राजसमंद

अब कहां नए गुड़ से आवभगत और चरखीये की चूं-चूं

अब कहां नए गुड़ से आवभगत और चरखीये की चूं-चूं-घटते जल स्तर से सिमटती जा रही गन्ने की खेती -पीपली आचार्यान समेत बनास किनारे के गांवों का मामला
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ab kahan gud se aavbhagat
अब कहां नए गुड़ से आवभगत और चरखीये की चूं-चूं

प्रमोद भटनागर

पीपली आचार्यान. पुराने जमाने में होने वाली गन्ने की खेती एवं चलने वाले चरखीये को अब सहेजना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा हो गया है।
इस क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में लगभग दो से तीन दशक पूर्व तक हर गांव में गन्नों की बम्पर पैदावार होती थी। और खेतों पर ही चरखीये चलते थे, और मेले जैसा माहौल नजर आता था। वहीं, जिस किसान के चरखीया चलता वह पड़ोस के घरों में एवं मिलने वालों को चरखीये पर आने का निमंत्रण देता था। निमंत्रित व्यक्ति के पहुंचने पर ताजा रस एवं गुड़ परोसकर उसकी आवभगत की जाती थी। यही नहीं लौटते समय गन्ने एवं केटली में गन्ने का ताजा रस भाी उनके घर भिजवाया जाता था। उस दिन उन घरों में गन्ने के रस से मीठे चावल बनाए जाते थे। जब तक चरखिया चलता तब तक पूरा परिवार खेतों पर इसी कार्य में लगा रहता, जिससे खेतों में खासी रौनक रहा करती थी। एक तरफ बैलों को जोतकर चरखीये में गन्नों का रस निकालते थे, वहीं दूसरी तरफ निकले हुए रस को चूल पर बड़े कड़ाह रखकर गुड़ बनाया जाता था। इससे पूरा क्षेत्र गुड़ की खुशबू से महक उठता था। उस समय खेतों के पास रास्ते में आने-जाने वाले लोग भी चरखीया चलता देखकर वहां पहुंचते तो उनकी भी मनुहार की जाती थी।
पानी के साथ सिमट गई रौनक
घटते भूजल स्तर एवं आधूनिक दौर ने किसानों को गन्ने की खेती से कोसों दूर कर दिया है। अब ग्रामीण अंचल में कहीं-कहीं पर ही चरखीये चलते हैं। पहले हर किसान के पास बैलों की जोड़ी होती थी। आधूनिक दौर में किसानों के पास भी कृषि कार्य मशीनों से ही हो रहा है। अब गावों में कहीं- कहीं पर खेत के छोटे से हिस्से में गन्ने की खेती कर रहे किसानों ने रस निकालने के बजाय हाथ ठेलों में चरखीये लगाकर रस निकालने वालों को गन्ने बेचने की राह पकड़ ली है। इससे गन्ना उत्पादकों को भी ज्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़ती। कुछ गन्ना उत्पादक दीपावली पर्व पर गन्ने बेचकर भी रस निकालने की परेशानी से बच जाते हैं। इन वजहों से चरखियों का दौर लगभग लुप्त होता जा रहा है।
अब गन्ने की खेती घाटे का सौदा
गन्ने की खेती वर्ष में एक बार होती है। राज्य सरकार द्वारा इस फसल का उचित मूल्य नहीं देने एवं मंहगाई के इस युग में किसान गन्ने की खेती से पलायन कर रहे हैं। वहीं, शक्कर के ज्यादा प्रचलन से खान-पान में गुड़ का चलन लगभग थम ही गया है। पानी की कमी एवं वाजिब दाम नहीं मिलने से गन्ने की खेती घाटे का सौदा हो गया है।
उदयलाल अहीर, किसान पीपली अहिरान
ज्यादा पानी और कम मुनाफा
वर्ष में एक फसल होने एवं पानी की ज्यादा जरूरत के हिसाब से मुनाफा नहीं मिलने से किसानों का गन्ने की खेती से मोह भंग हो रहा है। इस खेती में फसल बोने से लेकर उसके पकने तक कार्य करना पड़ता है। समय-समय पर गन्ने की पिलाई के बाद गन्ने की कटाई, पत्तों की सफाई व इसके बाद चरखिया लगाकर बैलों से रस निकालना, उसका गुड़ बनाना, जैसे कार्यों में पूरा परिवार लगाने के बाद भी मजदूर बुलाने पड़ते हैं। लेकिन, अब इतना मुनाफा नहीं होता।
नारायणलाल सिरवी, किसान प्रेमपुरा

Updated on:
10 Feb 2019 12:58 pm
Published on:
10 Feb 2019 12:58 pm