चुनाव के ठीक पहले चैंबर में भूचाल से कारोबारी जगत में हड़कंप मच गया है, वहीं पत्रिका के साथ विशेष चर्चा के दौरान चैंबर अध्यक्ष का दर्द साफतौर पर झलका।
अजय सिंह रघुवंशी/रायपुर. छत्तीसगढ़ की राजधानी के श्री बंजारी रोड स्थित छोटे से किराना दुकान के काउंटर से छग चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष पद तक का सफर तय करने वाले जैन जितेंद्र बरलोटा ने चैंबर की अंदरूनी राजनीति व महामंत्री और कोषाध्यक्ष के व्यवहार से नाराज होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह इस्तीफा तब हुआ जब प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज है। चुनाव के ठीक पहले चैंबर में भूचाल से कारोबारी जगत में हड़कंप मच गया है, वहीं पत्रिका के साथ विशेष चर्चा के दौरान चैंबर अध्यक्ष का दर्द साफतौर पर झलका। चैंबर संरक्षक रमेश मोदी ने जितेंद्र बरलोटा के इस्तीफे की पुष्टि कर दी है।
पत्रिका के सवाल पर उन्होंने कहा कि चैंबर ऑफ कॉमर्स प्रदेश में ही नहीं देश की बड़ी संस्था है। व्यापार उद्योग जगत में जिस विश्वास के साथ व्यापारी मतदाताओं ने जिस बहुमत से जिताया है, लेकिन यदि हम अपने वादों और उनकी उम्मीदों के मुताबिक सफल नहीं हो पा रहे हैं, तो कोई और रास्ता नहीं दिखता। व्यक्तिगत स्वार्थ के मद्देनजर यदि व्यापारी हित में काम नहीं कर पा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में मुझे इस्तीफा देना ज्यादा उचित लगा। जितेंद्र बरलोटा के इस बयान का इशारा चैंबर कोषाध्यक्ष प्रकाश अग्रवाल व महामंत्री लालचंद गुलवानी की ओर हैं।
चैंबर सूत्रों के मुताबिक चैंबर कोषाध्यक्ष ने वित्त मंत्री पीयूष गोयल के कार्यक्रम से लेकर चैंबर वेबसाइट सहित कई अन्य कार्यक्रमों का चेक रोक दिया है। चैंबर में किसी भी कार्य के भुगतान के लिए अध्यक्ष, महामंत्री और कोषाध्यक्ष में से किसी दो पदाधिकारी का साइन जरूरी है। हाल ही में चैंबर वेबसाइट मामले में कोषाध्यक्ष ने भ्रष्टाचार की आशंका के मद्देनजर भुगतान के चेक पर साइन करने से मना कर दिया था।
इस मामले में चैंबर अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा ने नाराजगी जाहिर कर दी है कि चैंबर में व्यापारी हित में काम करने में दिक्कत आ रही है, बात-बात पर झगड़े, वाद-विवाद की स्थिति निर्मित हो रही है, इसलिए उन्होंने पद से त्यागपत्र चैंबर संरक्षक रमेश मोदी को सौंप दिया है। पूरे मामले में चैंबर कोषाध्यक्ष प्रकाश अग्रवाल ने कहा है कि उन्हें अध्यक्ष के इस्तीफे की जानकारी नहीं है। रही बात किसी भी चेक में हस्ताक्षकर नहीं करने की तो ऐसा नहीं है जिस चेक में राशि से संबंध में संदेह रहता है,उसमें मैं पूछताछ करता हूं।
12 दिन पहले ही सौंप दिया था इस्तीफा
जानकारी के मुताबिक जैन समाज के पर्यूषण पर्व के पहले ही बरलोटा ने इस्तीफा रमेश मोदी को सौंप दिया था, लेकिन पर्व की वजह से इसका खुलासा नहीं किया गया। यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब 12 दिन पहले ही इस्तीफा रमेश मोदी को सौंप दिया था तो बड़े पदाधिकारियों ने समझौता का प्रयास क्यों नहीं किया।
सुंदरानी के सबसे ज्यादा करीबी रहे
जितेंद्र बरलोटा का विधायक व चैंबर संरक्षक श्रीचंद सुंदरानी से सबसे ज्यादा करीबी संबंध है। सुंदरानी के चैंबर अध्यक्ष रहते हुए बरलोटा महामंत्री रहे। फूड सेफ्टी एक्ट से लेकर व्यापारियों के विभिन्न मुद्दों पर बरलोटा ने सुंदरानी के लिए सारथी की भूमिका निभाई। कहा जाता है कि सुंदरानी को चैंबर अध्यक्ष की वजह से विधायक का टिकट मिला, लेकिन सुंदरानी को बनाने में बरलोटा की मेहनत रही।
इसी मित्रता को निभानेे और विधायक टिकट बचाने के लिए सुंदरानी ने अमर परवानी की टिकट काटी और बरलोटा को चैंबर का टिकट दिया, लेकिन बाद में श्रीचंद सुंदरानी और बरलोटा के बीच कई मामलों में खटास देखने को मिली। यह कारण है कि सुंदरानी के रहते जितेंद्र बरलोटा का इस्तीफा किसी के गले नहीं उतर रहा है। कोषाध्यक्ष और महामंत्री के चलते बरलोटा के इस्तीफे ने चैंबर के नेतृत्व पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
800 से अधिक मनोनित पद भी समाप्त होगा
चैंबर अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा द्वारा अध्यक्ष पद का इस्तीफा स्वीकार होने के बाद 800 से अधिक मनोनित पद भी समाप्त हो जाएगा। इससे पहले बरलोटा ने चैंबर की सहमति से कार्यकारी अध्यक्ष, संयुक्त अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री पद में नियुक्तियां की थी। इनमें सबसे ज्यादा श्रीचंद सुंदरानी के करीबी शामिल हैं। आरोप यह भी लगे कि सुंदरानी ने दबाव में कई नियुक्तियां करवाई थीं।
तीन महीने के भीतर चुनाव कराने का नियम
चैंबर संविधान के मुताबिक अध्यक्ष के इस्तीफे के बाद तीन महीने के भीतर चुनाव कराने का नियम है, वहीं तब तक निर्वाचित उपाध्यक्ष व मंत्री में से किसी एक को अध्यक्ष का प्रभार सौंपा जा सकता है। चैंबर सूत्रों का कहना है कि जितेंद्र बरलोटा का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया जाएगा, इधर जितेंद्र बरलोटा ने कहा कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, अब वे शर्तों के साथ ही काम कर पाएंगे।
कार्यकारिणी करेगी निर्णय
अध्यक्ष पद का इस्तीफा स्वीकार करने या नहीं करने का अधिकार कार्यकारिणी समिति को है, जिसमें निर्वाचित उपाध्यक्ष-मंत्री, जिला इकाइयों के पदाधिकारी आदि शामिल हैं।