
ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में डॉ. जॉन-टायलर बिनफेट और डॉ. सैली स्टीवर्ट ने हाल ही में एक अध्ययन प्रकाशित किया, जो यह पता लगाता है कि स्नातक पाठ्यक्रम में दयालुता विषय को शामिल करने से छात्र-छात्राओं और शिक्षक पर क्या प्रभाव पड़ता है। डॉ. बिनफेट ने बताया कि हालांकि, पहले ऐसे कई अध्ययन हुए हैं, जिन्होंने दयालुता के प्रभावों का आकलन किया है, लेकिन इस बात पर सीमित शोध किया गया है कि विश्वविद्यालय के विभिन्न आयु वर्ग के छात्र दयालुता को कैसे समझते हैं और कैसे लागू करते हैं।
डॉ. बिनफेट ने कहा कि हम जानते हैं कि दयालु होने से कई तरह के स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं, जैसे तनाव में कमी, खुशी और साथियों की स्वीकृति। माना जा रहा है कि इससे आपका जीवनकाल बढ़ सकता है। इतना ही नहीं यह हमारे दिमाग के सीखने पर भी प्रभाव डालता है। यह शोध उच्च शिक्षा के जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
इस तरह किया गया अध्ययन
अध्ययन के लिए, स्वयंसेवी छात्रों ने यह निर्धारित करने के लिए स्वयं-रिपोर्ट पेश की कि वे खुद को ऑनलाइन और आमने-सामने की बातचीत में किस हद तक देखते हैं, और वे अपने साथियों और परिसर से कैसे जुड़े हुए हैं। फिर छात्रों को एक सप्ताह के लिए पांच तरह के कार्यों की योजना बनाने और उन्हें पूरा करने के लिए कहा गया।
इस दौरान प्रतिभागियों ने दूसरों की मदद करने, प्रशंसा करने और संवाद करने के मुख्य विषयों के साथ 353 तरह के कार्य पूरे किए। दयालुता के पांच नियोजित कामों में से कम से कम तीन को पूरा करने वाले छात्रों ने व्यक्तिगत रूप से दयालुता के उच्च स्कोर हासिल किए।
उच्च शिक्षा में अविश्वसनीय प्रभाव
डॉ. स्टीवर्ट ने बताया कि यह शोध छात्रों को यह महसूस करने में मदद कर सकता है कि लोग कैसे और क्यों दयालु हैं और यह दयालुता स्वास्थ्य और भलाई को प्रभावित करती है, इसके पीछे सबूत हैं। उच्च शिक्षा में भी इसका अविश्वसनीय प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह इस बात की अंतर्दृष्टि प्रदान करता है कि छात्र अपने अभ्यास और दयालुता की समझ के साथ शैक्षिक प्रथाओं और पाठ्यक्रम सामग्री क्षेत्रों में इस विषय को शामिल करने के लिए आधारभूत कार्य तैयार करने के लिए कहां हैं।
चिंता कम करें
ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, जो लोग इस तरह के कार्यों में संलग्न होते हैं वे उन कारकों में महत्वपूर्ण कमी का अनुभव करते हैं, जो चिंता का कारण बनते हैं।
चार हफ्तों में, शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों का अध्ययन किया जो दयालुता के यादृच्छिक और मंचित कार्यों में लगे हुए थे। उन्होंने पाया कि जो प्रतिभागी सकारात्मक कार्यों में लगे थे, उन्हें वास्तव में सकारात्मक प्रभावों में काफी वृद्धि का अनुभव हुआ, जिसने उन्हें खुशी और आत्म-संतुष्टि की अधिक से अधिक भावनाओं को प्रेरित किया। जब हम अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं, तो अपनी चिंताओं को दूर करना आसान होता है और अपनी त्वचा में आसानी महसूस करते हैं।
'यह हमें मुफ्त में मिलता है'
कोलंबिया विश्वविद्यालय की डॉक्टर केली हार्डिंग ने अपनी नई किताब 'द रैबिट इफ़ेक्टÓ में इस विषय पर काफी विस्तार से लिखा है। उन्होंने बताया कि दयालु होना प्रतिरक्षा प्रणाली, ब्लड प्रेशर में मदद करता है। यह लोगों को लंबे समय तक जीवित रहने और स्वस्थ्य बने रहने में मदद करता है। इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि यह हमें मुफ्त में मिलता है।
अपनी किताब का नाम बताते हुए वह कहती हैं कि मैंने 1970 के दशक में खरगोशों पर इस तरह के अध्ययन के बारे में सुना था। उस अध्ययन में यह पता चला कि जिन खरगोशों को दयालु शोधकर्ताओं की देखभाल में रखा गया उनकी सेहत काफी बेहतर थी।
कोरोनाकाल में बढ़ा प्रभाव
कोरोनाकाल में हर कोई जहां बीमारी के डर, खौफ के बीच जी रहा है। बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं के बीच कोरोना का भय, अन्य बीमारियों व आर्थिक संकट के मामलों को देखते हुए उनकी काउंसिलिंग शुरू कर की गई। डॉ. बिनफेट ने गौर किया कि सितंबर में कनाडाभर में विश्वविद्यालय के हजारों छात्र लौट आए और उनके दयालुता संबंधी कार्यों में काफी वृद्धि देखी गई।