Raigarh Opium Case: 'पत्रिका' की पड़ताल में यह शर्मनाक सच सामने आया है कि जिस जमीन पर जहर की फसल उगाई जा रही थी, सरकारी 'भुइयां एप' वहां 'धान' की फसल लहलहा रही थी..
Raigarh Opium Case: चूड़ामणि साहू.रायगढ़ जिले के लैलूंगा और तमनार में अफीम की लहलहाती खेती ने राजस्व विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। 'पत्रिका' की विशेष पड़ताल में यह शर्मनाक सच सामने आया है कि जिस जमीन पर जहर की फसल उगाई जा रही थी, सरकारी 'भुइयां एप' और 'गिरदावरी' रेकॉर्ड में वहां 'धान' की फसल लहलहा रही थी। यह केवल एक अवैध खेती का मामला नहीं, बल्कि डिजिटल इंडिया के दौर में राजस्व अमले की ज़मीनी हकीकत और दफ्तरों में बैठकर 'फर्जी एंट्री' करने के खेल का बड़ा पर्दाफाश है।
जब पटवारियों को खेतों में जाकर फसल का मुआयना करना था, तब वे कागजों में अफीम को धान बताकर सिस्टम को गुमराह कर रहे थे। केलो परियोजना के लिए अधिग्रहित सरकारी जमीनों पर भी नशे की खेती का होना प्रशासन की कुंभकर्णी नींद और मिलीभगत पर सीधे सवालिया निशान खड़ा करता है।
लैलूंगा तहसील के ग्राम में आरोपी सादराम नागवंशी ने खसरा नंबर 412 के करीब 2 डिसमिल हिस्से में अफीम उगा रहा था। हकीकत में भुइयां एप के अनुसार 24 सितंबर 2025 को हुई गिरदावरी में यहां 'खरीफ धान' दर्ज है। वहीं आरोपी अभिमन्यु नागवंशी के खसरा नंबर 429/3 पर अफीम की खेती मिली। हकीकत में 15 सितंबर 2025 की गिरदावरी रिपोर्ट इसे 'धान का खेत' बता रही है। आरोपी तानसिंह नागवंशी के खसरा नंबर 26 पर अवैध खेती। हकीकत में 26 सितंबर 2025 को हुई सरकारी जांच में यहां भी धान दर्ज किया गया।
सरकारी जमीन पर नशे की खेती। तमनार के आमागांव में नदी किनारे करीब एक एकड़ में अफीम की खेती पाई गई। यहां की पड़ताल और भी गंभीर लापरवाही उजागर करती है। खसरा नंबर 462/1 की जमीन वर्ष 2014 में ही केलो परियोजना के लिए अधिग्रहित की जा चुकी है। मुआवजा बंटने के बाद भी इस सरकारी जमीन पर धड़ल्ले से अफीम उगाई जा रही थी। खसरा नंबर 462/2 रिकॉर्ड में 'निरंक' है, जबकि 462/3, 4/4 और 4/5 पर 30 सितंबर 2025 को हुई गिरदावरी में धान की फसल दर्ज की गई है।
राजस्व विभाग का नियम है कि पटवारी को मौके पर जाकर फसल का मुआयना करना होता है। अफीम की खेती का यह मामला साबित करता है कि घर बैठे इंट्री की गई है। क्या राजस्व अमला खेतों में जाए बिना ही दफ्तर में बैठकर 'धान' की एंट्री कर रहा है। गिरदावरी रिपोर्ट के आधार पर ही सरकारी खरीदी और योजनाएं तय होती हैं, ऐसे में अफीम को धान बताना बड़ी लापरवाही है।
कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने पत्रिका से कहा कि पिछले वर्ष खरीफ के लिए गिरदावरी हुई थी। उसकी फसल कट चुकी थी। इसके बाद ही उक्त खेती हुई। राजस्व पुलिस और फारेस्ट की संयुक्त जांच में ही इस मामले का खुलासा हुआ है।