
रायपुर . पिछले कुछ दिनों से शहर में बारिश थमी हुई है। इससे मच्छरों का प्रजनन भी तेजी से हो रहा है। मच्छरों को बढऩे से शहरवासियों की रातों की नींद और दिन का चैन छिन गया है। वार्डों में जहां-जहां पानी भरा हुआ है, वहां मच्छरों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है।
वहीं, सभी 70 वार्डों की नालियों, तालाबों सहित अन्य जल स्रोतों में भी एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव नहीं होने से इन दिनों मच्छरांे का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। मच्छरों से खास लोगों से लेकर आम नागरिक तक परेशान है। निगम प्रशासन मच्छर मुक्त शहर के लिए कितना गंभीर है,वह इस बात से पता चलता है कि मच्छर उन्मूलन के लिए अपने बजट में एक करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, लेकिन सालभर में 10 प्रतिशत राशि तक खर्च नहीं करता है। जानकारी के अनुसार निगम के सभी जोनों को मिलाकर सालभर में सिर्फ 8 से 10 लाख रुपए ही खर्च किया जाता है।
मॉडल वार्ड की बात सिर्फ हवा-हवाई : शहर को मुच्छर मुक्त बनाने के लिए पिछले दिनों में एमआइसी सदस्य श्रीकुमार मेनन ने निगम प्रशासन से नियमित रूप से रोस्टर अनुसार एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव और फाङ्क्षगग कराने पर जोर दिया था। निगम प्रशासन ने किसी एक वार्ड को मॉडल वार्ड के रूप में चिन्हित कर मच्छर मुक्त वार्ड बनाने की बात कही थी, लेकिन आज तक किसी भी वार्ड को मच्छर मुक्त वार्ड बनाने की पहल नहीं की गई है।
निगम के जोनों के अधिकारियों के अनुसार हर माह जोन कार्यालय द्वारा मच्छरों के न पनपने के लिए 25 से 30 किलोग्राम एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव किया जाता है। एक किलो का पैकेट 15 सौ रुपए के आसपास आता है। इस तरह महीने में 45000 रुपए के करीब एंटी लार्वा दवा पर ही छिडक़ाव किया जाता है। इसके अलावा मच्छर मारने के लिए फाङ्क्षगग भी की जाती है, लेकिन इसमें 10 से 15 हजार रुपए महीने का खर्चा आता है। लेकिन ये सब कागजों में होता है। कहीं भी निगम के कर्मचारियों के द्वारा न तो एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव किया जाता है और न ही फाङ्क्षगग करते नजर आते है।
निगम ने एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव और फाङ्क्षगग करने के लिए बकायदा सभी जोनों में रोस्टर सूची तैयार की गई है। इसके अनुसार जोन के वार्डों में निर्धारित दिनों में एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव और फाङ्क्षगग की जानी है। लेकिन कई वार्डों में मोहल्ले में तो आज तक न तो फाङ्क्षगग की गई और न ही एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव किया गया।
जिला मलेरिया नोडल अधिकारी डॉ. विमल किशोर राय ने बताया, कि जून माह को मलेरिया रोधी वहीं जुलाई को डेंगू रोधी माह के रूप में मनाया जाता है, इस दौरान जिले के दर्जनों जगहों पर स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन कर मरीजों की जांच की जाती है। वहीं इसी वर्ष से डेंगू के मरीजों की जांच के लिए रैपिड डायग्नोस्टिक किट भी शुरू की गई है, जो कि पहले केवल मलेरिया के मरीजों के लिए ही दी जाती थी।
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8-10 लाख रुपए ही खर्च किया जाता है हर साल सभी जोनों को मिलाकर
बारिश शुरू होते ही राजधानी में मच्छरों का आतंक बढ़ गया है, जगह-जगह पर जलभराव की वजह से लोगों को संबंधित बीमारियां देखने को मिल रही हैं। बीते दिनों शहर के कई क्षेत्रों में दूषित पानी और गंदगी की वजह से पीलिया के बाद शहर में डेंगू और मलेरिया का प्रकोप बढऩे लगा है।
वहीं जिम्मेदार मलेरिया विभाग बारिश के बाद रोकथाम की शुरूआत करने की बात कर रहा है। जिला मलेरिया अधिकारी का कहना है, कि बारिश के बाद रोकथाम की शुरूआत की जाती है, वह भी निगम की जिम्मेदारी है। इसके लिए पिछले दिनों मत्स्य विभाग के साथ बैठक आयोजित कर गंबूजिया मछली से लार्वा को नष्ट करने पर विचार किया गया, जिस पर सहमति बन गई है। साथ ही निगम या किसी समिति के माध्यम से इसके प्रबंधन पर विचार किया जा रहा है। वहीं मलेरिया विभाग की ओर से प्रचार-प्रसार का कार्य जारी है, जिसमें घर-घर जाकर कूलर और टंकियों की सफाई के साथ रोकथाम के उपाय बताए जा रहे हैं।
नगर निगम आयुक्त रजत बंसल ने कहा कि बारिश थमते ही जहां-जहां पानी भरा हुआ है, वहां- वहां अभियान चलाकर एंटी लार्वा दवा का छिडक़ाव कराने के निर्देश अधिकारियों को दिए गए है। फाङ्क्षगग भी नियमित रूप से कराने को कहा गया है। यदि इस काम में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों द्वारा लापरवाही बरती जा रही है, तो संबंधितों से जवाब तलब किया जाएगा।