छत्तीसगढ़ में इस बीमारी का खतरा बढ़ता जा रहा है (The threat of this disease is increasing in Chhattisgarh)। पिछले तीन साल में इस बीमारी के 300 से ज्यादा मरीज मिल चुके हैं और इनमें 80 के आसपास मरीजों की मौत हो चुकी है। डॉक्टरों के अनुसार स्क्रब टाइफस के लक्षण टायफाइड (scrub typhus are like typhoid) की तरह होता है।
छत्तीसगढ़ में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सुविधा नहीं होने के कारण स्क्रब टाइफस की जांच नहीं हो पा रही थी। अब पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में इसकी जांच हो रही है। आयुष्मान भारत योजना वालों को कोई शुल्क नहीं देना होगा। वहीं निजी लैब में इसकी जांच में ढाई से तीन हजार रुपए खर्च आता है।
मेडिकल कॉलेज में जब इस बीमारी पर स्टडी की गई तो डॉक्टर (गाइड) के लिए भी चौंकाने वाला था। दरअसल तब केवल डेढ़ साल में 31 मरीज मिले थे और 14 की मौत हो गई थी। तब थीसिस करने वाल पीजी छात्र को खुद के खर्च पर किट खरीदकर बीमारी की जांच करवानी पड़ी। इसमें गाइड ने भी आर्थिक मदद की थी। 2021-22 में मेडिसिन विभाग में पीजी के छात्र डॉ. शाहबाज खांडा ने इस बीमारी पर स्टडी की थी। 5 दिन से ज्यादा बुखार वाले मरीजों की जब जांच कराई गई तो तब डेढ़ साल में 31 मरीज मिल गए थे। ये मरीज बस्तर, सरगुजा, राजनांदगांव जैसे इलाकों से पहुंचे थे और गंभीर थे। डॉक्टरों के अनुसार यह बीमारी बीमारी फेफड़े, ब्रेन, लिवर व किडनी को संक्रमित करता है। इसलिए जब तक जांच नहीं होती, तब तक डॉक्टर इसे निमोनिया, पीलिया या मेंजानाइटिस समझकर इलाज करते हैं। ऐसे में कई मरीज इलाज के बाद भी ठीक नहीं होते। समय पर इलाज नहीं होने से मरीज का मल्टी ऑर्गन फेल हो जाता है। इससे मरीज की मौत भी हो सकती है।
स्क्रब टाइफस को बुश टाइफस भी कहा जाता है और ओरिएंटिया त्सुत्सुगामुशी नामक बैक्टीरिया से फैलता है। ये कीड़े की तरह होता है और खासकर पहाड़ी व जंगली इलाकों में पाया जाता है। खेतों में भी कहीं-कहीं ये कीड़े मिलते हैं। इसके मरीज पहाड़ी क्षेत्र या ग्रामीण इलाके के ज्यादा होते हैं। अमरीकन बुक में कहा गया है कि इस बीमारी के काटने से काले निशान पड़ते हैं। हालांकि रिसर्च करने वाले डॉक्टर का कहना है कि चूंकि भारतीयों की स्किन एकदम गोरी नहीं होती इसलिए काले निशान नहीं दिखते। स्टडी के दौरान केवल 10 फीसदी मरीजों में काले निशान दिखे।
स्टडी में ये बात सामने आई कि स्क्रब टायफस के मरीज पहाड़ी व जंगल वाले इलाकों के ज्यादा आए। दरअसल बीमारी फैलाने वाले कीड़े पहाड़ी व जंगली इलाकों में पाए जाते हैं। पांच दिन से ज्यादा बुखार वाले मरीजों की जांच करवाई गई। इसमें कुछ मरीज स्क्रब टायफस से पीड़ित मिले। समय पर इलाज मिलने मरीज ठीक भी हुए।
डॉ. योगेंद्र मल्होत्रा, प्रोफेसर व प्रभारी एचओडी मेडिसिन नेहरू मेडिकल कॉलेज
स्क्रब टाइफस के कुछ मरीजों का मल्टी ऑर्गन फेल हो जाता है। कुछ मरीज कोमा में भी चले जाते हैं। हर बुखार डेंगू या टायफाइड नहीं होता। अच्छा होगा कि लंबे समय तक बुखार ठीक न हो तो इसकी जरूरी जांच करवाएं। इससे बीमारी का सही पता चल सकेगा। इससे डॉक्टरों को मरीज के इलाज करने में भी आसानी होती है।
डॉ. युसूफ मेमन, डायरेक्टर संजीवनी कैंसर अस्पताल