थीं, लेकिन गैसल हादसे की गंभीरता ने उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया।
इसी सिलसिले में एक अधूरा किस्सा ममता बनर्जी का भी है। साल 2000 में रेल मंत्री रहते हुए दो हादसों के बाद उन्होंने भी इस्तीफा पेश किया था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। नतीजतन वे पद पर बनी रहीं।
सबसे हालिया उदाहरण सुरेश प्रभु का है। अगस्त 2017 में महज चार दिनों के भीतर दो बड़े रेल हादसे हुए। उत्तर प्रदेश के औरैया के पास कैफियत एक्सप्रेस पटरी से उतरी, और मुजफ्फरनगर के खतौली में कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई, जिसमें 22 से ज्यादा लोगों की जान गई। सुरेश प्रभु ने इन दोनों हादसों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
रेल हादसों के अलावा सुरक्षा में बड़ी चूक भी मंत्रियों के इस्तीफे की वजह बनी है। इसका सबसे चर्चित उदाहरण नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद देखने को मिला। पाकिस्तान से आए दस आतंकवादियों ने मुंबई के कई इलाकों में करीब 60 घंटे तक आतंक मचाया, जिसमें 166 से ज्यादा लोगों की जान गई।
इस हमले के बाद देशभर में सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी को लेकर तीखी आलोचना हुई। इसी दबाव में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने 30 नवंबर 2008 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने माना कि सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी उनकी बनती है। इसी हमले का असर महाराष्ट्र की राजनीति पर भी पड़ा।
उस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख थे। हमले के बाद प्रशासनिक नाकामी और आलोचनाओं के दबाव में उन्होंने भी मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। उनकी जगह अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र का नया मुख्यमंत्री बनाया गया।
हालांकि चव्हाण का कार्यकाल भी विवादों से अछूता नहीं रहा। नवंबर 2010 में आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले में उनका नाम सामने आने के बाद उन्हें भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह घोटाला मुंबई में कारगिल युद्ध के शहीदों के परिवारों के लिए बनी एक हाउसिंग सोसाइटी में राजनेताओं और अधिकारियों को अवैध रूप से फ्लैट आवंटित करने से जुड़ा था।
भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी कई मंत्रियों को इस्तीफा देने पर मजबूर किया है। मार्च 2001 में तहलका डॉट कॉम की एक स्टिंग रिपोर्ट सामने आई, जिसमें रक्षा सौदों में कथित भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ था। इस खुलासे के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया, और उसी रात तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि बाद में जांच में उन्हें राहत मिली और वे दोबारा रक्षा मंत्री बनाए गए।
एक और बड़ा मामला 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का रहा। नवंबर 2010 में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा पर स्पेक्ट्रम आवंटन में भारी अनियमितताओं के आरोप लगे। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाने का दावा किया गया था। बढ़ते दबाव के बीच राजा ने दूरसंचार मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह घोटाला उस दौर में देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल की एक बड़ी वजह बना, जिसने आगे चलकर सामाजिक आंदोलनों को भी हवा दी।
रेल मंत्रालय में नैतिक जिम्मेदारी पर इस्तीफा देने की यह परंपरा सबसे ज्यादा स्थापित रही, जहां शास्त्री से लेकर सुरेश प्रभु तक कई मंत्रियों ने हादसों पर पद छोड़ा। वहीं सुरक्षा चूक और घोटालों के मामलों में इस्तीफा ज्यादातर राजनीतिक दबाव, विपक्ष की मांग और सहयोगी दलों की नाराजगी का नतीजा रहा।
इसलिए, आज भी जब कोई बड़ा रेल हादसा या सुरक्षा चूक होती है, तो विपक्ष और जनता अक्सर इस्तीफा मांगते हैं। इतिहास के यह उदाहरण बताते हैं कि यह परंपरा भले ही अब कम देखने को मिलती हो, लेकिन भारतीय लोकतंत्र में जवाबदेही की एक मिसाल के तौर पर आज भी इनका जिक्र होता है।