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रकमगढ़ में स्मारक बनाने के प्रस्ताव ठंडे बस्ते में

1997 में भेजे गए थे प्रस्ताव, प्रदेश सरकार ने बनाई थी दो सदस्यीय टीम
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रकमगढ़ में स्मारक बनाने के प्रस्ताव ठंडे बस्ते में

राजसमंद. प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के मुख्यिा कहे जाने वाले तात्या टोपे व अन्य सहभागियों की याद में रकमगढ़ में स्मारक बनने के प्रस्ताव बने, सरकार को भेजे गए लेकिन ठंडे बस्ते में दबकर रह गए। जिससे न केवल रकमगढ़ छापर का इतिहास धूमिल हो रहा है बल्कि युवा पीढ़ी इनकी शहादत से भी अनजान बनी हुई है। जबकि सरकार ने ही स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती वर्ष (1997) में स्वतंत्रता से जुड़े स्थानों, लोगों के सम्मान में प्रदेश के प्रत्येक जिले में कमेटियों का गठनकर प्रस्ताव मांगे थे।


1997 में कलक्टर के माध्यम से भेजे थे प्रस्ताव
देश ने 1997 में आजादी का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरवसिंह शेखावत ने प्रदेश के सभी जिलों में एक कमेटी का गठन करवाया। कमेटी का काम जिले में स्वतंत्रता से जुड़े व्यक्तियों व स्थानों के बारे में जानकारी देकर , संभावित कार्य का प्रस्ताव बनाकर भेजना था। यहां गठित दो सदस्यीय टीम में नरेंद्रपालसिंह चौधरी और दिनेश श्रीमाली थे। दोनों सदस्यों ने रकमगढ़ के छापर पर हुई मुठभेड़ का हवाला देकर यहां स्मार्क बनाने के प्रस्ताव तैयार किए तथा तत्कालीन जिला कलक्टर किरण सोनी गुप्ता के माध्यम से सरकार को भेजे लेकिन आजतक उसके आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई।


इनकी स्मृति में बनना था स्मारक
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख सेनानायक तात्या टोपे, छापर में अंग्रेजों और तात्या के मध्य हुई मुठभेड़ में सहयोग करने वाले कोठारिया रियासत के रावत जोधसिंह चौहान तथा नाथद्वारा मंदिर के तत्कालिक तिलकायात गोस्वामी गिरधरलालजी की स्मृति में बनवाने का प्रस्ताव भेजा गया था।


रकमगढ़ छापर से जुड़ा इतिहास
तात्या टोपे को अंग्रेजी सेना ने रकमगढ़ के छापर पर घेर लिया था। इस पर १३ अगस्त १८५८ में इस छापर पर तात्या और अंंग्रेजों के मध्य मुठभेड़ हुई। जिसमें हमारे दर्जनों देशभक्त शहीद हो गए थे। तात्या को बचाने के लिए रावत जोधसिंह चौहान ने अपनी सेना भेजी थी, सेना की मदद के चलते तात्या अंग्रेजों को चकमा देकर यहां से निकलने में कामयाब हो गए थे।


प्रस्ताव भेजे थे, काम नहीं हुआ...
वर्ष १९९७ में सरकार ने एक कमेटी बनाई थी, जिसमें मैं भी शामिल था। हमने तत्कालीन कलक्टर को यहां स्मारक बनाने का प्रस्ताव बनाकर भेजा था, लेकिन उसके बाद इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया, आज की युवा पीढ़ी छापर में हुई मुठभेड़ के इतिहास से अनभिज्ञ है।
-दिनेश श्रीमाली, १९९७ में बनी कमेटी के सदस्य।

Published on:
13 Aug 2018 12:17 pm