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इंटरनेशनल डे ऑफ वुमन जज: न्याय की कुर्सी तक बेटियों के बढ़ते कदम

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) द्वारा आयोजित सिविल जज परीक्षा के परिणामों का एनालिसिस बताता है कि हर साल बड़ी संख्या में महिलाएं न केवल इस परीक्षा में शामिल हो रही हैं

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International Day of Women Judges

इंटरनेशनल डे ऑफ वुमन जज ( Photo - Patrika )

ताबीर हुसैन. महिलाएं अब केवल गृहस्थी और फैमिली मैनेजमेंट तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। बीते कुछ वर्षों में न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव की साफ तस्वीर पेश करती है। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) द्वारा आयोजित सिविल जज परीक्षा के परिणामों का एनालिसिस बताता है कि हर साल बड़ी संख्या में महिलाएं न केवल इस परीक्षा में शामिल हो रही हैं बल्कि चयनित होकर जज की कुर्सी तक पहुंच भी रही हैं।

इंटरनेशनल डे ऑफ वुमन जज के अवसर पर यह आंकड़े बताते हैं कि न्याय के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार मजबूत हो रही है। समाज में बढ़ती जागरुकता, परिवार का भरोसा और बेटियों की मेहनत ने मिलकर इस बदलाव को गति दी है। पहले जहां कानून और ज्यूडिशरी का क्षेत्र पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता था, वहीं अब महिलाएं भी इस क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं।

भागीदारी और भी बढ़ेगी

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले एक दशक में सोच में बड़ा बदलाव आया है। अब परिवार बेटियों को सुरक्षित और प्रतिष्ठित कॅरियर के रूप में न्यायिक सेवा की ओर प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसके कारण बड़ी संख्या में छात्राएं लॉ की पढ़ाई के बाद ज्यूडिशरी की तैयारी कर रही हैं और सफलता भी हासिल कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ज्यूडिशरी में महिलाओं की भागीदारी और भी बढ़ेगी। इससे न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता और संतुलन भी मजबूत होगा क्योंकि महिलाएं समाज के कई पहलुओं को अलग दृष्टिकोण से समझती हैं।

सिविल जज परीक्षा में महिला उम्मीदवारों का प्रदर्शन

वर्ष - कुल - पद - महिला उम्मीदवार
2024 -57 - 33
2023 - 49 - 31
2022 - 152 -93
2020 -103 - 55
2019 -127 - 55
2017 -83 -33

क्यों मनाया जाता है यह दिवस

इंटरनेशनल डे ऑफ वुमन जज हर साल 10 मार्च को मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को सम्मान देना और उन्हें प्रोत्साहित करना है। दुनिया के कई देशों में लंबे समय तक न्यायपालिका में महिलाओं की संख्या बहुत कम रही। ऐसे में महिलाओं को जज बनने के लिए प्रेरित करने, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और न्यायिक प्रणाली में संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को मान्यता दी है ताकि समाज में यह संदेश पहुंचे कि महिलाएं भी न्याय देने की जिम्मेदारी को उतनी ही दक्षता और संवेदनशीलता के साथ निभा सकती हैं।

भरोसे को मेहनत से साबित कर रहीं बेटियां

चाणक्य लॉ एकेडमी, नितिन नामदेव ने कहा कि ज्यूडिशरी में बेटियों की संख्या बढऩे का सबसे बड़ा कारण पैरेंट्स का मजबूत सपोर्ट है। पहले कई परिवार बेटियों को इस क्षेत्र में भेजने को लेकर संकोच करते थे, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। मां-बाप इस क्षेत्र को सुरक्षित और सम्मानजनक मानते हुए बेटियों को उनकी पसंद के कॅरियर में आगे बढऩे के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

कई मामलों में तो पैरेंट्स खुद बेटियों को कानून की पढ़ाई करने और ज्यूडिशरी की तैयारी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। बेटियां भी इस भरोसे को मेहनत से साबित कर रही हैं। वे लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं और चयनित होकर न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं। यही कारण है कि साल दर साल सिविल जज परीक्षा में महिला उम्मीदवारों की सफलता का ग्राफ बढ़ता दिखाई दे रहा है।