कार्यक्रम में 700 से ज्यादा संत महंतों ने लिया भाग
कुंवारिया. कस्बे के छापर वाले हनुमानमंदिर पर महंत रामदास महाराज के सानिध्य में चल रहे छह दिवसीय नव कुंडीय श्रीराम महायज्ञ प्राण प्रतिष्ठा का समापन रविवार को मंदिर परिसर पर विशाल भंडारा, चादर ओढ़ाने के साथ सम्पन्न हुआ। प. विष्णु नारायण शर्मा ने वैदिक मंत्रोचार के साथ चादर ओढ़ाने की रस्म को पूरा किया। छापर वाले हनुमान मंदिर के नए महंत डॉ बलराम महाराज के द्वारा विशेष पूजा अर्चना करवाई गई। धार्मिक अनुष्ठान में सोराष्ठ राजकोट के मंहत रामदयाल, द्वारका के महंत स्वामी केशवानंद, रूद्रप्रयाग के महंत उपमन्यु दास, हरिद्वार के मोहन दास, रेवती रमनदास, पंचमुखी भीलवाड़ा के महंत लक्ष्मणदास, उंकारेश्वर के मंहत शत्रुग्घदास, झड़ोल के महंत सीतारामदास , सावरिया धाम मुंगाना के महंत चेतनदास, भीलवाड़ा पंचमुखी दरबार के महंत लक्ष्मण दास, पूर्णदास, जम्मू कश्मीर के महंत गोविंददास, रोकडिया हनुमान चारभुजा मंदिर के महंत सहित करीब 700 सौ संतों ने आयोजन में भाग लिया।
उच्च शिक्षा मंत्री ने किए चारभुजानाथ के दर्शन
चारभुजा. उच्च शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी ने भगवान चारभुजानाथ की शृंगार झांकी के दर्शन किए। माहेश्वरी रविवार को राजसमन्द से किसी समारोह में देवगढ़ जा रही थीं। वहीं गोमती चौराहा से माहेश्वरी चारभुजानाथ के दर्शनों की इच्छा जताते हुए प्रात: 9 बजे चारभुज? नाथ थ के दरवार पहुंची तथा दर्शन किए। उनके साथ राजसमन्द ग्रामीण मण्डल अध्यक्ष गणेश पालीवाल, नगरपरिषद सभापति सुरेश पालीवाल, नगर मण्डल अध्यक्ष महेन्द्र टेलर, सरपंच नाथलाल गुर्जर, मानसिंह बारहट, शंकरलाल, नन्दलाल, प्रकाश, धर्मचन्द सहित पार्टी कार्यकर्ता उपस्थित थे।
‘आत्मज्ञान बिना मन अशांत रहता’
राजसमंद. मुनि शुभकरण ने कहा कि आज का मनुष्य इन्द्रियों का सुख भोगने में लगा है। आज के मनुष्य को गाना- बजाना, देखना- सुनना, खाना- पीना, मौज- मस्ती, रिश्ते नाते अच्छे लगते हैं। राग द्वेष में मन लिप्त रहता है। वे शिविर संबोधि उपवन ट्रस्ट धानीन में रविवार को आयोजित ध्यान शिविर में व्याख्यान दे रहे थे। वे बोले कि साधु संत, ऋषि-मुनियों ने कहा है कि आत्मज्ञान के बिना शांति मिलना असंभव है। आत्मज्ञान के बिना मनुष्य धर्म का अज्ञानी है। अज्ञानी मनुष्य हमेशा अपनी इच्छा को तृप्त करने में अपना अमूल्य जीवन, अमूल्य समय को नष्ट करने में लगा रहता है। समय सबका निर्धारित है कोई आगे तो कोई बाद जाता है। लेकिन साथ क्या ले जाता है ये बहुत महत्वपूर्ण है। सामान्य मनुष्य यहा का लिया हुआ, यही छोड़ कर चला जाता है। आत्मज्ञानी मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है। पुण्य का कार्य करता है। अपने जीवन काल में स्वार्थ को छोड़ परमार्थ के मार्ग पर अग्रसर रहता है। आत्मज्ञान के तीन मार्ग है- शास्त्र, सतगुरु, परमात्मा की शरण, नियमित रुप से आध्यात्मिक शास्त्रों का अध्ययन करना, सतगुरु का सत्संग और परमात्मा की शरण में रहकर जप करना।