रायपुर

सांसद बोले, इस रणनीति ने 60 साल के नासूर से राज्य को मुक्ति दिलाई

छह दशक तक भारत की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास यात्रा को चुनौती देता रहा नक्सलवाद अब अपने निर्णायक अवसान की अवस्था में पहुंच चुका है। इस ऐतिहासिक क्षण पर वे उन सभी वीर जवानों को नमन करते हैं जिन्होंने अपने सर्वोच्च बलिदान से इस संघर्ष को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाया। यह कहना है […]

2 min read
Apr 03, 2026
सांसद बोले, इस रणनीति ने 60 साल के नासूर से राज्य को मुक्ति दिलाई

छह दशक तक भारत की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास यात्रा को चुनौती देता रहा नक्सलवाद अब अपने निर्णायक अवसान की अवस्था में पहुंच चुका है। इस ऐतिहासिक क्षण पर वे उन सभी वीर जवानों को नमन करते हैं जिन्होंने अपने सर्वोच्च बलिदान से इस संघर्ष को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाया। यह कहना है रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल का।

ढुलमुल नीति से 180 जिलों में फैला

बृजमोहन अग्रवाल कहते हैं कि एक समय छत्तीसगढ़ के खनिज सम्पन्न क्षेत्रों की खदानें, विद्युत परियोजनाएं, तेंदूपत्ता व्यापार, सभी नक्सलियों के लिए उगाही के स्रोत बन गए। दुर्भाग्य से, कांग्रेस-नीत सरकारों के लंबे शासनकाल में नक्सलवाद के प्रति स्पष्ट और कठोर नीति का अभाव रहा। इस ढुलमुल नीति का परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद देश के 12 राज्यों के लगभग 180 जिलों में फैल गया और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद से ही प्रदेश के समग्र विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन गया। 1990 के दशक में सुंदरलाल पटवा के नेतृत्व में रायपुर के पुराने कमिश्नर कार्यालय के बीटीआई कम्युनिटी परिसर में आयोजित बैठक में पहली बार यह निर्णय लिया गया कि नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष को राष्ट्रीयता के व्यापक संदर्भ में लड़ा जाएगा।

पहली बार नक्सलवाद के विरुद्ध समन्वित अभियान

वर्ष 2003 से 2006 के बीच, जब उन्हें मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह की सरकार में छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री के रूप में कार्य करने का उत्तरदायित्व मिला, तब प्रदेश में पहली बार नक्सलवाद के विरुद्ध एक ठोस, नीतिगत और समन्वित अभियान प्रारंभ किया गया। वास्तविक परिवर्तन तब आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में नक्सलवाद के विरुद्ध स्पष्ट, कठोर और समन्वित नीति अपनाई गई।

एक नए युग का द्वार खोल रहा

नक्सलवाद का समापन छत्तीसगढ़ के लिए एक नए युग का द्वार खोल रहा है। अब चुनौती इस सफलता को स्थायी बनाने की है। ऐसी सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक संरचना खड़ी करने की, जहाँ किसी भी प्रकार की हिंसक विचारधारा को पनपने का अवसर ही न मिले। नक्सलवाद पर यह विजय केवल एक आंतरिक सुरक्षा अभियान की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। यह उस निर्णायक परिवर्तन का संकेत है, जहाँ भय की राजनीति को विश्वास की शक्ति ने प्रतिस्थापित किया है और जहाँ बंदूक के साये में जी रहे समाज ने विकास और सहभागिता के मार्ग को अपनाया है। जो लोग बंदूक और गोलियों के दम पर भय के माध्यम से छत्तीसगढ़ में छद्म राज्य की कल्पना करते थे उनका अंत हुआ और लोकतंत्र की विजय हुई। बुलेट पर बैलेट की जीत हुई।

Published on:
03 Apr 2026 06:20 pm
Also Read
View All

अगली खबर