राजसमंद. राजसमंद की सुबह उस दिन कुछ अलग थी। हवा में उत्साह घुला हुआ था, स्कूलों के प्रांगण में हलचल थी और नन्हें कदमों में असाधारण आत्मविश्वास। कारण था- जिले के 37 नन्हें स्काउट्स का राष्ट्रीय स्तर पर चमकता सम्मान, ‘गोल्डन ऐरो अवार्ड’। इन 37 बच्चों में 18 बुलबुल और 19 कब स्काउट शामिल थे। […]
राजसमंद. राजसमंद की सुबह उस दिन कुछ अलग थी। हवा में उत्साह घुला हुआ था, स्कूलों के प्रांगण में हलचल थी और नन्हें कदमों में असाधारण आत्मविश्वास। कारण था- जिले के 37 नन्हें स्काउट्स का राष्ट्रीय स्तर पर चमकता सम्मान, ‘गोल्डन ऐरो अवार्ड’। इन 37 बच्चों में 18 बुलबुल और 19 कब स्काउट शामिल थे। छोटे-छोटे कंधों पर टंगी स्कार्फ, सीना ताने खड़े ये बच्चे अब सिर्फ विद्यार्थी नहीं रहे थे, बल्कि पूरे जिले का गौरव बन चुके थे।
यह सम्मान यूँ ही नहीं मिल जाता। इसके पीछे छिपी होती है महीनों की मेहनत, अनुशासन और सेवा की भावना। सी.ओ. स्काउट सुनील कुमार सोनी बताते हैं कि ‘गोल्डनऐरोअवार्ड’ कब एवं बुलबुल वर्ग का राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार है। इसे पाने के लिए बच्चों को स्काउटिंग के कई कठिन चरणों से गुजरना पड़ता है। सुबह की परेड से लेकर प्राथमिक उपचार सीखना, रस्सियों में सटीक गांठें बांधना, ध्वज शिष्टाचार का पालन करना, पर्यावरण संरक्षण के अभियान में भाग लेना, सामुदायिक सेवा करना और नेतृत्व क्षमता दिखाना—हर कसौटी पर इन नन्हें स्काउट्स ने खुद को साबित किया।
यह गौरवमयी उपलब्धि जिले के विभिन्न विद्यालयों से आए बच्चों ने मिलकर हासिल की। महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय, समीचा, महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय, मोही, लक्ष्मीपतसिंघानियां स्कूल, डिवाइन स्कूल, रा.उ.मा.वि. एमडी, मादरेचों का गुड़ा, ओपन कब पैक और आईडाणा विद्यालय के बालक-बालिकाओं ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए यह सर्वोच्च सम्मान प्राप्त किया। इन विद्यालयों के प्रांगण में जब बच्चों के नाम घोषित हुए, तो शिक्षकों की आंखों में गर्व और अभिभावकों के चेहरों पर खुशी साफ झलक रही थी।
यह सफलता केवल बच्चों की नहीं, बल्कि उनके स्काउट मास्टर्स, फ्लॉक लीडर्स, शिक्षकों और अभिभावकों के अथक मार्गदर्शन का परिणाम भी है। मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी रामेश्वर लाल बाल्दी और सचिव धमेन्द्र अनोखा सहित सभी संबंधित प्रधानाचार्यों ने बच्चों को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
जब 37 नन्हें स्काउट्स ने ‘गोल्डनऐरोअवार्ड’ अपने हाथों में थामा, तो वह सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी। वह अनुशासन, सेवा और समर्पण की पहचान थी। राजसमंद के इन बच्चों ने साबित कर दिया कि उम्र चाहे छोटी हो, लेकिन हौसले बड़े होने चाहिए। उनकी यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी और जिले का नाम यूँ ही राष्ट्रीय स्तर पर चमकाता रहेगा