जशपुर दशहरा महोत्सव: डोम राजवंश के वंशज होते है उत्सव में शामिल, बजाते हैं ढाक-नगाड़ा
जशपुरनगर. जशपुर दशहरा महोत्सव के हर कर्मकांड में पुरोहितों का जितना महत्व रहता है, उतना ही महत्व क्षेत्र के आदिवासी बैगाओं, मिरधाओं और पारंपरिक नगाड़ा बजाने वाले लोगों का भी होता है। उनके बिना जशपुर दशहरा महोत्सव अधूरा है। इस संबंध में जानकारी के अनुसार जिले में नारायणपुर चिटकवाइन क्षेत्र डोम राजा का मुख्यालय हुआ करता था। आज भी डोम राजाओं के वंशज यहां दशहरा महोत्सव में नगाड़ा बजाते हैं। वर्तमान में 27 वीं पीढ़ी इस परंपरा को निभाती आ रही है। महोत्सव में नगाड़ा व अन्य वाद्य यंत्र बजाने से पहले वादक 27 पीढ़ी पुराने नगाड़ा की पारंपरिक रीति से पूजा करते हैं। इस पुराने नगाड़ा को शाश्वती राजधानी कहा जाता है।
इस गांव के पारंपरिक नगाड़ा वादक 70 वर्षीय एतवा राम बताते हैं कि इस नगाड़ा को रियासतकाल में राजा ने डोम राजा से युद्ध के बाद छीनकर हमारे पुरखों को दिया था। यह नगाड़ा हमारे लिए एक विरासत है। इसकी पूजा करने के बाद ही हम नगाड़ा बजाते हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में कई प्रकार के इलेक्ट्रानिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग पूजा-पाठ के दौरान होता हो, लेकिन यहां के दशहरा में नारायणपुर क्षेत्र के परंपरागत वादक ही पीढ़ी दर पीढ़ी नगाड़ा और शहनाई बजाते आ रहे हैं। वादक रामदयाल एवं भुवनेश्वर ने बताया कि आरती, हवन और दूसरी अन्य पूजा के दौरान नगाड़ों की थाप और धुन भी अलग-अलग होती है।
27 पीढ़ी पुराना नगाड़ा आज भी है सुरक्षित
एतवा राम ने बताया कि उनके पास जो नगाड़ा रखा हुआ है वह 27 पीढ़ी पुराना है और दशहरा उत्सव में उनके द्वारा इसे लेकर जशपुर पंहुचते हैं।दशहरा उत्सव प्रारंभ होने के साथ ही उनके द्वारा इस नगाड़े की पूजा अर्चना करने के बाद उस बाजा को प्रतीकात्मक रूप से बजाने के बाद देवी पूजा के दौरान और दशहरा उत्सव तक उनके ही वंशजों के लोग उत्सव में बाजा बजाने की परंपरा निभाते हैं। खासबात यह है कि वे इसका कोई शुल्क नहीं लेते। उनका कहना है कि इस पूजा में उनकी भूमिका अहम होती है और विशेष सूर से वाद्ययंत्र को बजाया जाता है। पूर्वजों के अनुसार वे इसे अपना कत्र्वय मान कर निभाते चले आ रहे हैं।
कौन थे डोम राजा
इतिहासविद् डॉ. विजय रक्षित के मुताबिक 18 वी सदी के मध्य में डोम राजवंश के अंतिम शासक रायभान थे। डोम राजा रायभान के राज में अराजकता से उनकी प्रजा में असंतोष की भावना पनप रही थी। इसी वक्त जशपुर की धरती पर बिहार के सोनपुर रियासत के राजा सुजान राय ने कदम रखा। राजा सुजान राय ने ही जशपुर रियासत की
नींव रखी थी।
देवी पूजा और दशहरा महोत्सव में इस वंशज के लोग स्वत: से ही यहां पंहुच जाते हैं और 10 दिनों तक रह कर पीढिय़ों से अपनी पंरपरा निभा रहे हैं। यह आज के दौर में बहुत बड़ी बात है।
पं. गौरीशंकर मिश्रा, पुजारी बालाजी मंदिर