रायपुर

नक्सल प्रभावित गांव से ब्राजील तक पहुंची हेमबती, 10 साल की उम्र में माता-पिता को खोया, अब देश के लिए खेलेगी जूडो

World School Judo Games: 10 साल की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद भी हेमबती नाग ने मुश्किल हालात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। बालिका गृह से जूडो की शुरुआत करने वाली हेमबती ने सात साल की मेहनत के बाद वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स में जगह बनाई है।
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Oct 04, 2026
Hembati Nag Judo
हेमबती नाग (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Hembati Nag Judo: नक्सल प्रभावित इलाके के छोटे से गांव से निकलकर 17 साल की हेमबती नाग अब अंतरराष्ट्रीय जूडो मैट पर देश का प्रतिनिधित्व करने जा रही हैं। कोंडागांव के बड़ेकनेरा गांव की रहने वाली हेमबती ने महज सात साल के जूडो सफर में यह मुकाम हासिल किया है। 10 साल की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद बालिका गृह में रहते हुए जूडो की ट्रेनिंग शुरू करने वाली हेमबती ने मुश्किल परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। लगातार मेहनत और अभ्यास के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ के लिए कई पदक जीते। अब दिसंबर में ब्राजील में होने वाले वर्ल्ड स्कूल जूडो गेम्स में वह भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।

बालिका गृह से शुरू हुआ सफर, अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं

हेमबती के जीवन में जूडो की शुरुआत उस समय हुई, जब वह बेहद कठिन दौर से गुजर रही थीं। महज 10 साल की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद उन्हें बालिका गृह में रहना पड़ा। यहीं से जूडो की ट्रेनिंग शुरू हुई और धीरे-धीरे यही खेल उनके जीवन का लक्ष्य बन गया। सीमित संसाधनों के बीच हेमबती ने अभ्यास जारी रखा। प्रतियोगिताओं में मिली जीत ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्होंने जूडो को ही अपनी पहचान बनाने का जरिया बना लिया। सात साल के सफर में उन्होंने जिला और राज्य स्तर से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा साबित की।

2022 से 2026 तक छत्तीसगढ़ के लिए लगातार जीते पदक

हेमबती ने वर्ष 2022 से 2026 तक लगातार छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करते हुए जूडो में पदक हासिल किए हैं। 40 किलो वजन वर्ग में खेलने वाली हेमबती ने अपनी तकनीक और आत्मविश्वास से कई अहम मुकाबलों में बेहतर प्रदर्शन किया। अब उनके खाते में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई है। अंडर-18 वर्ल्ड स्कूल जूडो चयन ट्रायल में हेमबती ने स्वर्ण पदक जीता और वर्ल्ड स्कूल गेम्स के लिए अपना टिकट पक्का किया। दिसंबर में वह ब्राजील जाएंगी। यह उनका पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होगा।

चयन ट्रायल में कोच नहीं दे सके निर्देश, फिर भी जीता गोल्ड

भोपाल के भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में हुए चयन ट्रायल के दौरान हेमबती के जूडो कोच घनश्याम ठाकुर भी मौजूद थे। हालांकि ट्रायल के नियमों के कारण मुकाबले के दौरान वह हेमबती को सीधे निर्देश नहीं दे सके। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ की ओर से साई सेंटर के कोच शैलेंद्र यादव ने उनकी कमान संभाली। हेमबती ने मुकाबले के दौरान खुद पर भरोसा बनाए रखा और शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। बड़े मुकाबले और चयन का दबाव भी उनके खेल पर हावी नहीं हुआ।

हार से सीखकर बदली रणनीति, अगली बार किया बेहतर प्रदर्शन

हेमबती की खासियत यह है कि वह हार के बाद निराश होने के बजाय अपनी कमियों पर काम करती हैं। घरेलू स्तर पर पिछले मुकाबले में मिली हार के बाद उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया। अगले मुकाबले में नई रणनीति के साथ उतरीं और बेहतर प्रदर्शन करते हुए जीत हासिल की।

जूडो में सिर्फ शारीरिक ताकत से मुकाबला नहीं जीता जा सकता। सामने वाले खिलाड़ी की चाल को समझना, सही समय पर तकनीक का इस्तेमाल करना और दबाव में शांत रहना उतना ही जरूरी है। हेमबती ने अपने खेल में इन सभी पहलुओं को मजबूत किया है।

बड़े मुकाबलों में भी शांत रहती हैं हेमबती

छत्तीसगढ़ के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी, प्रशिक्षक और जूडो एसोसिएशन के सचिव अरुण द्विवेदी के मुताबिक, 40 किलो वजन वर्ग में खेलने वाली हेमबती बड़े मुकाबलों में भी बेहद सहज और शांत रहती हैं। चयन जैसे महत्वपूर्ण मुकाबलों का दबाव भी उनके खेल में आसानी से नजर नहीं आता।

उनके मुताबिक, हेमबती का आत्मविश्वास उनकी बड़ी ताकत है। मुकाबले के दौरान वह जल्दबाजी के बजाय स्थिति को समझकर अपनी तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। जूडो में मानसिक मजबूती और धैर्य की अहम भूमिका होती है और हेमबती ने कम उम्र में ही इसे अपने खेल का हिस्सा बना लिया है।

प्री-क्वार्टर से सेमीफाइनल तक जीते मुकाबले

वर्ल्ड स्कूल प्रतियोगिता के चयन से पहले हेमबती ने अपने प्रदर्शन से लगातार प्रभावित किया। उन्होंने प्री-क्वार्टर फाइनल से लेकर सेमीफाइनल तक कई मुकाबले जीतकर अपनी जगह मजबूत की। तकनीक, धैर्य और मानसिक मजबूती के साथ उन्होंने एक के बाद एक मुकाबलों में बेहतर प्रदर्शन किया।

अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ब्राजील की अंतरराष्ट्रीय मैट है। घरेलू और राष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित करने के बाद हेमबती पहली बार अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में उतरेंगी।

गांव की गलियों से दुनिया की मैट तक

बड़ेकनेरा जैसे नक्सल प्रभावित इलाके से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंचना हेमबती के लिए सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि उनके संघर्ष की भी कहानी है। 10 साल की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद जीवन में आई मुश्किलों के बीच उन्होंने जूडो को अपनी ताकत बनाया।

सात साल पहले बालिका गृह से शुरू हुआ उनका जूडो सफर अब ब्राजील तक पहुंच चुका है। हेमबती की नजर अब अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में बेहतर प्रदर्शन पर है। उनका कहना है कि वह खेल में अभी बहुत आगे जाना चाहती हैं और देश के लिए नाम रोशन करना चाहती हैं। अब बड़ेकनेरा की यह बेटी ब्राजील की मैट पर भारत की जर्सी में उतरेगी। उसके सामने सिर्फ मुकाबला जीतने की चुनौती नहीं, बल्कि सात साल की मेहनत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर साबित करने का मौका भी होगा।

Updated on:
04 Oct 2026 12:38 pm
Published on:
04 Oct 2026 12:02 pm