रतलाम. शहर के मध्य एक प्राचीन शिव मंदिर है, जहां पर रखी लोहे की आलमारी साल में एक बार प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में खुलती है। इसमें रखी है धातु से निर्मित अद्भूत-चमत्कारी शिव परिवार सहित अन्य देवी-देवताओं की 15-16 प्राचीन प्रतिमाओं को बाहर निकाला जाता हैं। रतलाम राजवंश से जुड़े परिवार के सदस्य पूजा आराधना करता हैं।
इन प्रतिमाओं का होता अभिषेक-पूजन
शहर के बागड़ो का वास स्थित चौमुखा महादेव अगरजी का मंदिर में राजवंश राठौर परिवार की आलमारी में शिव परिवार, गरुड़, अम्बे माता, कुलदेवी नागणेच्या सहित अन्य प्रतिमाएं हैं। जिन्हे महाशिवरात्रि पर बाहर निकाल कर प्रतिमाओं के दर्शन वंदन अभिषेक एवं पूजन किया जाएगा।
ये है इतिहास
ब्रजराजसिंह ब्रज ने बताया कि प्रतिमाएं मंदिर की एक बड़ी लोहे की आलमारी में हैं। सन् 1483 के आसपास से इन प्रतिमाओं की पूजा जालोर राजपरिवार द्वारा की जा रही थी। रतलाम राज्य स्थापना के समय राठौर राजवंश की परंपरा अनुसार महाराजा रतनसिंह राठौर वंश की कुलदेवी की प्रतिमा लेकर रतलाम आए थे।
तब से राजपरिवार कर रहा पूजा
तब से कुलदेवी के साथ अन्य देव प्रतिमाओं की पूजा आराधना रतलाम राजपरिवार कर रहा था। आज ये प्रतिमाएं अनेक दशकों से जिला प्रशासन के अधीन ताले में कैद हैं। वर्ष में केवल एक बार, महाशिवरात्रि के दिन जिला प्रशासन के अधिकारी इन्हें ताले से बाहर निकालते हैं, तब ही दर्शन-पूजन का अवसर प्राप्त होता है।