
ताबीर हुसैन @ रायपुर . जब आप किसी अस्पताल में जाते हैं तो ज्यादातर लोगों के चेहरों में टेंशन साफ झलकती है, वजह भी क्लियर है कि वे या तो मरीज होते हैं या उनके परिजन। एेसे में कुछ फेस एेसे भी होते हैं जो हल्की मुस्कान
के साथ सलीके से पेशेंट से बात कर रहे होते हैं। अपने शब्दों से उनके जीवन में उम्मीद की किरण फैला रहे होते हैं। विनम्रता के साथ उन्हें दवा खाने और इलाज में सहयोग करने की समझाइश देते हैं। वे कोई और नहीं अस्पताल की नर्सेंस होती हैं। पेशेंट और नर्स का रिश्ता सबसे जुदा होता है। 12 मई को इंटरनेशनल नर्स डे पर शहर की कुछ नर्सेस से हमने उनके अनुभव को जाना। इनसे बात करने के दौरान यह बात सामने आई कि फैमिली जरूरी, लेकिन मरीजों की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं।
मिलती है खुशी
अमृत वर्मा कहती हैं कि जब कोई मरीज हमसे कहता है कि यहां आने से आराम महसूस हुआ तो हमें बहुत खुशी मिलती है। सही मायने में मरीजों के चेहरे में मुस्कान आना हमारी सेवा का प्रसाद है।
छुट्टी से लौटना पड़ा
एनएचएमएमआइ हॉस्पिटल की नर्स बद्रिका चौहान एग्जाम के लिए 15 दिनों की छुट्टी पर गई थी। इस बीच बच्चों के हार्ट ऑपरेशन के ज्यादा केसेस आ गए। उस ऑपरेशन में एक विशेष ट्रिक की जरूरत पड़ती है जिसे सिर्फ बद्रिका ही कर सकती थी। जब उसे पता चला तो वह खुद ही लौट आई और सभी ऑपरेशन सक्सेसफुल हो गए। बद्रिका रायगढ़ के एक गांव से आई है। यहां जॉब करते हुए उसने अपनी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी की।