छत्तीसगढ़ के कवर्धा विधानसभा का समीकरण और यहां की जनता का हर दशक में मूड बदलता रहा। यहां पर राजघराने से विधायक रहने की परंपरा भी टूटी है।
यशवंत झारिया/कवर्धा. छत्तीसगढ़ के कवर्धा विधानसभा का समीकरण और यहां की जनता का हर दशक में मूड बदलता रहा। रामराज्य परिषद और राजघराने से लेकर निर्दलीय विधायक बनाने तक व कांग्रेस से भाजपा के विधायक चुने जाने तक स्थितियां बदलती रही। वहीं यहां पर राजघराने से विधायक रहने की परंपरा भी टूटी है।
कवर्धा विधानसभा में हर दशक पार्टी और विधायक बदलते गए। प्रारंभिक दौर में रामराज्य परिषद के विधायक लगातार इस विधानसभा में विद्यमान रहे। इसके बाद तीन बार विधायक निर्दलीय रूप से भी निर्वाचित हुए, लेकिन अधिकतर विधायक राजघराने से ही रहे। 1977 में रानी शशिप्रभा देवी ने रामराज्य परिषद में रहते हुए कांग्रेस के हमीदुल्लाह खान को हराया।
लेकिन राजघराने की इस परंपरा को पहली बार हमीदुल्लाह खान ने ही वर्ष 1980 में रानी शशिप्रभा देवी को हराकर तोड़ दिया। तब तक जिले में कांग्रेस का अस्तित्व नहीं बन पाया था। हालांकि हमीदुल्लाह खान कांग्रेस से थे, लेकिन उन्हें भी जीत तभी मिली जब वह निर्दलीय चुनाव लड़े। इसके बाद कांग्रेस का भी जिले में उदय हुआ, जब 1985 में रानी शशिप्रभा देवी ने कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ी और विधायक बनी।
1990 में खिला पहली बार कमल
1980 में भारतीय जनता पार्टी का देश में उदय हुआ। पार्टी की सोच के अनुरूप संघ के कार्यकर्ता जुड़ते गए। इसमें पहला नाम रमन सिंह का भी आता है। कवर्धा विधानसभा में भाजपा का पहल कमल डॉ. रमन सिंह ने ही 1990 में खिलाया था। इन्होंने कांग्रेस के जगदीश चंद्रवंशी को हराया। इसके बाद जब वर्ष 1993 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए तो डॉ. रमन ने राजघराने की रानी शशिप्रभा देवी को भी पराजित किया।
महल तक सिमट गया राजघराना
वर्ष 2003 में कवर्धा विधानसभा से योगेश्वरराज सिंह ने भाजपा के सियाराम साहू को हरा दिया। इसके बाद वर्ष 2008 में भाजपा के सियाराम साहू ने योगेश्वरराज सिंह को हराया। वहीं 2013 में भाजपा के अशोक साहू ने कांग्रेस के मो.अकबर को पराजित किया। इस तरह राजघराना महल में सिमट गया।
राजघराने की वापसी
कवर्धा विधानसभा में डॉ. रमन सिंह ने कमल जरूर खिलाया, लेकिन राजघराने ने उसे मुरझाकर वापसी की। 1998 में कांग्रेस से योगेश्वरराज सिंह ने डॉ. रमन सिंह को पराजित कर दिया। लेकिन यह हार ही डॉ. सिंह के लिए भाग्यशाली साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद वह 1999 में सांसद बनकर केंद्र में जा पहुंचे।
पार्टी नहीं, व्यक्ति की जीत
वर्ष 1967 में कवर्धा विधानसभा से टीवी सिंह बिना किसी पार्टी की मदद से निर्दलीय चुनाव लड़े और विधायक बने। इसी तरह 1972 में यशवंतराज सिंह भी निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इसके बाद 1980 हमीदुल्लाह खान भी निर्दलीय चुनाव लड़कर विधायक बने। मतलब यहां पर आम जनता ने पार्टी को अस्वीकार करते हुए व्यक्ति को जीत दिलाया।