पर्यावरण के लिए जरूरी कछुए (turtle smuggling) घर और दुकानों से आजाद नहीं हो पा रहे हैं। रायपुर में कई परिवार कछुओं को शुभ मानकर उन्हें पाल रहे हैं। ये कहना तो मुश्किल है कि कछुआ पालने से कितने लोग धनकुबेर बने लेकिन सच तो यह है
मोहित सेंगर@रायपुर। लोगों में फैले अंधविश्वास और धनकुबेर बनने की चाह ने एक नन्हे जीव को संकट में ला दिया है। लोगों के बीच यह बात फैल गई है कि कछुआ भाग्य में लिखे पैसों को खींचता है। जिसके कारण कछुओं की तस्करी बड़े पैमाने पर की जा रही है। पर्यावरण के लिए जरूरी कछुए घर और दुकानों से आजाद नहीं हो पा रहे हैं। रायपुर में कई परिवार कछुओं को शुभ मानकर उन्हें पाल रहे हैं। ये कहना तो मुश्किल है कि कछुआ पालने से कितने लोग धनकुबेर बने लेकिन सच तो यह है कि तस्कर जरूर कछुओं को बेचकर अच्छी खासी आमदनी कर रहे हैं।
इस तरह से कर रहे बिक्री
राजधानी के कुछ कारोबारी लंबे अर्से से इस कारोबार में लिप्त हैं। इसका पूरा नेटवर्क फैला हुआ है। राजधानी में मौजूद एक्वेरियम का काम करने वालों से तस्कर संपर्क करते हैं और उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से फोटो भेजकर ग्राहक तलाशते हैं। इसमें खास बात यह है कि यह ‘डील’ सिर्फ जान-पहचान वालों के साथ ही होती है। किसी अनजान व्यक्ति के आने पर उन्हें मना कर दिया जाता है। इसलिए वन विभाग के अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लग पाती। लोगों को प्रतिबंधित कछुओं की जानकारी नहीं है। इसी का फायदा उठाकर प्रतिबंधित कछुओं की खरीद-फरोख्त जोरों पर जारी है।
डीएफओ विश्वेश कुमार ने कहा कि प्रतिबंधित पशु-पक्षी बेचना अपराध है। इस तरह का कारोबार करने वाले लोगों पर पूर्व में भी कार्रवाई की गई है। आपने जो सूचना दी है, उसकी जांच करवाकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
दुकानों की लंबे अर्से से जांच नहीं
राजधानी में पशु, पक्षी और मछली बेचने वालों की जांच करना वन विभाग के जिम्मे है। इनकी जांच के आदेश होते हैं लेकिन जांच नहीं होती। वन विभाग के पास यह आंकड़ा भी नहीं है कि रायपुर जिले में इस प्रकार की कितनी दुकानें संचालित हो रही हैं। जबकि पशु-पक्षियों और एक्वेरियम से संबंधित दुकान खोलने के लिए पहले वन विभाग से पंजीयन कराना होता है। मौटे तौर पर रायपुर में शंकर नगर, कटोरा तालाब, फाफाडीह, पंडरी, आश्रम, फूल चौक, नया बस स्टैंड रोड, आमानाका, लाखेनगर चौक और खमतराई में पशु-पक्षी और मछली बेचने की दुकानें हैं।
इंडियन टेंट टर्टल की होती है बिक्री
बिकने वाले कछुए ज्यादातर इंडियन टेंट टर्टल प्रजाति के होते हैं। इनके खोल पर लाल रंग का मार्क होता है और ये ज्यादातर उत्तर भारत, पश्चिमी बांग्लादेश और नेपाल में पाए जाते हैं। इस प्रजाति के नर कछुए 3.5 इंच से 5 इंच तक जबकि मादा 5 से 9 इंच तक होती है। इनका प्राकृतिक आवास नदी के किनारे, तालाब और चट्टानों की बीच की जगह में होता है।
सोशल मीडिया में दे रहे ऑफर
इन कछुओं की मांग इतनी है लोग इसके तीन गुना दाम देने तक के लिए तैयार हैं। वॉट्सऐप, इंस्ट्राग्राम जैसे माध्यम से 400 रुपए में मिलने वाला कछुआ 1200 रुपए में घर तक पहुंचाया जा रहा है। पेट्स शॉप और मछली बेचने की आड़ में जिले के कुछ कारोबारी लंबे अर्से से इस कारोबार को अंजाम दे रहे हैं।