
CG News: बेटियों का माता-पिता के साथ उनके कार्यस्थल पर जाकर काम करते हुए देखना और उसे समझना नया अनुभव रहा। पत्रिका के अभियान से जुड़कर शहर के लोगों ने नई परंपरा को न केवल सराहा बल्कि, इसे बच्चियों में मैनेजमेंट की समझ बढ़ाने वाला भी बताया।
जब पापा की कुर्सी पर बैठी, तो मुझे गर्व महसूस हुआ। कुर्सी पर बैठते ही लगा कि यह सिर्फ कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी की जगह है। पापा लोगों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ते हैं। उस दिन मुझे समझ आया कि वकील बनना कितना बड़ा काम है। - अंशिका मेश्राम, (कक्षा 8), पिता- आनंद कुमार मेश्राम (एडवोकेट)
आज मम्मा की स्कूल संचालिका वाली कुर्सी पर बैठकर मुझे अहसास हुआ कि एक संस्थान चलाना कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। बच्चों का भविष्य और शिक्षकों का मार्गदर्शन करना आसान नहीं होता। फाइलों के प्रबंधन से लेकर अनुशासन बनाए रखने तक निर्णय लेने की क्षमता ने मुझे गहराई से प्रभावित किया और बहुत कुछ सिखाया। तनिषा शर्मा (कक्षा 10), मम्मी: पदमा शर्मा (स्कूल एडमिनिस्ट्रेटर)
माताजी के आध्यात्मिक कार्यक्षेत्र को करीब से देखना गौरवपूर्ण रहा। व्यासपीठ की मर्यादा और कथा के माध्यम से समाज को संस्कारित करने की कला अद्वितीय है। मैंने महसूस किया कि ज्ञान बांटना और लोगों को सही मार्ग दिखाना सबसे कठिन लेकिन सबसे पवित्र जिम्मेदारी है। यह अनुभव अविस्मरणीय है। अदिति शर्मा (कक्षा 10), मां: ममता शर्मा (कथावाचिका)
आज पापा की कोर्ट वाली कुर्सी पर बैठकर मुझे कानून की ताकत और जिम्मेदारी का अहसास हुआ। फाइलों के अंबार और दलीलों के बीच न्याय दिलाने का जज्बा वाकई प्रेरणादायक है। मैंने समझा कि एक वकील सिर्फ बहस नहीं करता बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करता है। तेजश्री सोना (कक्षा 9), पिता- डॉ. जनमेजय सोना (एडवोकेट)
पापा की ऑफिस में मैंने जाना कि वे किस तरह सिनेमाघर वालों से बात करते हैं। फिल्म लगने के बाद थिएटर्स की मॉनिटरिंग से लेकर रिकवरी तक की जानकारी मिली। पलक सिन्हा (कक्षा 7वीं) पिता - ललित सिन्हा, फिल्म वितरक