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चुनावी वर्ष में घट जाते हैं परीक्षा के नतीजे

बोर्ड परीक्षा में 15 से 20 फीसदी तक आ जाती है गिरावट, विषयाध्यापकों के चुनाव में लगने, स्कूलों में पोलिंग बूथ बनने से होती है समस्या
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चुनावी वर्ष में घट जाते हैं परीक्षा के नतीजे

अश्वनीप्रताप सिंह @ राजसमंद. राज्य विधानसभा के नवम्बर-दिसम्बर में हो रहे चुनाव लोकतंत्र की मजबूती के लिए हैं, लेकिन फिलहाल विद्यार्थियों की पढ़ाई कमजोर हो रही है। नतीजतन, चुनावी वर्ष में बोर्ड परीक्षा परिणाम 20 से 25 फीसदी घट जाता है। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव के बाद 2009 में आया १०वीं बोर्ड परीक्षा का परिणाम सामान्य परिणाम से 17 फीसदी कमजोर तथा 12वीं का 19.2 फीसदी गिर गया। 2013 के विधानसभा चुनाव के बाद 2014 में आया १०वीं का चुनाव परिणाम 2018 के मुकाबले 12.46 फीसदी तथा १२वीं का 18.15 फीसदी कम रहा। शिक्षाविदें का मानना है कि नवम्बर-दिसम्बर माह बोर्ड परीक्षा की तैयारी की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है। विद्यार्थी हर प्रश्न के उत्तर को बारीकी से समझना चाहता है, लेकिन शिक्षकों, खासतौर पर विषायध्यापकों के चुनावी कार्य में लगे होने से डेढ़ माह तक पढ़ाई चौपट रहती है। ऐसे में उन्हें पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है।

इसलिए बिगड़ता है परिणाम
जिले में शतप्रतिशत और शांतिपूर्ण मतदान करवाने के लिए 4 आरओ (रिटर्निंग ऑफिसर) लगे हैं, जिनके अधीन करीब २०० वरिष्ठ शिक्षक हैं। इनमें अधिकतर विषयाध्यापक हैं। वरिष्ठता और कार्य दक्षता के अनुसार उन्हें सेक्टर ऑफीसर, बीएलओ आदि बनाया जाता है। ट्रेनिंग लेन व देने में करीब ढेड़ से दो माह तक यह शिक्षण कार्य नहीं कर पाते। चुनाव कार्य के लिए 1200 चुनाव दलों का गठन किया गया है। इस चुनाव दल में करीब साढ़े चार हजार शिक्षक लगे हैं। इन्हें भी समय-समय पर चुनाव संबंधी प्रशिक्षण लेना पड़ता है, जिससे सीधे तौर पर शिक्षा प्रभावित हो रही है।

शिक्षा पर भारी पड़ती है जागरूकता
चुनाव के समय जगह-जगह मतदान जागरूकता के कार्यक्रम होते हैं। स्कूलों से लेकर सडक़ों तक में रैली आदि के आयोजन होते हैं। भावी मतदाता होने के कारण किसी न किसी रूप में विद्यार्थियों की इनमें आवश्यक रूप से सहभागिता होती है। जिससे उनकी लोकतंत्र की समझ और व्यवहारिक ज्ञान तो बढ़ता है, लेकिन विषयात्मक शिक्षा का लय टूट जाता है। जिसका परीक्षा परिणाम में खासा अंतर दिखता है।
पिछले पांच वर्षों का बोर्ड परिणाम


चुनावी वर्ष 2013-14
-10वीं का परीक्षा परिणाम 65 प्रतिशत रहा, जिसमें छात्राओं का 66 और छात्रों का 65 फीसदी।
-12वीं कला संकाय का परिणाम 74.75 फीसदी रहा।
वर्ष 2015 में
-10वीं का परिणाम 78 प्रतिशत रहा। जिसमें लड़कियों का 76.25व लडक़ों का 73.85 प्रतिशत।
-12वीं कला में 78.14 फीसदी रहा। 5 हजार 554 छात्र छात्राओं ने परीक्षा दी, जिसमें से 4 हजार 340 विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए।
वर्ष 2016 में
10वीं का परीक्षा परिणाम वर्ष 77.55 प्रतिशत रहा।
-12वीं कला संकाय में का परिणाम 73.34 प्रतिशत रहा।
वर्ष 2017 में
-10वीं का परीक्षा परिणाम 72.6 1 प्रतिशत रहा।
-12वीं कला संकाय का परिणाम 86.99 प्रतिशत रहा।
वर्ष 2018 में
10वीं का परिणाम 77.46 फीसदी रहा।
-12वीं कला संकाय का परीक्षा परिणाम 92.9 प्रतिशत रहा। जिले ने प्रदेश की सूची में दूसरा स्थान प्राप्त किया।

निश्चित तौर पर चुनावी वर्ष में बच्चों की शिक्षा बाधित होती है। शिक्षकों की ड्यूटी चुनाव में लगाने, चुनाव कार्य के लिए स्कूल का अधिग्रहण करने व जागरूकता कार्यक्रमों में बच्चों की भागीदार होना इनमें प्रमुख कारण हैं। लेकिन प्रशासन की भी मजबूरी है, क्योंकि मतदान भी प्रमुख कार्य है। ऐसे में प्रशासन को विद्यार्थी हित में चुनाव कार्यों में अन्य विभागों के बराबर ही शिक्षकों को लगाना चाहिए, जिससे शिक्षा बाधित नहीं हो। चुनाव बाद बच्चों को अतिरिक्त कक्षाएं, ट्यूशन आदि देकर उनके समय की भरपाई करनी चाहिए, ताकि परीक्षा परिणाम में गिरावट नहीं आए।
डॉ. राकेश तैलंग, पूर्व जिला शिक्षाधिकारी

Published on:
29 Nov 2018 10:46 am