रायपुर

बिग ब्रेकिंग ऑफ इलेक्शन – चुनाव में बढ़ गई एनीमा की बिक्री

भरकापुर से हमारे एक साथी ने व्हाट्सएप किया ‘भिया शहर में अचानक एनीमा की बिक्री बढऩे की खबर आ रही है।‘ खबर चौकाने वाली नहीं थी तो मैंने कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया।
2 min read
Nov 04, 2018
cg election 2018
CG Polls: वोट उसी को जो प्रदेश के छोटे से लेकर बड़े व्यापारियों के इन उम्मीदों पर उतरेगा खरा

तमंचा रायपुरी/रायपुर. भरकापुर से हमारे एक साथी ने व्हाट्सएप किया ‘भिया शहर में अचानक एनीमा की बिक्री बढऩे की खबर आ रही है।‘ खबर चौकाने वाली नहीं थी तो मैंने कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया। दो घंटे के बाद उसने फिर व्हाट्सएप किया ‘भईया एनिमा वाला समाचार बिग ब्रेकिंग है, मैं आपको फोन करता हूँ।‘

एनिमा दरअसल कब्ज में लिया जाता है ताकि खाया-पिया सुविधापूर्ण तरीके से निकल जाए। कब्ज तब होता है जब पेट खाये हुए को पचा न पाए या क्षमता से ज्यादा खा लिया जाए। हम सोंच ही रहे थे तब तक उसका फोन आ गया। उसने बताया ‘सरजी एनीमा एक पार्टी विशेष के लोग ही ले रहे हैं!’ तब माथा ठनका।

उसने स्पष्ट किया कि लोग एनीमा इसलिये नहीं ले रहे हैं कि उन्हें कब्ज है। बल्कि इसलिए ले रहे है कि पुलिस की मार ने उनके आत्म बल को अवरोध कर रखा है। संवाददाता नें यह भी बताया कि वे दुखी होकर कह रहें हैं कि उनकी खुद की पार्टी ऐसे लोगों से चुनाव प्रचार करा रही है जो पार्टी-पथ में एक भी डंडा नहीं खाये हैं। हम जीवन भर लाठी-डंडा खाते रहेंगे, निपटने के लिए भी तरसते रहेंगे और जीवन भर मलाई चांटते लोग बड़े पदाधिकारी बन के सुख-सुविधा
पा जाएंगे। हमने पूछा कि क्या उन्हें लाठी मारने वाले के प्रति रोष नहीं है?

उसने बताया कि है! पर ज्यादा रोष तो ये है कि फलाना-ढेकाना को लाठी क्यूं नहीं पड़ी। डंडा खाने वालों की विज्ञप्ति में उनका नाम क्यूं नहीं है। वे कह रहे हैं कि हम गांधीवादी बैल तो हैं नहीं जो हमें कहीं भी जोंत दो। मित्र नें गंभीर होते हुए यह भी कहा कि खाए-पीए-अघाए बाप के लपलपाते व्यक्तित्व वाले होनहारों से यह सब सुनकर दुख होता है सरजी, कईयों को तो बबासीर भी है। हम चिंता में पड़ गए, एनिमा की बिक्री को बाई लाईन बनायें कि विज्ञप्ति की चतुराई को समझ में नहीं आ रहा था।

नकली इंद्रियों के सहारे जब एक दूसरे मित्र से जब हमने इस पर सलाह मशविरा किया तो वे गंभीर हो गए। लगा अपने उपर लगे मी-टू के आरोप का सत्?य बताने जा रहे हैं किन्तु मूड चेंज कर शायर की भांति कहने लगे ‘नेतागिरी भी अजब शग़ल है, एक आग का दरिया है जिसमे डूब के जाना है। जब आदमी कुछ काम का नहीं रह जाता तब नेता बनता है।

बेनर बांधने से लेकर टिकिट पाने तक कि लम्बी यात्रा में धीरज के साथ आगे बढ़ता है। जिसमे न चाहते हुए भी विरोध की नौटंकी करना, मार खाना और पता नहीं क्या-क्या करना पड़ता है।नेता किसी अन्?य ग्रह का प्राणी तो होता नहीं इसी ग्रह का मनुष्?य होता है इसलिए, जैसे सनातन दर्शन में जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है वैसे ही इसका लक्ष्य पद-पावर व प्रतिष्ठा से होते हुए टिकिट पाना और कुर्सी हथियाना होता है। सबकुछ सहने के बावजूद टिकट न देकर इनका बाह्यघात करने वाले को मजा चखाने के लिए ये चुनाव में भितरघात भी करते हैं। मामला दिलचस्प है, एनीमा को अपना काम करने दो।

Updated on:
04 Nov 2018 07:53 pm
Published on:
04 Nov 2018 07:53 pm