
ताबीर हुसैन/ रायपुर.इनका बचपन वैसा नहीं बीता जैसे बड़े घर के बच्चों का बीतता है। मासूम खिलौनों को देखती लेकिन चाहकर भी टॉयज की खुशी नहीं मिली। वक्त का पहिया अपनी चाल में चलने लगा। भोला बचपन अब टीनेज में कदम रख चुका था। शुरुआती तौर पर ही जिंदगी ने ऐसे अनुभव दिए कि ठान लिया था कि लाइफ में सिर्फ और सिर्फ सक्सेस ही हासिल करनी है, इसके अलावा कोई ऑप्शन नहीं। मॉम का स्ट्रगल और पापा की बेरुखी ने बच्ची को मजबूत बना दिया था। जीहां हम बात कर रहे हैं मशहूर एंकर, डीजे, मॉडल और सिंगर खुशबू कपूर की। वे 4 अगस्त को राजधानी स्थित होटल सरोवर पोर्टिको बतौर डीजे आईं। उन्होंने पत्रिका से अपनी जिंदगी से जुड़ी हर बात खुलकर शेयर की।
वैल्यु टैलेंट की, स्पेस की नहीं
लोग सोचते हैं कि आप छोटे शहर के हों तो आगे बढ़ नहीं पाते। लेकिन एेसा कुछ नहीं है। कामयाबी के लिए छोटे या बड़े शहर से बिलांग करना मायने नहीं रखता। वैल्यू आपके टैलेंट की होती है। स्पेस नहीं, बल्कि आपकी क्वालिटी और काबिलियत आपको ऊंचाई तक लेकर जाती है। जब आप दिल से ऑनेस्ट होते हैं, ईमानदारी के साथ अपना वर्क करते हो तो यह आपके काम में रिफलेक्ट होता है। मेरे जितने भी फैंस हैं वे मुझे प्यार करते हैं। एक तरह से वे लायल फॉलोवर्स हैं।
50 रुपए पेट्रोल में ही खर्च हो जाते थे
एक टीवी चैनल में वाइस ओवर का काम मिला था। इसके लिए 100 रुपए मिलते थे। 50 रुपए तो वहां तक जाने के लिए पेट्रोल में ही खर्च हो जाया करते थे। लेकिन मैं वहां इसलिए जाती थी कि मुझे कुछ बनना था। अगर बात पहली कमाई की करूं तो पोस्टर मेकिंग कॉम्पिटीशन में फस्र्ट प्राइज जीतकर 100 रुपए जिसे कभी खर्च नहीं किया। एक टेलीविजन एड के लिए मुझे ढाई सौ रुपए मिलने थे लेकिन प्रोड्युसर ने दिए ही नहीं।
बेटी के भविष्य के लिए मां ने छोड़ा पति का साथ
मैंने मम्मी (आशा कपूर) का स्ट्रगल देखकर काफी कुछ सीखा है। पापा का बिहेयिवर मॉम के प्रति अच्छा नहीं था। वे रोजाना ड्रिंक कर मम्मी से मारपीट किया करते थे। मम्मी को मेरी भविष्य की चिंता थी। उन्होंने तय किया कि इसके लिए वे पापा से अलग रहेंगी। मेरे नाना बृजलाल भुटानी हमें जयपुर ले आए। खुशबू ने बताया कि जब वे 4 साल की थी। एक बार घर में कुछ था नहीं खाने को। पापा उस वक्त पैसे भी नहीं दे रहे थे खर्च के लिए। मम्मी ने मेरी छोटी सी साइकिल 10 रुपए में बेच दी। तब हमारे घर खाने के लिए कुछ आया। मेरे मम्मी की शादी बहुत रीच फैमिली में हुई थी, लेकिन मैंने वैसा बचपन नहीं जीया जैसा दूसरे बच्चे जीते हैं।
लोग करते थे पीछा, लेकिन हिम्मत नहीं हारी
सात साल पहले एक रेडियो चैनल में बतौर आरजे काम कर रही थी। प्रोग्राम 6 बजे शुरू होता था। इसके लिए मुझे सुबह 4.30 बजे उठना पड़ता था और 5 बजे स्कूटी से निकलना होता था। उस वक्त अंधेरा होता था। कई बार ऐसा भी हुआ कि कुछ शरारती किस्म के लोग मुझे फॉलो करते थे। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और संघर्ष जारी रखा।