नाव की घोषणा होने के साथ ही प्रदेश में चुनावी हलचल बढ़ गई है। राजनीतिक दलों ने गतिविधियां तेज कर दी। इसी के साथ टिकट को लेकर घमासान शुरू हो गया है।
पुनीत कौशिक/भिलाई. नाव की घोषणा होने के साथ ही प्रदेश में चुनावी हलचल बढ़ गई है। राजनीतिक दलों ने गतिविधियां तेज कर दी। इसी के साथ टिकट को लेकर घमासान शुरू हो गया है। राजनीतिक दल अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाती हैं और जनता का मूड किस करवट बैठेगा यह आने वाले दिनों में साफ होगा।
अगर पिछले पांच साल के राजनीतिक दलों के कामकाज का विश्लेषण करें तो एक बात साफ है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों जनता का दिल जीतने में नाकाम रही हैं। किसी के पास कोई बड़ा मुद्दा भी नहीं है। न सत्ताधारी भाजपा के पक्ष में लहर दिख रही है न कांग्रेस का विरोध है। कांग्रेस-भाजपा मिशन 2018 के लिए जमकर पसीना बहा रही है।
छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जोगी) ने कई क्षेत्रों में अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है। लोग इस नई पार्टी को भी तौल रहे हैं। अब तक की स्थिति में कहें तो इस साल होने वाले चुनाव में जीत का दारोमदार पार्टी और प्रत्याशी की छवि पर ही जाकर टिकेगा। वहीं राजनीतिक दलों की कुछ मजबूत पहलू है तो कुछ कमजोरियां भी है जिनका चुनाव में उनको नफा-नुकसान भी हो सकता है।
भाजपा - मजबूत पक्ष
मजबूत संगठन: 15 साल लगातार सत्ता में रहकर भाजपा ने एक मजबूत संगठन खड़ा किया है। बूथ स्तर तक उनका कैडर तैयार है।
गिनाने के लिए विकास कार्य: भाजपा अपने किए विकास कार्यो को गिनाएगी। विकास के नाम पर गिनाने के लिए सत्ताधारी
होने के कारण भाजपा के पास बहुत कुछ है।
हर युवा की जरूरत लेपटॉप-मोबाइल: लौपटॉप और मोबाइल बांटकर युवा वर्ग को लुभाएगी। यह आज यह हर युवा की जरूरत है।
कमजोर पक्ष
गुटबाजी: सत्ताधारी होने के कारण पार्टी में गुटबाजी बढ़ी है। पुराने झंडाबरदार भाजपाई उपेक्षित हैं। असंतोष बढ़ा है।
कुछ अधूरे वादे: धान का समर्थन मूल्य 21 सौ रुपए नहीं मिला। बोनस पूरे पांच साल का नहीं दिया। शिक्षाकर्मियों के एक वर्ग का संविलियन और आंगनबाड़ी कार्यकताओं की मांगे पूरी नहीं हुई।
शराब खुद बेच रही सरकार: प्रदेश में शराब के खिलाफ लगातार आंदोलन हुए। शराब बंदी लागू नहीं की, बल्कि सरकार खुद शराब बेच रही है।
सूखा है पर राहत नहीं: पिछले साल सूखाग्रस्त तहसीलों में राहत कार्य शुरू नहीं हुए हैं। मनरेगा के काम भी ठप है। मनरेगा के करोड़ों के पुराना भुगतान बाकी है।
जीएसटी: अच्छे दिन की उम्मीद काफूर हो गई है। पेट्रोल-डीजल के साथ खाद्यान्न भी महंगे हो गए। व्यापारी वर्ग भी नाराज है।
कांग्रेस - मजबूत पक्ष
सबसे पुरानी पार्टी: कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। कमजोर और आदिवासी क्षेत्र में पार्टी का प्रभाव कायम है।
नेतृत्व में संतुलन की कोशिश: पार्टी में भूपेश बघेल को अध्यक्ष बनाने के साथ महिलाओं और युवाओं को पद देकर गुटीय संतुलन के साथ कुछ वर्ग को साधने की कोशिश की गई है।
समाजिक संतुलन: संगठन में सामाजिक संतुलन का घ्यान रखा गया है। पिछड़ा और अजा,जजा वर्ग को संगठन में तव्वजो दी जा रही है।
कमजोर पक्ष
लगातार सत्ता से दूरी, संगठन कमजोर: बूथ स्तर तक संगठन को खड़ा नहीं किया। बड़े नेताओं ने अपना रवैया नहीं बदला। उन्हें पार्टी से ज्यादा खुद की चिंता है। सेकंड लाइन के नेताओं को उभरने ही नहीं दिया।
गुटबाजी ऐसी कि अब कार्यकर्ता नहीं बचे: कांग्रेस में अब कार्यकर्ता नहीं सिर्फ पदाधिकारी हैं। बड़े नेताओं में भारी गुटबाजी है। नेतृत्व एक मंच पर लाने में नाकाम है।
मुद्दे से भटकाव: भाष्ट्राचार और वादाखिलाफ के विरोध में राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन से भटक गई। अंतागढ़ उपचुनाव के सीडी कांड को भुनाने में नाकाम रही। अब सेक्स सीडी कांड में खुद बैकपुट पर है। जनता को जोडऩे वाली कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया।
भीड़ जुटाने वाला चेहरा नहीं: पार्टी में ऐसा कोई लीडर नहीं जिसके नाम पर भीड़ जुटे। सबकी अपनी ढपली और अपना राग है।
जनता कांग्रेस - मजबूत पक्ष
संसाधन,दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों से मजबूत: यह प्रदेश की पहली क्षेत्रीय पार्टी है जिसके पास संसाधन है। पहले के क्षेत्रीय दल इस मामले में कमजोर साबित हुए थे।
चुनाव घोषणा पत्र कुछ हटकर: शपथ पत्र के साथ चुनाव का घोषणा पत्र तैयार किया है। जनता को शपथ पूर्वक यह अधिकार दिया है कि उनकी सरकार वादा पूरा नहीं करती को लोग कोर्ट जा सकते हैं।
जोगी का प्रभाव,भीड़ जुटाने में सक्षम: ठेठ गवइंहा अंदाज और उनके चुटेले संवाद लोगों की भीड़ जुटाती है। कुछ बड़े समुदायों पर उनका खासा प्रभाव है।
बसपा से गठबंधन: बसपा से गठबंधन कर जोगी ने एक तबके के वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। इसका फायदा मिल सकता है।
कमजोर पक्ष
नई पार्टी,सिंबाल की पहचान नहीं: यह नई पार्टी है। सिंबाल मिल गया है पर यह लोगों की जुबना पर नहीं चढ़ा है।
गुटबाजी-बढ़ती जा रही है: अलग-अलग पार्टी और विचारधारा के लोग हैं। पार्टी इनके बीच तालमेल बिठाने में असफल रही है।
किसानों की अत्महत्या और बोनस समेत कई मुद्दों पर पार्टी परोक्ष तौर पर सरकार के साथ खड़ा दिखती है।
गठबंधन को लेकर खींचतान: बसपा से गठबंधन को लेकर पार्टी में उछल पुथल भी मची हुई है। पद और टिकट की आस लेकर आए लोग पार्टी छोडऩे लगे हैं।