रायपुर

कुम्हारों की बस्ती में आई रौनक

- दो साल से बंद था काम-धंधा

2 min read
Apr 30, 2022
अक्षय तृतीया : कुम्हारों की बस्ती में आई रौनक

दिनेश यदु @ रायपुर. तेज गर्मी का असर शहर में दिखने लगा है। देशी फ्रीज (native freeze) के नाम से चर्चित मिट्टी के मटकों (clay pots) की डिमांड बढ़ गई है। शहर में जगह-जगह मटके और सुराही की दुकान लग गई है। स्थानीय कुम्हारों के अलावा ओडिशा और राजस्थान (Odisha and Rajasthan) से भी मटके आ रहे हैं। करीब दो साल बाद कुम्हारों की बस्ती में भी रौनक लौट गई है। दरअसल कोराेना के समय कारोबार बंद था। इसलिए कुम्हारों के पहिए भी थम गए थे। अब बाजार पूरी तरह से सामान्य हो गया और गर्मी भी तेज पड़ने लगी है।

इससे कुम्हारों के मिट्टी के मटके, सुराही, बोतल बनाने के धंधे में तेजी आई है। बाजार में एक मटका 80 से 100 रुपए में बिक रहा है। राजस्थान के मिट्टी के रंगीन मटकों की कीमत 400 से 500 रुपए है। अब नल वाले मटके आने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि मिट्टी के मटके में पानी ठंडा रहता है। इस कारण लोग इसे ज्यादा पसंद करते हैं। बढ़ गया मटकों का रेट शहर में स्थानीय कुम्हारों के बनाए घड़ों के अलावा ओडिशा और राजस्थान से भी माल आ रहा है। राजस्थान के रंगीन घड़ों की डिमांड ज्यादा है। उसका रेट भी ज्यादा है। मटकों का रेट 5 से 10 रुपए तक बढ़ा है।

IMAGE CREDIT: patrika

रायपुर शहर से लगे ग्राम मुंडरा में 50 परिवार रहते हैं, जो मिट्टी के बर्तन, मटका बनाकर जीवनयापन करते हैं। हुलासराम चक्रधारी ने बताया कि इस वर्ष मटकों की मांग ज्यादा है। पिछले दो साल से लॉकडाउन के कारण कारोबार बंद था। इस बार मटके का की कीमत को 3 से 4 रूपए बढ़ाया है। लकड़ी व कंडे की कीमत बढ़ने जो कंडे हम पहले 1000 में खरीदा करते थे, अब उसकी कीमत 1300 से 1500 रूपए हो गए। लकड़ी ढाई रुपए से 4 रुपए प्रति किलो महंगा हो गया है।

यह भी पढ़ें - बच्चे बोले- हमारी मां को गंदे अंकल से दूर कीजिए मैडम
यह भी पढ़ें - तेंदू से सजा बाजार, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में है कारगर
यह भी पढ़ें - दिल्ली में प्रदेश की बात नहीं रख पाते हमारे नेता, हम पर बनाते हैं दबाव
यह भी पढ़ें -माडिया पेज व राशन के साथ धरनास्थल पहुंचीं मितानिनें

पूरन चक्रधारी ने बताया कि इस सीजन में अब तक 500-600 मटके बना लिए है। अक्षय तृतीया पर भी घड़ों की मांग ज्यादा रहती है। राजूराम कुंभकार ने बताया ने बताया कि पूरे गांव में हर साल करीब एक लाख मटका बनता है। करीब 50 मटके बनाकर तैयार हैं। लॉकडाउन के दौरान मुश्किल से 5 हजार मटके बेचे थे। बढ़ जाता है भाव गांव ने निकलकर शहर में आते ही मटके का भाव दोगुना-तीनगुना तक हो जाता है। गांव के कुम्हार व्यापारी को प्रति घड़ा 35 से 40 रुपए में देते हैं, जिसे कारोबारी शहर में ये 80 से 100 रुपए में बेचते हैं। इसके अलावा नल लगा मटका 150 रुपए, सुराही 120 से 150 रुपए , मिट्टी के बोतल 130 से 160 रुपए व राजस्थान से आये रंगीन मटके की कीमत 400 से 500 रुपए तक बिक रहा हैं।

Updated on:
30 Apr 2022 08:11 am
Published on:
30 Apr 2022 01:37 am
Also Read
View All