Smart Metar: प्रदेश के अन्य हिस्सों में काम की धीमी रफ्तार पूरे प्रोजेक्ट की सफलता पर असर डाल रही है। दुर्ग क्षेत्र में भी उपभोक्ता मीटरिंग का काम करीब 52 प्रतिशत पर सीमित है, जो विभागीय दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है।
Smart Metar: प्रदेश में स्मार्ट मीटरिंग योजना बेहद सुस्त चल रही है। रीजन वाइज डेली प्रोग्रेस शीट ने बिजली विभाग और ठेका कंपनियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करोड़ों रुपए की इस महत्वाकांक्षी योजना में अब तक अपेक्षित गति नहीं दिखाई दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार कई क्षेत्रों में उपभोक्ता मीटर लगाने और डीटी मीटरिंग का काम लक्ष्य के मुकाबले काफी पीछे चल रहा है, जिससे योजना की समय-सीमा प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
जानकारी के मुताबिक उपभोक्ता मीटर इंस्टॉलेशन में पूरे प्रदेश का औसत कार्य केवल करीब 59 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है। सबसे खराब स्थिति आरके-1 क्षेत्र की बताई जा रही है, जहां अंबिकापुर और बिलासपुर रीजन में कार्य की प्रगति बेहद धीमी है। अंबिकापुर रीजन में उपभोक्ता मीटरिंग का कार्य मात्र 56 प्रतिशत तक पहुंच पाया है, जबकि बिलासपुर रीजन में यह आंकड़ा 46 प्रतिशत पर अटका है। इतने बड़े अंतर ने योजना की मॉनिटरिंग और जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि कुछ क्षेत्रों में प्रगति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति संतोषजनक नहीं मानी जा रही। रायपुर सिटी और रायपुर रूरल क्षेत्रों में कार्य 90 प्रतिशत से ऊपर पहुंचा है, लेकिन प्रदेश के अन्य हिस्सों में काम की धीमी रफ्तार पूरे प्रोजेक्ट की सफलता पर असर डाल रही है। दुर्ग क्षेत्र में भी उपभोक्ता मीटरिंग का काम करीब 52 प्रतिशत पर सीमित है, जो विभागीय दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है।
डीटी मीटरिंग के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। पूरे प्रदेश में इसका औसत कार्य लगभग 80 प्रतिशत बताया गया है, लेकिन कई क्षेत्रों में अब भी बड़ी संख्या में डीटी मीटर लगाए जाने बाकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी गति से काम चलता रहा तो योजना तय समय पर पूरी होना मुश्किल हो सकता है।
बताया जाता है कि कई इलाकों में मीटर लगाने वाली एजेंसियों की टीम समय पर नहीं पहुंच रही है। कहीं तकनीकी खामियां सामने आ रही हैं तो कहीं उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी तक नहीं दी जा रही। कई क्षेत्रों में बार-बार सर्वे और अधूरे कार्य से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।
बताया जाता है कि विभागीय अधिकारियों की मॉनिटरिंग, ठेका कंपनियों की कार्यक्षमता और जमीनी समन्वय की कमी ने इस महत्वाकांक्षी योजना की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।