राजसमंद

तब प्रकृति से तर था मन, आज घुट रहा दम, वन्यजीव विलुप्त हुए तो बदल गई भोजन शृंखला

बदल गया राजसमंद का प्राकृतिक स्वरूप, बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से खतरे में जनजीवन
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तब प्रकृति से तर था मन, आज घुट रहा दम, वन्यजीव विलुप्त हुए तो बदल गई भोजन शृंखला

लक्ष्मणसिंह राठौड़ @ राजसमंद

हरे-भरे पहाड़, शिराओं में कल कल बहता पानी, खेतों में लहलहाती फसलें, पक्षियों का कलरव, वातावरण में फैली फल-फूल और पेड़ पौधों की महक बरबस ही हर किसी को शांति व शुकून का अहसास कराती थी। सफेद मार्बल की खोज व खुदाई के साथ हरे-भरे पहाड़ अब गहरी खाईयों में तब्दील हो गए, तो पेड़ों की जगह पत्थर लादने की के्रनें खड़ी हो गई। इससे सफेद संगमरमर से दुनिया के नक्शे पर राजसमंद का नाम चमका, मगर प्रकृति का ख्याल नहीं रखा। तब के घने पेड़-पौधे वाले बीड़ अब डम्पिंग यार्ड के पहाड़ में तब्दील हो गए। पक्षियों के कलरव की आवाज अब खदानों में मार्बल खनन की गडग़ड़ाहट ने ले ली। धीरे- धीरे पशु- पक्षी, वन्य जीव घट गए, तो पूरे प्रकृति की भोजन शृंखला ही गड़बड़ा गई।
यह कहानी सिर्फ पिपलांत्री पंचायत के मोरवड़ गांव की ही नहीं, बल्कि समूचे माइनिंग क्षेत्र व राजसमंद जिले की है। आज के मोरवड़ का नाम इतिहास में झांके तो मोरवन था। इसके पीछे भी कारण है, तब बहुत ज्यादा मोर इस क्षेत्र में रहते थे, जिससे इस गांव का नाम मोरवन रखा गया। बताया जाता है कि इस गांव के फल और दूध राजसमंद के बाजार में बिकता था, जबकि आज फल, सब्जी, गेहूं के साथ पानी भी टैंकर से आ रहा है। बढ़ती आबादी, कटते पेड़-पौधे, सिकुड़ता वन क्षेत्र, अप्रत्याशित खनन, सूखते जलाशय, घटती खेती और गिरते भूज स्तर के बीच बढ़ी तकनीक व औद्योगिक विकास की रफ्तार में प्रकृति का मूल स्वरुप ही खतरे में पड़ गया है। सफेद संगमरमर दुनियाभर में राजसमंद के नाम को चमकाता है, तो इसके तल में बिखरती स्लरी, लफर और अनुपयोगी ब्लॉक्स ने हवा, पानी, सेहत, जीवन और प्राणी जगत की दूसरी जातियों पर बुरा असर डाला।

गड़बड़ा गई भोजन शृंखला
वन्यजीव जन्तुओं की प्रजातियां विलुप्त होने के साथ ही जिले में भोजन शृंखला ही गड़बड़ा गई। पहले शेर व चित्ते द्वारा जंगली बिल्ली, रोजड़े, पैंथर, भालू, लोमड़ी, खरगोश का शिकार कर लेते थे। अब शेर-चित्ते नहीं रहे और आज जंगल के राजा पैंथर बन गए हैं। इस कारण न सिर्फ पैंथर बढ़े, बल्कि रोजड़ों की तादाद भी बहुत ज्यादा हो गई है। पैंथर कभी मानव पर हमला नहीं करते, मगर अब मानव शिकार करने लग गए हैं। राजसमंद में रोजड़ों की तादाद इतनी बढ़ गई है कि लोग खेती भी नहीं कर पा रहे हैं, तो बढ़ते पैंथरों की तादाद से लोगों का घर पर रहना मुश्किल हो गया है।

झील पेटे में पनपता रेती का कारोबार
राजसमंद झील में सूखे पेटे में रेत (बजरी) खनन का अवैध कारोबार पनप रहा है। झील में रेत की अवैध खदाने खुल गई है। प्रतिदिन सैकड़ों ट्रेक्टर रेती का दोहन हो रहा है, जिससे झील में पानी का मार्ग बदलने का खतरा मंडराने लगा है। बगैर अनुमति के उपजाऊ मिट्टी का भी खनन हो रहा है, जिससे हर रोज कई पेड़ धराशाही हो रहे हैं। यही हाल बनास नदी, गोमती, खारी नदी, चन्द्रभागा नदी की बनी हुई है, जहां प्रतिदिन हजारों टन रेती की निकासी हो रही है। खास तौर पर राजसमंद झील एवं रेलमगरा तहसील क्षेत्र में बनास नदी पेटे हो रहे रेती दोहन पर अंकुश लगाने में न खनिज विभाग कोई ठोस कार्रवाई कर रहा है और न ही जिला प्रशासन गंभीर है।

Updated on:
22 Apr 2019 12:04 pm
Published on:
22 Apr 2019 12:04 pm