रायपुर

impact of war: गांव की रसोई तक पहुंचा गैस संकट, कंडे-लकड़ी की बढ़ी मांग, ग्रामीणों ने फिर अपनाया चूल्हा युग

impact of war: ग्रामीण इलाकों में लोग नदी, तालाब और नर्सरी के पास सूखी लकडिय़ां जुटाने में लगे हैं। महिलाओं का कहना है कि गैस की ऊंची कीमतों और लंबी प्रतीक्षा से बेहतर है कि वे खुद ईंधन का इंतजाम करें।

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Apr 09, 2026

impact of War: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते वैश्विक संघर्ष का असर अब भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण अंचलों की रसोई तक पहुंच गया है। युद्ध के कारण घरेलू गैस सिलेंडर की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे आम आदमी की मुश्किलें बढ़ गई हैं। स्थिति इतनी विकट है कि गैस बुकिंग के 25 से 45 दिन बीत जाने के बाद भी उपभोक्ताओं को ओटीपी नहीं मिल रहा है। सिलेंडर के लिए दर-दर भटकते लोग अब मजबूरन पारंपरिक ईंधन—कंडे और जलाऊ लकड़ी की ओर रुख कर रहे हैं।

शहरों से गांवों की ओर दौड़, मांग में उछाल

गैस की अनुपलब्धता ने कंडों (छेने) की मांग में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी है। शहर के लोग अब ईंधन की तलाश में गांवों का रुख कर रहे हैं, जिससे इनकी कीमतों में भी तेजी आई है। महिलाएं सुबह-सुबह सडक़ों पर टोकरी लेकर गोबर इकठ्ठा करती नजर आ रही हैं, ताकि घर का चूल्हा जल सके। वहीं, ग्रामीण इलाकों में लोग नदी, तालाब और नर्सरी के पास सूखी लकडिय़ां जुटाने में लगे हैं। महिलाओं का कहना है कि गैस की ऊंची कीमतों और लंबी प्रतीक्षा से बेहतर है कि वे खुद ईंधन का इंतजाम करें। सुबह से जुटाई लकड़ी से करीब 20-25 दिनों का गुजारा हो रहा है।

मवेशियों की बढ़ी पूछपरख, सडक़ पर कम हुए आवारा पशु

ईंधन के इस संकट ने एक अनोखा बदलाव भी दिखाया है। गोबर की बढ़ती मांग के कारण किसान अब अपने मवेशियों को खुला नहीं छोड़ रहे हैं। पशुओं को शाम होते ही ढूंढकर कोठार में बांधा जा रहा है और उनके चारे-पानी की विशेष व्यवस्था की जा रही है। इसका परिणाम यह हुआ है कि सडक़ों पर आवारा घूमने वाले मवेशियों की संख्या में कमी आई है।

उज्ज्वला के दौर में फिर लौटा मिट्टी का चूल्हा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2016 में महिलाओं को चूल्हे के धुएं से मुक्ति दिलाने के लिए उज्ज्वला योजना शुरू की थी। इस योजना से महिलाओं का काम मिनटों में होने लगा था, लेकिन वर्तमान युद्ध की परिस्थितियों ने इस व्यवस्था को चुनौती दे दी है। बाजार में अब लोहे के चूल्हों की बिक्री बढ़ गई है और मिट्टी के चूल्हे बनाने वालों की मांग फिर से लौट आई है। कई घरों में ईंटों के अस्थायी चूल्हे बनाकर खाना पकाया जा रहा है।

इतिहास ने खुद को दोहराया

स्थानीय ग्रामीण बुधराम, गौतम और तेजू का कहना है कि लकड़ी और छेने की आग पर बने खाने का स्वाद ही अलग होता है। वहीं, कुछ लोग चुटकी लेते हुए कहते हैं कि "गैस का खाना खाने से गैस (एसिडिटी) हो रही थी, अब पुरानी पद्धति ही ठीक है।" वर्तमान हालातों को देखकर लोग कह रहे हैं कि इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है और आधुनिकता के दौर में समाज वापस अपनी जड़ों की ओर लौटने को मजबूर है।

Updated on:
09 Apr 2026 05:03 pm
Published on:
09 Apr 2026 05:02 pm
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