
देलवाड़ा. क्षेत्र की सुरम्य अरावली पर्वतमाला की हरितिमा अब मानो अंतिम सांसें गिन रही है। कभी चोरी-छिपे पहाड़ों की छाती पर चलने वाले पीले पंजे अब दिन-दहाड़े और चौबीसों घंटे बेखौफ होकर अरावली को छलनी करने में जुटे हैं। कालीवास और बिलोता पंचायत क्षेत्रों में शायद ही कोई ऐसा पहाड़ बचा हो, जहां खुदाई और कटाई का काम नहीं चल रहा हो। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कभी हरियाली से आच्छादित रहने वाले पहाड़ न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता खो रहे हैं, बल्कि उनका मूल स्वरूप और अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। पहाड़ों पर अब कंक्रीट के जंगल और सीसी सड़कें नजर आने लगी हैं।
कालीवास पंचायत के तंतेला गांव में एक पहाड़ की कटाई की ग्रामीणों द्वारा शिकायत किए जाने पर तहसीलदार हेमंत शर्मा और नायब तहसीलदार रविन्द्र श्रीमाली, हल्का पटवारी के साथ बुधवार को मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने वहां पहाड़ की कटाई कर रही पोकलेन मशीन को रुकवाया और कार्य करवा रहे प्रतिनिधि से स्वीकृति संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। तहसीलदार हेमंत शर्मा ने बताया कि मौके पर पहाड़ की कटाई और प्रस्तावित निर्माण कार्य के लिए जिला कलेक्टर द्वारा जारी स्वीकृति दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। ऐसे में कटाई का कार्य रुकवाया नहीं जा सका। वहीं तंतेला और कालीवास के ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ के ऊपरी हिस्से में कटाई जारी है, जबकि नीचे गांव की मुख्य सड़क गुजरती है। ऐसे में मलबा और पत्थर सड़क पर गिरने से जनहानि की आशंका बनी हुई है।
क्षेत्र के लोगों का आरोप है कि अरावली की हरितिमा को समाप्त करने के लिए वनों के विनाश का एक सुनियोजित तरीका अपनाया जा रहा है। आरोपों के अनुसार पर्यावरण विरोधी तत्व पहले पशुओं के चारे वाली बीड़ श्रेणी की पहाड़ी भूमि खरीदते हैं और उसे एक-दो वर्ष तक खुला छोड़ देते हैं। इसके बाद किसी स्थानीय रसूखदार व्यक्ति को सवैतनिक रखकर लोगों को जलाऊ लकड़ी का लालच दिया जाता है, जिससे बीड़ क्षेत्र की हरी वनस्पति कटने लगती है और पहाड़ धीरे-धीरे नंगे हो जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जैसे ही पहाड़ वनस्पति विहीन हो जाते हैं, रास्ते की स्वीकृति लेकर भारी मशीनें पहुंच जाती हैं और फिर पहाड़ों की कटाई कर वहां कंक्रीट के निर्माण कार्य शुरू कर दिए जाते हैं।
क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि अरावली की हरितिमा को नुकसान पहुंचाने और पहाड़ों की कटाई के पीछे प्रभावशाली लोगों तथा प्रशासनिक तंत्र की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि खरीदी गई अधिकांश बीड़ भूमि में जनप्रतिनिधियों और उच्च अधिकारियों की हिस्सेदारी है। योजनाबद्ध तरीके से पहले भूमि खरीदी जाती है, फिर उसकी हरितिमा समाप्त कर रास्तों की स्वीकृति के नाम पर पहाड़ों की कटाई कराई जाती है। ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय स्तर पर विरोध की आवाज दबाने के लिए पहाड़ों की कटाई में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और रसूखदारों की पोकलेन, एक्सक्वेटर, डंपर और ट्रैक्टर जैसे वाहन लगाए जाते हैं, जिससे विरोध कमजोर पड़ जाए। इसी कारण कभी चोरी-छिपे चलने वाली मशीनें अब खुलेआम चौबीसों घंटे पहाड़ों की कटाई करती दिखाई दे रही हैं और क्षेत्र के अनेक पहाड़ अपनी हरियाली खोकर नंगे हो चुके हैं।
तंतेला में एक्सक्वेटर द्वारा एक पहाड़ की कटाई और रास्ते में पत्थर गिरने की शिकायत पर नायब तहसीलदार और पटवारी को लेकर मौके पर पहुंचा। कटाई की स्वीकृति दिखाने का निर्देश दिया गया, जिस पर जिला कलेक्टर की स्वीकृति आदेश प्रस्तुत किया गया। इसके बाद उन्हें रास्ते में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं होने देने की हिदायत दी गई।
हेमंत शर्मा, तहसीलदार, देलवाड़ा