
कुंभलगढ़. अखिल भारतीय आदिवासी भील महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कांग्रेस में आदिवासी विभाग से प्रदेश महामंत्री रह चुके नरसिंग पढिय़ार ने शनिवार को कांग्रेस के बागी उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर भाजपा व कांग्रेस के बीच सीधे मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।
पढिय़ार ने बताया कि वे मूल रूप से सांचोर (जालौर) के रहने वाले हैं। उन्होंने कांगे्रस पार्टी के आलाकमान से कुंभलगढ़ विधानसभा से टिकट मांगा था, लेकिन पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया। ऐसे में उन्होंने शनिवार को कुंभलगढ़ से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया है। उन्होंने बताया कि अब तक यहां बड़ी संख्या में निवास करने वाले भील एवं आदिवासी समाज को सभी पार्टियों ने मात्र वोटों के लिए इस्तेमाल किया, लेकिन इनके विकास की किसी ने नहीं सोची। इसको देखते हुए ही वे मैदान में आए और बार तस्वीर कुछ अलग होगी।
प्रभावित होगा कांग्रेस का वोट बैंक!
पिछले छह माह से भी ज्यादा समय से क्षेत्र में सक्रिय पढिय़ार ने क्षेत्र में भील एवं आदिवासी मतदाताओं पर पकड़ बनाने का प्रयास किया है। ऐसे में अगर मतदाता उनके पक्ष में आते हैं तो निश्चित रूप से वे कांगे्रस के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रहेंगे। ऐसे में कांग्रेस को सतर्क रहने की जरूरत है।
रूठों को मनाना जरूरी
वर्तमान में बन रहे हालात में टिकट की भागदौड़ के बाद अब कांग्रेस उम्मीवार गणेशङ्क्षसह परमार को पार्टी से नाराज चल रहे लोगों को मनाने में भी दमखम लगाना पड़ेगा।
सडक़ें बिगाड़ सकती है राठौड़ की गणित
भाजपा प्रत्याशी सुरेन्द्रङ्क्षसह राठौड़ के लिए क्षेत्र की सडक़ों की दुर्दशा परेशानी साबित हो सकती है। पार्टी की सरकार होने के बाद भी पूरे पांच वर्ष तक लोग बदहाल सडक़ों के लिए आंदोलित रहे। इसके बाद भी सडक़ें नहीं सुधर पाई, जिससे कुंभलगढ़ का पर्यटन व्यवसाय भी प्रभावित हुआ। ऐसे में क्षेत्र की खराब सडक़ें राठौड़ के समीकरण बिगाड़ सकती है। कुंभलगढ़ के विपरीत आमेट क्षेत्र में सडक़ों की स्थिति बेहतर होने से वहां इसका प्रभाव नहीं दिखेगा।