
चैत्र नवरात्र की मंगलमय शुरुआत के साथ ही शहर के प्राचीन शक्तिपीठों में प्रमुख मां कालिका के दरबार में ब्रह्ममुहूर्त में घट स्थापना के साथ ही दर्शनार्थ के लिए खोल दिए गए। प्राचीन शक्तिपीठों में गुणावद की हिंगलाज माता, सातरूण्डा की कंवलका माता, राजापुरा की गढ़ंखंखाई माता, पैलेस में विराजी मां पद्मावती, ऊंकाला की महिषासुर मर्दिनी, सैलाना की कालिका, पिपलौदा की सूजापुरा माता, शिवगढ़ की गरबारी माता, सुखेड़ा की काबुलखेड़ी के अलावा जावरा, आलोट, ताल क्षेत्र में भी प्राचीन माता के मंदिर है, जहां पर भक्तों की भीड़ उमडऩे लगी।
गढ़ कालिका की जाग्रत प्रतिमा
चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन से ही शहर की प्राचीन मां गढ़ कालिका की चमत्कारी मूर्ति के दर्शन वंदन के लिए भक्तों की भीड़ ब्रह्ममुहूर्त से उमड़ेगी। गर्भगृह में मां कालिका के साथ चामुण्डा व दक्षिणावर्ती सूंड वाले गणपति के समीप अन्नपूर्णा मां भी विराजित है। मंदिर के द्वार चांदी के बने हैं। श्रद्धालु इस स्थल को जाग्रत और पवित्र मानते हैं। प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार माता की मूर्ति पांच सौ साल प्राचीन है और ऐसा माना जाता है कि सोढ़ा परिवार ने माता पूजन के लिए कालिका देवी की स्थापना की थी। तब से आज तक माता की आराधना भव्य स्तर होती आ रही है।
नवरात्र की हर शाम होंगे गरबारास
शारदीय के बाद यहां चैत्र नवरात्र में भी माता मंदिर में गरबारास होता है। मंदिर के हेमंत पुजारी ने बताया कि साढ़े चार बजे मंदिर के पट दर्शनार्थ खुल जाएंगे। घट स्थापना के साथ ही सुबह 6 बजे आरती की जाएगी। इसके बाद शाम 9 बजे आरती होती है। इस मध्य 7 से 9 बजे तक नन्ही बालिकाएं गरबारास करती है। प्रतिदिन माता का अलग-अलग शृंगार नौ दिन तक किया जाएगा। हजारों भक्त दर्शनार्थ पहुंचते है।